रोमियों की पुस्तक का स्पष्ट और सुव्यवस्थित परिचय

रोमियों की पुस्तक का स्पष्ट और सुव्यवस्थित परिचय

1. रोमियों की पुस्तक का परिचय

लेखक: प्रेरित पौलुस
लेखन स्थान: कुरिन्थुस नगर, केनख्रिया नामक बंदरगाह (रोमियों 16:1)
पाठक: रोम में रहने वाले मसीही विश्वासी—एक ऐसी कलीसिया जिसे पौलुस ने स्वयं कभी नहीं देखा था।

पौलुस ने उनके दृढ़ विश्वास के विषय में सुना था (रोमियों 1:8) और वह उनसे मिलने की गहरी इच्छा रखता था, ताकि वह उनके विश्वास को दृढ़ कर सके और स्वयं भी उनके विश्वास से उत्साहित हो (रोमियों 1:11–12)।

बाद में यह इच्छा तब पूरी हुई जब पौलुस कैदी के रूप में रोम पहुँचा (प्रेरितों के काम 28:14–16)। वहाँ उसने पूरे साहस के साथ और बिना किसी रोक-टोक के सुसमाचार का प्रचार किया (प्रेरितों के काम 28:30–31)।

पुस्तक का उद्देश्य:
रोमियों की पुस्तक मसीही विश्वास की नींव को स्पष्ट और क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करती है, जैसे—

  • मनुष्य की उद्धार की आवश्यकता
  • यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर की उद्धार योजना
  • विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना
  • पवित्र आत्मा में जीवन
  • इस्राएल और अन्यजातियों के लिए परमेश्वर की योजना
  • व्यावहारिक मसीही जीवन

2. रोमियों की पुस्तक के मुख्य भाग

नीचे पूरी पुस्तक का एक सरल और सुव्यवस्थित खाका दिया गया है:

I. सुसमाचार की सामर्थ्य (रोमियों 1:1–17)

पौलुस बताता है कि वह सुसमाचार के प्रचार के लिए क्यों समर्पित है:

  • सुसमाचार हर एक विश्वास करने वाले के लिए उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य है (रोमियों 1:16)
  • क्योंकि उसमें परमेश्वर की धार्मिकता विश्वास से विश्वास के लिए प्रकट होती है (रोमियों 1:17)

मुख्य संदेश:
उद्धार यहूदी और अन्यजाति—सबके लिए—केवल विश्वास के द्वारा उपलब्ध है।


II. मानव जाति का पाप और दोष (रोमियों 1:18–3:20)

पौलुस यह स्पष्ट करता है कि हर मनुष्य को उद्धार की आवश्यकता है

1. अन्यजाति दोषी हैं

परमेश्वर ने सृष्टि के द्वारा अपने आप को प्रकट किया (रोमियों 1:20), फिर भी लोगों ने सत्य को अस्वीकार किया।

2. यहूदी भी दोषी हैं

व्यवस्था होने पर भी वे उसे पूरी रीति से मान न सके (रोमियों 2:17–24)।

रोमियों 3:23
“क्योंकि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।”

इसलिए कोई भी मनुष्य अपने अच्छे कामों या व्यवस्था के पालन से धर्मी नहीं ठहर सकता।


III. विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना (रोमियों 3:21–5:21)

जब यह स्पष्ट हो जाता है कि कामों से उद्धार संभव नहीं, तब पौलुस परमेश्वर का समाधान बताता है:

1. व्यवस्था से अलग धार्मिकता

रोमियों 3:21
“पर अब व्यवस्था से अलग परमेश्वर की वह धार्मिकता प्रकट हुई है…”

2. यीशु मसीह में विश्वास के द्वारा उद्धार

मनुष्य उसके अनुग्रह से सेंतमेंत धर्मी ठहराया जाता है (रोमियों 3:24)।

3. इब्राहीम एक उदाहरण

इब्राहीम अपने कामों के कारण नहीं, बल्कि विश्वास के कारण धर्मी गिना गया (रोमियों 4:3)।

सारांश:
उद्धार अनुग्रह से, विश्वास के द्वारा, और केवल मसीह में है।


IV. मसीह में नया जीवन (रोमियों 6:1–8:39)

यह भाग बताता है कि धर्मी ठहराए जाने के बाद विश्वासी का जीवन कैसा होना चाहिए।

1. पाप के लिए मरे हुए

बपतिस्मा के द्वारा विश्वासी मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान में सहभागी होते हैं (रोमियों 6:3–4)।

