यीशु मसीह की तीन प्रमुख परीक्षाएँ

यीशु मसीह की तीन प्रमुख परीक्षाएँ

भूमिका

जब यीशु पवित्र आत्मा के द्वारा जंगल में ले जाए गए (मत्ती 4:1), यह केवल शैतान के साथ एक संघर्ष नहीं था; यह उनके सेवा-कार्य से पहले की दिव्य तैयारी थी। यीशु का 40 दिन का उपवास पिता के साथ गहरे संबंध और आने वाली सेवकाई की तैयारी का प्रतीक था — जैसे मूसा ने सीनै पर्वत पर 40 दिन उपवास किया था (निर्गमन 34:28)।

इन्हीं दिनों में शैतान ने उन पर तीन विशेष परीक्षाएँ डालीं—साधारण परीक्षाएँ नहीं, बल्कि ऐसी चुनौतियाँ जो हर विश्वासियों के जीवन के मूल संघर्षों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

“यीशु, पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर यरदन से लौटे, और आत्मा के द्वारा जंगल में ले जाए गए।”
— लूका 4:1

इन तीन परीक्षाओं के माध्यम से हमें यह समझ मिलता है:

  • सच्चे पुत्रत्व और आज्ञाकारिता का अर्थ,
  • सामर्थ और अधिकार का सही उपयोग,
  • तथा दुःख सहने की विश्वासयोग्य राह, जो आत्म-सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण है।

अब हम हर परीक्षा को गहराई से समझते हैं।


1. पत्थरों को रोटी बनाना – शारीरिक इच्छा और स्व-इच्छा की परीक्षा

“शैतान ने उससे कहा, ‘यदि तू परमेश्‍वर का पुत्र है, तो इस पत्थर से कह कि यह रोटी बन जाए।’
यीशु ने उत्तर दिया, ‘लिखा है— मनुष्य केवल रोटी से नहीं, बल्कि हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहता है।’”

— लूका 4:3–4

यीशु भूखे थे — यह एक वास्तविक और जायज़ आवश्यकता थी। पर शैतान ने उन्हें पिता की इच्छा से अलग होकर अपनी शक्ति स्वयं के लिए प्रयोग करने की लालसा दी। यह परीक्षा थी —
निर्भरता बनाम आत्मनिर्भरता

फिलिप्पियों 2:6–8 में बताया गया है कि यीशु, जो परमेश्वर थे, फिर भी उन्होंने अपने आप को दीन किया और क्रूस तक आज्ञाकारी बने।

“उन्होंने अपने आप को दीन किया और मृत्यु तक—हाँ, क्रूस की मृत्यु तक—आज्ञाकारी बने।”
— फिलिप्पियों 2:8

शैतान अक्सर हमें हमारी कमजोरियों में उकसाता है—भूख, अकेलापन, तनाव, या जीवन की ज़रूरतों में।
समस्या खाना, विवाह करना या उन्नति करना नहीं है,
समस्या है परमेश्वर की समय-सीमा और इच्छा से बाहर होकर करना।

सच्चा पुत्रत्व यह है कि हम भूखे होने पर भी पिता पर भरोसा रखें।

“धन्य है वह मनुष्य जो परीक्षा सहता रहता है… क्योंकि जब वह खरा उतरेगा, तब उसे जीवन का मुकुट मिलेगा।”
— याकूब 1:12


2. संसार के राज्य – महिमा, शक्ति और समझौते की परीक्षा

“शैतान ने उसे एक ऊँचे स्थान पर ले जाकर संसार के सब राज्य… दिखाए।
और कहा, ‘यदि तू मेरे सामने दण्डवत करेगा, तो मैं यह सब अधिकार तुझे दूँगा।’”

— लूका 4:5–7

यह अधीनता और समझौते की परीक्षा थी।
यीशु सचमुच एक राज्य स्थापित करने आए थे (यशायाह 9:6–7),
पर शैतान ने क्रूस के बिना ताज देने की पेशकश की।

यीशु ने तुरन्त उत्तर दिया—

“तू अपने प्रभु परमेश्वर की उपासना कर और केवल उसी की सेवा कर।”
— लूका 4:8; व्यवस्थाविवरण 6:13

यीशु ने ऐसी महिमा ठुकरा दी जो परमेश्वर की राह को छोटा कर देती। यह दर्शाता है कि उच्चता आज्ञाकारिता और क्रूस के मार्ग से ही आती है।

“इस कारण परमेश्वर ने उन्हें अत्यन्त ऊँचा किया और वह नाम दिया जो हर नाम से श्रेष्ठ है।”
— फिलिप्पियों 2:9

आज भी बहुत से विश्वासियों को यह परीक्षा आती है —
थोड़ी-सी प्रसिद्धि, धन, मान-सम्मान, या दुनिया की सफलता के लिए सिद्धांतों से समझौता करना।

