यदि परमेश्वर का न्याय या यीशु मसीह का पुनरागमन तुम्हें बेचैन करता है या क्रोधित करता है, लेकिन समृद्धि, आशीष और सफलता के संदेश तुम्हें उत्साहित करते हैं – तो यह एक गंभीर चेतावनी है। यह इस बात का संकेत हो सकता है कि तुम्हारे लिए सचाई से ज़्यादा आराम मायने रखता है। बाइबल ऐसे दृष्टिकोण को आध्यात्मिक रूप से खतरनाक बताती है।
शुरुआत से ही शैतान की योजना यही रही है — परमेश्वर के सत्य को कुछ और आकर्षक बना देना। अदन की वाटिका में परमेश्वर ने आदम और हव्वा को स्पष्ट रूप से चेतावनी दी:
“पर भले-बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल तू कभी न खाना; क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।” – उत्पत्ति 2:17 (ERV-HI)
शैतान ने परमेश्वर का विरोध किया और एक नरम लेकिन झूठी बात कही:
“तुम निश्चय न मरोगे।” – उत्पत्ति 3:4 (ERV-HI)
हव्वा ने इस झूठ को इसलिए स्वीकार किया क्योंकि वह आशाजनक और आध्यात्मिक लग रहा था — लेकिन वह घातक था। यही उस विचारधारा की जड़ है जिसे कुछ मसीही विद्वान “गौरव की धर्मशास्त्र” (Theology of Glory) कहते हैं — एक ऐसा दृष्टिकोण जो केवल आशीष और विजय पर ध्यान देता है लेकिन पाप, मन फिराव और क्रूस को नजरअंदाज़ करता है।
परन्तु सच्चा मसीही धर्मशास्त्र परमेश्वर की भलाई और कठोरता दोनों को स्वीकार करता है:
“इसलिये परमेश्वर की भलाई और कठोरता दोनों पर ध्यान कर: जो गिर पड़े हैं उन पर कठोरता, और तुझ पर भलाई, यदि तू उसकी भलाई पर बना रहे।” – रोमियों 11:22 (ERV-HI)
आज कई चर्च ऐसा सुसमाचार प्रचार करते हैं जिसमें कटु सत्य नहीं होते। पाप, न्याय और नरक जैसे विषयों को या तो नजरअंदाज़ किया जाता है या हल्का बना दिया जाता है। इसके बदले में, लोग केवल यह सुनना चाहते हैं कि ईश्वर तुम्हें ऊँचा उठाएगा, सफल बनाएगा, आशीष देगा, भले ही जीवन में अवज्ञा हो।
परंतु पवित्र शास्त्र इस तरह की मानसिकता के विरुद्ध स्पष्ट चेतावनी देता है:
“क्योंकि यह तो एक बलवाई जाति है, झूठ बोलने वाले लड़के हैं, जो यहोवा की व्यवस्था को सुनना नहीं चाहते। वे दर्शकों से कहते हैं, ‘देखना बन्द करो’, और भविष्यद्वक्ताओं से कहते हैं, ‘हमारे लिये ठीक बातें भविष्यवाणी मत करो, मधुर बातें कहो, धोखा देने वाले दर्शन दिखाओ।’” – यशायाह 30:9–10 (O.V.)
और प्रेरित पौलुस ने ऐसे प्रचारकों के विषय में कहा, जो लोगों के कानों को गुदगुदाते हैं:
“क्योंकि ऐसा समय आएगा कि वे सही उपदेश को सहन नहीं करेंगे, परन्तु अपनी इच्छाओं के अनुसार बहुत से ऐसे शिक्षक बना लेंगे जो उन्हें वही बताएँ जो उनके कानों को अच्छा लगे। वे सत्य से अपना मुँह मोड़ लेंगे और कल्पित बातों की ओर मुड़ जाएँगे।” – 2 तीमुथियुस 4:3–4 (ERV-HI)
ऐसे प्रचारकों का संदेश शैतान जैसा है — “पाप में रहो और फिर भी परमेश्वर की आशीष पाओ।” लेकिन यह एक खतरनाक झूठ है।
सच्चा सुसमाचार अनुग्रह और सत्य दोनों को एक साथ लाता है:
“वह वचन देहधारी हुआ… और हम ने उस की महिमा को ऐसा महिमा देखा जैसा पिता के एकलौते पुत्र की, जो अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण था।” – यूहन्ना 1:14 (ERV-HI)
यीशु ने पापियों को क्षमा किया, पर वह यह भी कहते थे:
“जा, फिर कभी पाप मत करना।” – यूहन्ना 8:11 (ERV-HI)
पुराने नियम में इस्राएल ने बार-बार सच्चे भविष्यवक्ताओं को नकार दिया और केवल उन्हें सुना जो केवल शांति और आशीष की बातें करते थे – भले ही लोग अवज्ञा कर रहे हों।
“वे मेरी प्रजा की चोट को हल्के में चंगा करते हैं, यह कहते हुए, ‘शान्ति है, शान्ति है’, परन्तु शान्ति नहीं है।” – यिर्मयाह 6:14 (O.V.)