2. शरीर और आत्मा के बीच संघर्ष

पौलुस विश्वासी के आंतरिक संघर्ष का वर्णन करता है (रोमियों 7:15–25)।

3. पवित्र आत्मा के द्वारा विजय

रोमियों 8 हमें सिखाता है:

  • “अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं” (रोमियों 8:1)
  • आत्मा के अनुसार चलाया गया जीवन (रोमियों 8:4)
  • परमेश्वर की संतान के रूप में गोद लिया जाना (रोमियों 8:14–17)
  • कोई भी वस्तु हमें परमेश्वर के प्रेम से अलग नहीं कर सकती (रोमियों 8:38–39)

मुख्य संदेश:
पवित्र आत्मा विश्वासियों को पवित्र और विजयी जीवन जीने की सामर्थ्य देता है।


V. परमेश्वर की संप्रभुता और इस्राएल के लिए उसकी योजना (रोमियों 9–11)

पौलुस एक महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देता है:
यदि इस्राएल परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा है, तो बहुतों ने यीशु को क्यों ठुकरा दिया?

1. परमेश्वर की संप्रभु इच्छा

वह अपनी इच्छा के अनुसार दया करता है (रोमियों 9:15)।

2. इस्राएल की ठोकर से अन्यजातियों को उद्धार

उनकी ठोकर अन्यजातियों के उद्धार का कारण बनी (रोमियों 11:11–12)।

3. इस्राएल के लिए भविष्य की आशा

परमेश्वर ने वचन दिया है कि एक दिन इस्राएल राष्ट्र के रूप में मसीह की ओर फिरेगा (रोमियों 11:26)।

मुख्य शिक्षा:
परमेश्वर का अनुग्रह घमंड नहीं, बल्कि नम्रता उत्पन्न करता है।


VI. व्यावहारिक मसीही जीवन (रोमियों 12:1–15:3)

अब पौलुस बताता है कि विश्वासियों को अपने दैनिक जीवन में कैसे चलना चाहिए

1. अपने आप को जीवित बलिदान बनाना

“अपने शरीरों को जीवित, पवित्र और परमेश्वर को भाता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ” (रोमियों 12:1–2)।

2. प्रेम और सेवा का जीवन

  • आत्मिक वरदानों का नम्रता से उपयोग करें (रोमियों 12:3–8)
  • प्रेम निष्कपट हो (रोमियों 12:9)
  • अपने बैरियों को भी आशीष दें (रोमियों 12:14)

3. शासन करने वाले अधिकारों की आज्ञा मानना

हर अधिकार परमेश्वर की ओर से ठहराया गया है (रोमियों 13:1)।

4. प्रेम और पवित्रता में चलना

  • प्रेम व्यवस्था को पूरा करता है (रोमियों 13:10)
  • विवादास्पद बातों में दूसरों पर दोष न लगाएँ (रोमियों 14:1–3)

सार:
मसीही चरित्र बदले हुए जीवन का फल है।


VII. निष्कर्ष और अंतिम अभिवादन (रोमियों 15:14–16:27)

पौलुस पत्र का समापन इस प्रकार करता है:

  • स्पेन जाने की अपनी सेवकाई योजनाओं का उल्लेख करता है (रोमियों 15:24)
  • सुरक्षा के लिए प्रार्थना का निवेदन करता है (रोमियों 15:30–31)
  • रोम के विश्वासियों को व्यक्तिगत नमस्कार भेजता है
  • झूठे शिक्षकों से सावधान करता है (रोमियों 16:17–18)
  • और परमेश्वर की महिमा में स्तुति के साथ पत्र समाप्त करता है (रोमियों 16:25–27)

3. रोमियों की पूरी पुस्तक का सार

रोमियों की पुस्तक हमें सिखाती है:

1. परमेश्वर की धार्मिकता

जो मनुष्य के कामों से नहीं, बल्कि यीशु मसीह के द्वारा प्रकट होती है।

2. विश्वास के द्वारा उद्धार

जो अनुग्रह से दिया गया निःशुल्क वरदान है।

3. मसीही जीवन

जो पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से पवित्रता और प्रेम में जिया जाता है।

4. सभी लोगों के लिए परमेश्वर की योजना

यहूदी और अन्यजाति—दोनों परमेश्वर की उद्धार योजना में सम्मिलित हैं।

रोमियों की पुस्तक सुसमाचार और मसीही जीवन को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकों में से एक

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Doreen Kajulu editor

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