“यदि कोई मनुष्य सारे संसार को प्राप्त करे, पर अपना प्राण खो दे, तो उसे क्या लाभ?”
— मत्ती 16:26


3. मंदिर की चोटी – घमण्ड और गलत ‘आध्यात्मिकता’ की परीक्षा

“फिर शैतान उसे यरूशलेम ले गया, और मंदिर की चोटी पर खड़ा करके कहा, ‘यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो यहाँ से नीचे कूद जा…’”
— लूका 4:9

शैतान ने भजन 91 का हवाला देकर यीशु को अपनी सुरक्षा का दिखावा करने के लिए उकसाया।
परन्तु विश्वास का अर्थ परमेश्वर को आज़माना नहीं है।

यीशु ने उत्तर दिया—

“लिखा है— तू अपने प्रभु परमेश्वर की परीक्षा न ले।”
— लूका 4:12; व्यवस्थाविवरण 6:16

यीशु ने दिखाया कि परमेश्वर के वचन का उपयोग कभी भी घमण्ड, प्रदर्शन या आत्म-प्रमाण के लिए नहीं होता।

“परमेश्वर घमण्डियों का विरोध करता है, परन्तु दीनों पर अनुग्रह करता है।”
— याकूब 4:6

आज बहुत लोग “घोषणा”, “दर्शक-प्रिय विश्वास”, या “आत्मिक दिखावा” के नाम पर परमेश्वर की इच्छा पूछे बिना “कूद पड़ते” हैं—और अपेक्षा करते हैं कि परमेश्वर उन्हें पकड़ेगा।


प्रलोभन में विजय का गूढ़ संदेश

उत्पत्ति 3:6 में मानवता की तीन कमजोरियाँ दिखती हैं—

  1. “भोजन के लिए अच्छी” – इच्छा
  2. “देखने में मनोहर” – महिमा
  3. “बुद्धिमान बनाने वाली” – घमण्ड

यीशु, दूसरे आदम (रोमियों 5:18–19), इन तीनों में विजयी हुए जहाँ पहला आदम असफल हुआ।

“एक मनुष्य की अवज्ञा से बहुत लोग पापी ठहरे; उसी प्रकार एक की आज्ञाकारिता से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।”
— रोमियों 5:19

और हर बार यीशु ने व्यवस्थाविवरण से वचन उद्धृत किया—यह दिखाता है कि परमेश्वर का वचन परीक्षा में सबसे बड़ा हथियार है (इफिसियों 6:17)।

जंगल उनकी हार नहीं;
उनकी सेवा से पहले की प्रशिक्षण भूमि थी।


मसीही जीवन की तीन महत्त्वपूर्ण परीक्षाएँ

हर विश्वासी अपने जीवन में इन तीन चरणों से गुजरता है:

1. आवश्यकताओं की परीक्षा

विश्वास की शुरुआत में — जब हम सीखते हैं कि अपनी आवश्यकताओं के लिए परमेश्वर पर भरोसा करना है (मत्ती 6:33).

2. महत्वाकांक्षा की परीक्षा

सेवा में — जब हम प्रसिद्धि, प्रभाव, और सफलता चाहते हैं (1 यूहन्ना 2:16).

3. आत्म-उन्नति की परीक्षा

अन्तिम वर्षों में या बुलाहट के अन्त में — जब हम कष्ट से बचना चाहते हैं (2 तीमुथियुस 4:6–8).

वास्तविक विजय केवल परीक्षा से बचना नहीं, बल्कि अन्त तक विश्वासयोग्य रहना है।

“जो जय पाएगा, वह मेरे साथ मेरे सिंहासन पर बैठेगा, जैसा कि मैंने भी जय पाई…”
— प्रकाशितवाक्य 3:21


अन्त तक यीशु का अनुसरण

यीशु क्रूस से बच सकते थे।
लोगों ने क्रूस पर उन्हें चुनौती भी दी कि नीचे उतर आएँ (मत्ती 27:40–43)।
परन्तु उन्होंने धैर्यपूर्वक पीड़ा सहकर पिता की इच्छा पूरी की।

“यदि कोई मेरे पीछे आना चाहता है, तो वह स्वयं का इन्कार करे, अपना क्रूस प्रतिदिन उठाए और मेरे पीछे चले।”
— लूका 9:23

यीशु आज भी हमें चेताते हैं—

“जागते रहो और प्रार्थना करते रहो ताकि तुम परीक्षा में न पड़ो; आत्मा तो उत्सुक है, पर शरीर दुर्बल है।”
— मत्ती 26:41

और जो अन्त तक बने रहते हैं, उनके लिए प्रतिफल तैयार है—

“मैं अच्छी लड़ाई लड़ चुका हूँ, मैंने दौड़ पूरी कर ली है, और विश्वास को स्थिर रखा है… अब मेरे लिए धार्मिकता का मुकुट रखा हुआ है।”
— 2 तीमुथियुस 4:7–8

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Ester yusufu editor

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