“इस्राएल के भविष्यवक्ता जो यरूशलेम के विषय में भविष्यवाणी करते हैं और कहते हैं, ‘शान्ति है’, और शान्ति नहीं है; प्रभु यहोवा यों कहता है।” – यहेजकेल 13:16 (O.V.)
आज भी हम वही सुनते हैं – “शांति है”, जबकि कोई पश्चाताप नहीं है।
हर वर्ष हमें दो अटल सच्चाइयों के और करीब लाता है:
“हर मनुष्य को एक बार मरना और उसके बाद न्याय होना निश्चित है।” – इब्रानियों 9:27 (ERV-HI)
किसी को दिन या समय नहीं पता। यीशु ने कहा कि वह तब आएंगे जब लोग सामान्य जीवन जी रहे होंगे — खा रहे होंगे, पी रहे होंगे, शादी कर रहे होंगे।
“जैसे लूत के दिनों में हुआ था: वे खाते-पीते, खरीदते-बेचते, लगाते और घर बनाते थे; परन्तु जिस दिन लूत सदोम से बाहर निकला, उस दिन आग और गन्धक स्वर्ग से बरसी और उन सब को नाश कर दिया।” – लूका 17:28–30 (ERV-HI)
मैं तुमसे पूछता हूँ: अगर यीशु आज रात लौट आए — क्या तुम तैयार हो? अगर तुम्हारी आज मृत्यु हो जाए — तुम्हारी आत्मा कहाँ जाएगी?
“इसलिए जागते रहो और प्रार्थना करते रहो कि जो कुछ होनेवाला है उससे बच सको और मनुष्य के पुत्र के सामने खड़े हो सको।” – लूका 21:36 (ERV-HI)
पश्चाताप करो। अपने पापों को नए वर्ष में मत ले जाओ। यीशु मसीह की ओर लौटो — जिन्होंने तुम्हारे पापों के लिए मृत्यु सहन की और पुनरुत्थान किया — ताकि तुम्हें अनन्त जीवन मिल सके।
उद्धार एक उपहार है, परन्तु यह तुम्हारी पूर्ण समर्पण मांगता है।
“यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह विश्वासयोग्य और धर्मी है कि वह हमारे पापों को क्षमा करे और हमें सारी अधर्मता से शुद्ध करे।” – 1 यूहन्ना 1:9 (ERV-HI)
“हे स्वर्गीय पिता, आज मैं तेरे पास आता हूँ, यह मानते हुए कि मैं एक पापी हूँ। मैंने बहुत कुछ ऐसा किया है जो तुझे अप्रसन्न करता है। मैं तेरे न्याय के योग्य हूँ। पर तू दयालु है। तूने वादा किया है कि जो सच्चे मन से तेरे पास आता है, तू उसे क्षमा करेगा। आज मैं अपने पापों से मन फिराता हूँ। मैं विश्वास करता हूँ कि यीशु मसीह तेरा पुत्र है, जिसने मेरे पापों के लिए मृत्यु सही और पुनर्जीवित हुआ। कृपया मुझे उसके लहू से शुद्ध कर। मुझे आज से नया बना — अनन्तकाल के लिए। मैं तुझे अपना जीवन समर्पित करता हूँ। धन्यवाद, प्रभु यीशु, कि तूने मुझे बचाया और अपनाया। आमीन।”
अगर आप चाहें, तो मैं इस संदेश को पीडीएफ में भी तैयार कर सकता हूँ या ऑडियो क्लिप बना सकता हूँ — बताइए कैसे उपयोग करना चाहते हैं।
शालोम, प्रियजनों।
आइए एक क्षण के लिए रुकें और एक गहरे आध्यात्मिक सत्य पर विचार करें, जिसका सामना हर विश्वासी को करना पड़ता है: जब हम जीवन की परीक्षाओं के बीच होते हैं, तो हम क्या देखते हैं और कैसे प्रतिक्रिया देते हैं?
