ईसाई होना सिर्फ चर्च जाना या “ईसाई” कहे जाने तक सीमित नहीं है। सच्ची ईसाईयत का आधार है मसीह की छवि में बदलना, और वह परिवर्तन शुरू होता है, जब हम उनके शिष्य बनने का निर्णय लेते हैं। यीशु के पहले शिष्यों ने हमें दिखाया कि सच्ची शिष्यता कैसी होती है। नीचे दिए गए छह गुण एक सच्चे शिष्य के हृदय और जीवन का परिचय हैं।
शिष्य बनने का अर्थ है स्वयं स्थिर रहना नहीं, बल्कि स्वयं को त्याग देना। उन्होंने अपने आराम, अपनी इच्छाओं, अपनी महत्वाकांक्षाओं को छोड़ कर परमेश्वर की इच्छा को प्राथमिकता दी। (लूका 14:27; 9:23)इस तरह का आत्म‑त्याग, रोज़ रोज़ “स्व‑प्राण त्याग” है यानि हमारी प्राकृतिक इच्छाओं का त्याग और मसीह के लिए जीवित रहना। (रोमी 12:1; गलाती 2:20)
एक सच्चा शिष्य हमेशा सीखने की तैयारी में रहता है। उन्होंने खुद को पूरी तरह यीशु के शिक्षण के अधीन रखा। आज भी, शिष्यता में आगे बढ़ने के लिए हमें पवित्र आत्मा द्वारा वचन (बाइबिल) के माध्यम से सिखने और सीखती समुदायों का हिस्सा बनने की ज़रूरत है। (यूहन्ना 14:26; 2 तीमुथियुस 3:16–17; प्रेरितों के काम 2:42)
शिष्यता केवल सुनने या समझने तक सीमित नहीं थी वे हर जगह यीशु के पीछे चल पड़े। मिशन, सेवा, सुसमाचार प्रचार वे सब उनका हिस्सा थे। (मत्ती 9:35; लूका 10:1–3; मत्ती 28:19–20)शिष्यता का मतलब है “सिखने” के साथ-साथ “करने” भी।
जहाँ कहीं भी आदेश मिले चाहे वह प्रार्थना, उपासना, सेवा या कठिन आज्ञा हो उन्होंने बिना रोके, बिना बैर के आज्ञा मानी। (यूहन्ना 14:15; लूका 9:45)शिष्यता में आज्ञाकारिता विश्वास का प्रमाण है। (याकूब 2:17)
उनका विश्वास सतही या मौज‑मस्ती वाला नहीं था वे यीशु के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। उन्होंने न सिर्फ देखा, बल्कि अनुभव किया कि यीशु कौन हैं और उनसे क्या उम्मीद करना चाहिए। (यूहन्ना 2:11; इब्रानियों 11:6; यूहन्ना 20:31)निजी, गहरा विश्वास यही शिष्यता की जड़ है।
जब लोगों को यीशु की बातें समझ नहीं आईं, या वे असहज हुए तब भी शिष्यों ने पीछे नहीं हटा। उन्होंने कहा “प्रभु, हम किसके पास जाएँ? तेरे पास अनन्त जीवन के वचन हैं।” (यूहन्ना 6:67–68)शिष्यता में स्थिरता, धैर्य और भरोसा तब भी जब सब कुछ उलझा लगे। (इब्रानियों 10:36; याकूब 1:12; नीतिवचन 3:5–6)
प्रारंभिक चर्च में, विश्वासी इसलिए “ईसाई” कहे गए, क्योंकि वे स्पष्ट रूप से मसीह के शिष्य थे वे दिखते, सोचते, जीते और प्रेम करते थे जैसे यीशु करते थे। (प्रेरितों के काम 11:26)ईसाईयत सिर्फ एक विचारधारा नहीं है यह मसीह के साथ एक जीवित संबंध है, और वह संबंध हमें मसीह के समान बनाता है। (रोमी 8:29)और यह रूपांतरण तभी संभव है, जब हम शिष्यता की दिग्गज यात्रा को अपनाते हैं एक टिकी हुई, समर्पित, वचन‑आधारित और व्यवहारशील शिष्य की तरह।
हे प्रभु, हमें सच्चे शिष्य बनाएँ। हमें आत्म-त्याग, वचन के अधीनता, आपके पीछे चलने का साहस, आज्ञाकारिता, पूर्ण विश्वास और कठिनाइयों में भी धैर्य देने वाले बनाइए। हमें अपने पुत्र की छवि में ढालिए। आमीन।
अगर आप चाहें, तो मैं इसे और भी संक्षिप्त, अखबार या ब्लॉग‑शैली में लिख सकता हूँ ताकि यह पढ़ने में आसान हो जाए और आँझ‑आँझ याद रह जाए।क्या मैं वह रूप तैयार कर दूँ?
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