अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे तुम स्वयं से करते हो

by Janet Mushi | 17 जून 2019 6:39 अपराह्न


लूका 10:25‑37

25 “और देखो, एक शास्त्री (विधि के ज्ञाता) ने उठकर उसे परखा और कहा, ‘गुरु, मैं क्या करूँ कि अनन्त जीवन का अधिकारी बनूँ?’
26 यीशु ने उससे कहा, ‘व्यवस्था में क्या लिखा है? तू कैसे पढ़ता है?’
27 उसने उत्तर दिया, ‘तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्रेम कर; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर।’
28 यीशु ने उससे कहा, ‘तूने ठीक उत्तर दिया है; ऐसा ही कर, और तू जीवित रहेगा।’
29 पर वह अपने आप को धर्मी ठहराना चाहता था, इसलिए उसने यीशु से पूछा, ‘और मेरा पड़ोसी कौन है?’
30 यीशु ने कहा, ‘एक मनुष्य यरूशलेम से यरीहो जा रहा था कि डाकुओं में पड़ गया; उन्होंने उसे लूट लिया, पीटा और अधमरा छोड़कर चले गए।
31 ऐसा हुआ कि एक याजक उसी मार्ग से उतरता आया, पर उसे देखकर किनारे से निकल गया।
32 वैसे ही एक लेवी भी वहाँ आया, उसे देखा और पार निकल गया।
33 पर एक सामरी यात्रा करते हुए वहाँ पहुँचा, और उसे देखकर तरस खाया।
34 वह उसके पास गया, उसके घावों पर तेल और दाखमधु डालकर बाँधे, उसे अपने पशु पर चढ़ाया और सराय में ले जाकर उसकी सेवा‑शुश्रूषा की।
35 अगले दिन उसने दो दीनार निकाले, सराय के मालिक को दिए और कहा, “इसकी देखभाल करना, और यदि कुछ अधिक खर्च हो तो मैं लौटकर चुका दूँगा।”
36 अब बता, इन तीनों में से कौन उस लुटे हुए मनुष्य का पड़ोसी ठहरा?’
37 उसने कहा, ‘वही जिसने उस पर दया की।’ यीशु ने उससे कहा, ‘जा, तू भी ऐसा ही कर।’”


इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?

एक शास्त्री (विधि का ज्ञाता) यीशु से प्रश्न करने उठा — न कि सीखने के लिए, बल्कि उसे परखने के लिए। वह जानना चाहता था कि यीशु उत्तर कैसे देगा।
परन्तु प्रभु ने उसे उसी की व्यवस्था (तोरा) की ओर लौटा दिया और पूछा, “उसमें क्या लिखा है?”
वह बोला — “अपने प्रभु परमेश्वर से अपने सारे मन, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्रेम कर; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर।”

यीशु ने कहा, “तूने ठीक कहा है; ऐसा ही कर, और तू जीवित रहेगा।”
लेकिन वह व्यक्ति यहीं नहीं रुका — उसने फिर पूछा, “मेरा पड़ोसी कौन है?”

दरअसल, वह व्यक्ति सीखना नहीं चाहता था, बल्कि यह जताना चाहता था कि वह सब जानता है। वह तोरा का विद्वान था, सब आज्ञाएँ और नियम उसे याद थे। परन्तु समस्या यह थी कि उसका ज्ञान उसे अहंकारी बना चुका था। वह यह नहीं समझ सका कि सच्चा ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि प्रेम और दया के कर्मों से प्रकट होता है।

यीशु ने जो दृष्टान्त दिया, उसका उद्देश्य यही दिखाना था कि “यह सोचना कि केवल यहूदी ही हमारे पड़ोसी हैं — यह गलत है।”
पुराने विधान (तोरा) में लिखा था कि “अपने ही लोगों से प्रेम कर।” इसी कारण यहूदियों का विश्वास था कि केवल अपने समुदाय के लोग ही “पड़ोसी” हैं।
लैव्यव्यवस्था 19:18 कहती है:

“तू बदला न लेना, न अपने लोगों के पुत्रों पर क्रोध रखना; परन्तु अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर; मैं यहोवा हूँ।”

इससे यह भाव निकलता था कि “अपने लोगों से प्रेम करो, पर अन्य जातियों से नहीं।”
पर यीशु ने यह धारणा तोड़ दी — उन्होंने बताया कि सच्चा पड़ोसी वही है जो दया दिखाता है, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या समाज का क्यों न हो।

सामरी लोग यहूदियों के शत्रु माने जाते थे, वे मिश्रित वंश के थे। पर इसी सामरी ने घायल यहूदी की सहायता की — वह व्यक्ति, जिसे उसके अपने ही याजक और लेवी ने अनदेखा किया।
इससे यीशु ने दिखाया कि सच्ची भक्ति केवल नियम मानने में नहीं, बल्कि दयालुता और प्रेम में है।


हमारे लिए सन्देश

आज भी बहुत बार धर्म और सम्प्रदाय हमें बाँट देते हैं। हम सोचते हैं कि केवल “हमारे धर्म के लोग” ही हमारे भाई‑बहन हैं, और बाकी सब बाहरी हैं।
पर प्रभु हमें सिखाते हैं — प्रेम का कोई सीमांत नहीं होता

कितनी बार हम देखते हैं कि जो लोग ईसाई नहीं हैं, वही ज़रूरत के समय हमारी मदद करते हैं — वे दयालु, करुणाशील और उदार होते हैं। वही आज के “सामरी” हैं, वही हमारे “सच्चे पड़ोसी” हैं।

प्रभु हमें नहीं सिखाते कि हम दूसरों से घृणा करें, बल्कि यह कि हम उनके पापों के मार्ग पर न चलें, परंतु उनसे प्रेम अवश्य करें
यदि वे ज़रूरत में हों तो उनकी सहायता करें, उनके घर आमंत्रण पर जाएँ, उनके रोग‑दुख में सहभागी हों — ताकि हमारे प्रेम से वे भी परमेश्वर की ओर खिंचें।

अन्ततः —
सब बातों का उत्तर है प्रेम।
हम अपने समान अपने पड़ोसी से प्रेम करें — चाहे वह हमारे धर्म का हो या न हो — यही अनन्त जीवन का मार्ग है।

“अब ये तीनों बने रहते हैं — विश्वास, आशा और प्रेम; पर इन सबसे बड़ा प्रेम है।”
(1 कुरिन्थियों 13:13)

प्रभु हमें यह अनुग्रह दें कि हम सब प्रेम में चलें। 🙏


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