प्रश्न: नीतिवचन 10:25 का क्या अर्थ है?
“जब आंधी निकल जाती है, तो दुष्ट लोप हो जाता है, परन्तु धर्मी सदा के लिये अटल नींव है।” (नीतिवचन 10:25, Hindi Bible)
उत्तर: इस पद का अर्थ प्रभु यीशु के उस दृष्टान्त से और भी स्पष्ट होता है, जिसमें उन्होंने बताया कि जो लोग उसके वचन को सुनते हैं और उस पर चलते हैं, और जो केवल सुनकर उस पर नहीं चलते, उनमें क्या अन्तर है।
“इसलिये जो कोई मेरी ये बातें सुनता है और उन पर चलता है, वह उस बुद्धिमान मनुष्य के समान है जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया। फिर वर्षा हुई, बाढ़ आई, आँधियाँ चलीं और उस घर पर आ पड़ीं, तो भी वह नहीं गिरा क्योंकि उसकी नींव चट्टान पर रखी गई थी। और जो कोई मेरी ये बातें सुनता है और उन पर नहीं चलता, वह उस मूर्ख मनुष्य के समान है जिसने अपना घर बालू पर बनाया। जब वर्षा हुई, बाढ़ आई, आँधियाँ चलीं और उस घर पर आ पड़ीं, तब वह गिर पड़ा और उसका पतन बहुत बड़ा था।” (मत्ती 7:24–27, Hindi Bible)
अब इसे नीतिवचन 10:25 के साथ मिलाकर देखें तो साफ़ होता है कि “दुष्ट” कौन है। वह व्यक्ति जो सुसमाचार सुनता है, लेकिन उसका पालन नहीं करता। वह कहता तो है कि वह उद्धार पा चुका है, पर उसके जीवन में कोई फल या परिवर्तन नहीं दिखता। वह भीतर से उसी के समान है जिसने कभी परमेश्वर को नहीं जाना। ऐसे सब लोग “दुष्ट” कहलाते हैं, क्योंकि वे अब भी पाप में हैं और मसीह के लहू से छुटकारा नहीं पाए हैं।
ऐसे लोग बाहर से पवित्र या भक्त दिखाई दे सकते हैं। लेकिन जैसे ही जीवन में आँधी-तूफ़ान आते हैं कठिनाइयाँ, क्लेश, सताव या मसीह के कारण कष्ट वे पीछे हट जाते हैं और ऐसा प्रतीत होता है जैसे उन्होंने परमेश्वर को कभी जाना ही न हो। क्योंकि उनका जीवन चट्टान पर नहीं टिका था। कई लोग सफलता पाकर भी गिर जाते हैं। जब उन्हें सम्पन्नता, पद या शिक्षा मिल जाती है, तो वे परमेश्वर को भूल जाते हैं। वे यीशु का अनुसरण केवल अपनी ज़रूरतों के कारण करते थे। जैसे ही ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं, वे विश्वास छोड़ देते हैं।
परन्तु जो व्यक्ति प्रभु के वचनों को सुनकर उन पर चलता है, उसका जीवन बिल्कुल विपरीत होता है। उसे “सदा की अटल नींव” कहा गया है। आँधी हो या तूफ़ान, वह कभी नहीं डगमगाता, क्योंकि उसकी नींव चट्टान मसीहपर रखी गई है।
इसलिए पश्चाताप करो, अपने पापों की क्षमा लो और प्रतिदिन अपने जीवन को उसी पश्चाताप के अनुसार चलाओ। तब तुम हर समय दृढ़ और अडिग बने रहोगे।
प्रभु तुम्हें आशीष दे!
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