शुरू में प्रेरित पौलुस का नाम शाऊल था। दमिश्क जाते समय जब उसका सामना जीवित प्रभु यीशु मसीह से हुआ, तो उसका जीवन पूरी तरह बदल गया (प्रेरितों के काम 9:1-19)। इसके बाद उसने पौलुस नाम अपनाया और सुसमाचार फैलाने में सबसे प्रभावी नेताओं में से एक बन गया।
पौलुस का जन्म तरसुस में हुआ था, जो किलिकिया (आज का तुर्की) का एक प्रमुख नगर था। वह जन्म से रोमी नागरिक भी था (प्रेरितों के काम 22:3-28)। वह बिन्यामीन गोत्र का यहूदी था और व्यवस्था का कड़ाई से पालन करने वाले फरीसियों में से एक था। वह अपने विषय में फिलिप्पियों 3:5 में कहता है—
“मैं आठवें दिन खतना किया हुआ, इस्राएल की सन्तान में से, बिन्यामीन के गोत्र का, इब्रानियों में से इब्रानी और व्यवस्था की बात पर फरीसी था।” (ERV-Hindi)
पौलुस ने स्वयं अविवाहित रहने का चुनाव किया (1 कुरिन्थियों 7:7-8), ताकि वह बिना किसी बँटाव और पारिवारिक जिम्मेदारियों के, पूरी तरह प्रभु के कार्य में लगा रह सके। वह 1 कुरिन्थियों 7:32-33 में इसका कारण स्पष्ट करते हुए कहता है—
“मैं चाहता हूँ कि तुम चिन्ता-मुक्त रहो। अविवाहित पुरुष प्रभु के कार्य की चिन्ता करता है कि प्रभु को कैसे प्रसन्न करे; परन्तु विवाहित पुरुष संसार की चिन्ता करता है कि अपनी पत्नी को कैसे प्रसन्न करे।” (ERV-Hindi)
पौलुस की यह शिक्षा दिखाती है कि कभी-कभी अविवाहित जीवन परमेश्वर की सेवा में अधिक समर्पण और एकाग्रता को संभव बनाता है। पौलुस का यह चुनाव अन्य बाइबिल पात्रों—जैसे यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला (लूका 1:15) और एलिय्याह भविष्यद्वक्ता (1 राजा 19:10, 13)—की तरह था, जिन्होंने अविवाहित रहकर पूरी तरह परमेश्वर की बुलाहट को पूरा किया।
यीशु ने यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के विषय में कहा था कि उन सब में जो स्त्रियों से जन्मे हैं, वह सबसे महान है (मत्ती 11:11):
“मैं तुम से सच कहता हूँ, स्त्रियों से जन्मे लोगों में यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले से बड़ा कोई नहीं उठ खड़ा हुआ।” (ERV-Hindi)
एलिय्याह के जीवन में भी परमेश्वर की विशेष मुहर थी—उसे मृत्यु का अनुभव किए बिना स्वर्ग में उठा लिया गया (2 राजा 2:11)।
इसी प्रकार पौलुस को भी प्रारम्भिक कलीसिया में एक अद्वितीय स्थान प्राप्त है। उसने सबसे अधिक श्रम किया, अनेक यात्राएँ कीं, अन्यजातियों को सुसमाचार पहुँचाया और कई कलीसियाएँ स्थापित कीं। वह 1 कुरिन्थियों 15:10 में गवाही देता है—
“परन्तु मैं जो कुछ भी हूँ, वह परमेश्वर के अनुग्रह से हूँ… और उसका वह अनुग्रह मुझ पर व्यर्थ न हुआ।” (ERV-Hindi)
पौलुस का अविवाहित रहना कोई संयोग नहीं था। यह पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में लिया गया एक जानबूझकर निर्णय था, ताकि वह पूरी निष्ठा और पूरे मन से परमेश्वर की सेवा कर सके। उसका जीवन आज भी इस बात का उदाहरण है कि जब कोई व्यक्ति पूरी तरह प्रभु की इच्छा को प्राथमिकता देता है, तो परमेश्वर उसके द्वारा कितने महान कार्य कर सकता है।
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