लेखक: प्रेरित पौलुस लेखन स्थान: कुरिन्थुस नगर, केनख्रिया नामक बंदरगाह (रोमियों 16:1) पाठक: रोम में रहने वाले मसीही विश्वासी—एक ऐसी कलीसिया जिसे पौलुस ने स्वयं कभी नहीं देखा था।
पौलुस ने उनके दृढ़ विश्वास के विषय में सुना था (रोमियों 1:8) और वह उनसे मिलने की गहरी इच्छा रखता था, ताकि वह उनके विश्वास को दृढ़ कर सके और स्वयं भी उनके विश्वास से उत्साहित हो (रोमियों 1:11–12)।
बाद में यह इच्छा तब पूरी हुई जब पौलुस कैदी के रूप में रोम पहुँचा (प्रेरितों के काम 28:14–16)। वहाँ उसने पूरे साहस के साथ और बिना किसी रोक-टोक के सुसमाचार का प्रचार किया (प्रेरितों के काम 28:30–31)।
पुस्तक का उद्देश्य: रोमियों की पुस्तक मसीही विश्वास की नींव को स्पष्ट और क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करती है, जैसे—
नीचे पूरी पुस्तक का एक सरल और सुव्यवस्थित खाका दिया गया है:
पौलुस बताता है कि वह सुसमाचार के प्रचार के लिए क्यों समर्पित है:
मुख्य संदेश: उद्धार यहूदी और अन्यजाति—सबके लिए—केवल विश्वास के द्वारा उपलब्ध है।
पौलुस यह स्पष्ट करता है कि हर मनुष्य को उद्धार की आवश्यकता है।
परमेश्वर ने सृष्टि के द्वारा अपने आप को प्रकट किया (रोमियों 1:20), फिर भी लोगों ने सत्य को अस्वीकार किया।
व्यवस्था होने पर भी वे उसे पूरी रीति से मान न सके (रोमियों 2:17–24)।
रोमियों 3:23 “क्योंकि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।”
इसलिए कोई भी मनुष्य अपने अच्छे कामों या व्यवस्था के पालन से धर्मी नहीं ठहर सकता।
जब यह स्पष्ट हो जाता है कि कामों से उद्धार संभव नहीं, तब पौलुस परमेश्वर का समाधान बताता है:
रोमियों 3:21 “पर अब व्यवस्था से अलग परमेश्वर की वह धार्मिकता प्रकट हुई है…”
मनुष्य उसके अनुग्रह से सेंतमेंत धर्मी ठहराया जाता है (रोमियों 3:24)।
इब्राहीम अपने कामों के कारण नहीं, बल्कि विश्वास के कारण धर्मी गिना गया (रोमियों 4:3)।
सारांश: उद्धार अनुग्रह से, विश्वास के द्वारा, और केवल मसीह में है।
यह भाग बताता है कि धर्मी ठहराए जाने के बाद विश्वासी का जीवन कैसा होना चाहिए।
बपतिस्मा के द्वारा विश्वासी मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान में सहभागी होते हैं (रोमियों 6:3–4)।
पौलुस विश्वासी के आंतरिक संघर्ष का वर्णन करता है (रोमियों 7:15–25)।
रोमियों 8 हमें सिखाता है:
मुख्य संदेश: पवित्र आत्मा विश्वासियों को पवित्र और विजयी जीवन जीने की सामर्थ्य देता है।
पौलुस एक महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देता है: यदि इस्राएल परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा है, तो बहुतों ने यीशु को क्यों ठुकरा दिया?
वह अपनी इच्छा के अनुसार दया करता है (रोमियों 9:15)।
उनकी ठोकर अन्यजातियों के उद्धार का कारण बनी (रोमियों 11:11–12)।
परमेश्वर ने वचन दिया है कि एक दिन इस्राएल राष्ट्र के रूप में मसीह की ओर फिरेगा (रोमियों 11:26)।
मुख्य शिक्षा: परमेश्वर का अनुग्रह घमंड नहीं, बल्कि नम्रता उत्पन्न करता है।
अब पौलुस बताता है कि विश्वासियों को अपने दैनिक जीवन में कैसे चलना चाहिए।
“अपने शरीरों को जीवित, पवित्र और परमेश्वर को भाता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ” (रोमियों 12:1–2)।
हर अधिकार परमेश्वर की ओर से ठहराया गया है (रोमियों 13:1)।
सार: मसीही चरित्र बदले हुए जीवन का फल है।
पौलुस पत्र का समापन इस प्रकार करता है:
रोमियों की पुस्तक हमें सिखाती है:
जो मनुष्य के कामों से नहीं, बल्कि यीशु मसीह के द्वारा प्रकट होती है।
जो अनुग्रह से दिया गया निःशुल्क वरदान है।
जो पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से पवित्रता और प्रेम में जिया जाता है।
यहूदी और अन्यजाति—दोनों परमेश्वर की उद्धार योजना में सम्मिलित हैं।
रोमियों की पुस्तक सुसमाचार और मसीही जीवन को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकों में से एक
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