जब तुम गरीबों को दान दो, तो तुम्हारा दाहिना हाथ यह न जाने कि तुम्हारा बायाँ हाथ क्या कर रहा है” का क्या अर्थ है?

by Doreen Kajulu | 18 अप्रैल 2021 08:46 अपराह्न04

(मत्ती 6:3–4)

मत्ती 6:1–4 (Hindi Holy Bible, स्वीकृत अनुवाद)

1 “सावधान रहो! तुम मनुष्यों को दिखाने के उद्देश्य से अपने धार्मिक कार्य न करो, नहीं तो तुम अपने स्वर्गीय पिता से कुछ भी फल नहीं पाओगे।
2 इसलिए जब तुम दान करो, तो सामने तुरही न बजाओ जैसे कपटी लोग सभाओं और गलियों में करते हैं, ताकि लोग उनकी प्रशंसा करें। सच में, मैं तुमसे कहता हूं कि वे अपना फल पा चुके हैं।
3 परन्तु जब तुम दान करो, तो तुम्हारा बायाँ हाथ यह न जाने कि तुम्हारा दाहिना हाथ क्या कर रहा है;
4 ताकि तुम्हारा दान गुप्त रहे; और तब तुम्हारा पिता, जो गुप्त में देखता है, तुम्हें प्रतिफल देगा।”


इस वचन का अर्थ क्या है?

येशु यहाँ हमें यह सिखा रहे हैं कि दयालुता और मदद ऐसे तरीके से होनी चाहिए कि उसे लोग न देखें, न सराहें, बल्कि वह सिर्फ़ भगवान की दृष्टि में की गयी सेवा हो।

यह वचन हमें सीख देता है कि हमारा लक्ष्य लोगों की प्रशंसा पाने का नहीं होना चाहिए, बल्कि ईश्वर का अनुकूल प्राप्त करना होना चाहिए।


गहरा मतलब और समझ

1) हृदय की वास्तविक मंशा मायने रखती है

केवल अच्छे काम करना काफी नहीं है — हमारे दिल की मंशा महत्वपूर्ण है।
येशु कहते हैं कि यदि हम दूसरों को दिखाने के लिए दान देते हैं, तो वह हमारी प्रशंसा से पहले ही उसका फल पा चुका है।

 2) नम्रता महत्व रखती है

उस समय के धार्मिक नेता अक्सर अपने दान और सेवा का प्रदर्शन करते थे — ताकि लोग उन्हें बड़ा, महत्वपूर्ण और न्यायी समझें।
लेकिन येशु विनम्रता की राह दिखाते हैं: अगर हम अपनी सहायता छुपाकर करते हैं, तो वह न केवल गुप्त रहेगा, बल्कि ईश्वर उसे विशेष रूप से देखेंगे और पुरस्कृत करेंगे।

3) सच्चा पुरस्कार ईश्वर से मिलता है, लोगों से नहीं

अगर दान देने का मूल लक्ष्य प्रशंसा और नाम कमाना है, तो वह इनाम तो मिल सकता है — पर वह मनुष्यों का सम्मान है, ईश्वर का नहीं।
लेकिन जब हम गुप्त रूप से बिना दिखावे के देते हैं, तो भगवान खुद हमें पुरस्कृत करते हैं — खुलकर और वास्तविक रूप से।


व्यावहारिक जीवन में लागू करने योग्य बातें

दान को विनम्रता से करो:
चाहे तुम धन दान करो, समय दान करो, या दूसरों की मदद — सब कुछ बिना किसी पोस्ट, फोटो, या बात फैलाये करो।

प्रशंसा के लिए मत करो:
अगर हमारी मदद करने की वजह यह सोच है कि लोग हमें सुने, अपनाएँ, या सराहें — तो वह इरादा मूल रूप से गलत है।

 अपने कर्म भूल जाओ:
येशु कहते हैं: जब तुम कुछ अच्छा कर देते हो, तो उसके बारे में ज़्यादा मत सोचो या उसे अपनी पहचान बनाओ। उसे भगवान के सामने लगा दो और आगे बढ़ जाओ।
जैसे लूका 17:10 चेतावनी देता है कि जब सब कुछ कर दिया हो, तो कहो: “हम बस अपने कर्तव्य को निभाते हैं।”


निष्कर्ष

मत्ती 6:1–4 हमें याद दिलाता है कि हमारा दान और सेवा दूसरों को प्रभावित करने के लिए नहीं, बल्कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए होना चाहिए।
हमारा मकसद शोर, दिखावा और प्रशंसा नहीं होना चाहिए, बल्कि ईश्वर की नजर और स्वीकृति होना चाहिए।

सच्चा पुरस्कार मनुष्यों से नहीं मिलता, बल्कि भगवान की संतुष्टि और आशीर्वाद से मिलता है — और यही वह इनाम है जो वास्तविक रूप से मूल्यवान है।

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