1. यीशु हमारे दुःख को समझते हैं
बाइबिल सिखाती है कि यीशु कोई दूर के उद्धारकर्ता नहीं हैं—उन्होंने वह रास्ता चला है जो हम चलते हैं। उन्होंने प्रलोभन, दर्द और अस्वीकृति का अनुभव किया जैसे हम करते हैं।
“हमारे पास ऐसा महायाजक नहीं है जो हमारी कमजोरियों को समझ न सके, बल्कि ऐसा है जो हर प्रकार की परीक्षा से गुजरा, बिलकुल वैसे ही जैसे हम, फिर भी बिना पाप के।” — इब्रानियों 4:15
इसका मतलब है कि यीशु मानवीय दुःख का पूरा बोझ समझते हैं। लेकिन उन्होंने इसे भी जीत लिया, हमें आशा दी कि हम भी सहन कर सकते हैं।
“मैंने तुम्हें ये बातें बताईं ताकि तुम्हें मुझमें शांति मिले। इस संसार में तुम्हें दुःख होगा, लेकिन उत्साह रखो! मैंने संसार पर विजय प्राप्त की है।” — यूहन्ना 16:33
2. परीक्षाएँ मसीही जीवन का सामान्य हिस्सा हैं
सामान्य धारणा के विपरीत कि विश्वास दर्द-मुक्त जीवन की गारंटी देता है, शास्त्र सिखाती है कि परीक्षाएँ मसीही यात्रा का हिस्सा हैं। उपदेशक हमें याद दिलाता है कि जीवन में हर चीज़ का एक समय होता है:
“सब कुछ का एक समय होता है, और आकाश के नीचे हर कार्य का एक निश्चित समय होता है।” — उपदेशक 3:1
आप समृद्धि, हानि, अकेलापन, बीमारी या आनंद के मौसम से गुजर सकते हैं—परंतु इन सबसे ऊपर परमेश्वर की जागरूकता होती है। महत्वपूर्ण यह है कि जब आप “रेगिस्तान” के मौसम में प्रवेश करें, तो आप कैसे प्रतिक्रिया देते हैं।
3. यीशु ने खतरे का सामना किया, फिर भी अकेले नहीं थे
अपने बपतिस्मा के बाद, यीशु को परीक्षा के लिए जंगल में ले जाया गया:
“तुरंत आत्मा ने उन्हें जंगल में भेज दिया, और वह जंगल में चालीस दिन रहा, जहाँ शैतान ने उसे परीक्षा दी। वह जंगली जानवरों के साथ था, और स्वर्गदूत उसकी सेवा कर रहे थे।” — मरकुस 1:12-13
यहाँ हमें दोहरी सच्चाई दिखती है: यीशु ने बाहरी खतरों (“जंगली जानवर”) और आध्यात्मिक युद्ध (“शैतान की परीक्षा”) का सामना किया। फिर भी, स्वर्ग सक्रिय रूप से मौजूद था—“स्वर्गदूत उसकी सेवा कर रहे थे।” theological implication: परमेश्वर हमें हमारी परीक्षाओं में कभी अकेला नहीं छोड़ता। वह हमें दिव्य सहायता से घेरता है, भले ही हम उसे देख न सकें।
4. परीक्षाओं में केवल दुश्मन को न देखें—परमेश्वर की उपस्थिति देखें
कभी-कभी परीक्षाएँ ऐसे लोग या हालात लाती हैं जो दुश्मनों जैसे लगते हैं—कठोर आलोचक, विश्वासघात, बीमारी, आर्थिक कठिनाई या प्रियजनों द्वारा अस्वीकृति। लेकिन ये “जंगली जानवर” हमें बड़ी सच्चाई से अंधा नहीं कर सकते: परमेश्वर हमारे साथ है।
यह वही था जो एलीशा ने समझा जब वह और उसका सेवक दुश्मन की सेनाओं से घिरे हुए थे। उसका सेवक घबरा गया, लेकिन एलीशा ने प्रार्थना की:
“‘डरो मत,’ नबी ने उत्तर दिया। ‘हमारे साथ जितने हैं, वे उनके साथ जितनों से अधिक हैं।’” — 2 राजा 6:16
“एलीशा ने प्रार्थना की, ‘हे प्रभु, उसकी आँखें खोल, ताकि वह देख सके।’ तब प्रभु ने सेवक की आँखें खोल दीं, और उसने देखा कि पहाड़ों में आग के घोड़े और रथ पूरे एलीशा के चारों ओर थे।” — 2 राजा 6:17
दूतों की सेवा का धर्मशास्त्र: (इब्रानियों 1:14) कहता है कि दूत “सेवक आत्माएँ हैं, जिन्हें वे लोग जो उद्धार के अधिकारी होंगे, उनकी सेवा के लिए भेजा गया है।” इसका मतलब है कि दिव्य सहायता हमारे लिए अनदेखे रूप से काम करती है, खासकर जब हम कमजोर और भयभीत होते हैं।
5. दानिय्येल का विश्वास हमें दिखाता है कि परीक्षा में कैसे भरोसा करें
जब दानिय्येल को सिंहों के खड्डे में फेंका गया, तो वह डरता नहीं था। उसने सिंहों पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की शक्ति पर ध्यान केंद्रित किया। उसका साक्ष्य था:
“मेरे परमेश्वर ने अपना दूत भेजा और सिंहों के मुंह बंद कर दिए। उन्होंने मुझे कोई नुकसान नहीं पहुँचाया क्योंकि मैं उनकी दृष्टि में निर्दोष पाया गया था।” — दानिय्येल 6:22
दानिय्येल का अनुभव यह धार्मिक सत्य प्रकट करता है: विश्वास हमेशा परीक्षा को समाप्त नहीं करता, लेकिन वह उसमें परमेश्वर की शक्ति दिखाता है।
6. आवेदन: अपनी आध्यात्मिक आँखें खुली रखें
सिर्फ इसलिए कि हम दूतों या दिव्य हस्तक्षेप को नहीं देख पाते, इसका मतलब यह नहीं कि परमेश्वर अनुपस्थित है। वह अक्सर पर्दे के पीछे काम करता है ताकि हमें सुरक्षित रख सके, मजबूत कर सके, और मुक्ति दे सके।
“क्योंकि हम विश्वास से चलते हैं, देखने से नहीं।” — 2 कुरिन्थियों 5:7
परीक्षा के क्षणों में केवल अपनी भौतिक आँखों से न देखें। परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपकी आध्यात्मिक आँखें खोल दे, ताकि आप उसकी शक्ति, उपस्थिति और व्यवस्था देख सकें।
अंतिम प्रोत्साहन:
आप शायद गहरी संघर्ष की अवधि से गुजर रहे हैं, लेकिन यह जान लें: परमेश्वर ने आपको नहीं छोड़ा है। उसके दूत आपके चारों ओर हैं। उसकी आत्मा आपको शक्ति देती है। उसके वादे सच्चे हैं।
तो, शांत रहें। भय को छोड़ दें। संघर्ष के परे देखें और अपनी दृष्टि परमेश्वर पर स्थिर करें। उचित समय पर आप उसके कार्य को देखेंगे और उसकी दिव्य सहायता का अनुभव करेंगे।
“शांत हो जाओ और जानो कि मैं परमेश्वर हूँ।” — भजन संहिता 46:10
शालोम।
बाइबल में “प्रस्थान” शब्द अकसर मिशनरी यात्राओं के संदर्भ में आता है — विशेष रूप से प्रेरित पौलुस की यात्राओं के दौरान।
थियोलॉजिकल (धार्मिक) दृष्टिकोण से यह केवल एक यात्रा को नहीं, बल्कि सुसमाचार की गति को दर्शाता है — विश्वासियों का संसार में जाने का बुलावा, और कई बार, परमेश्वर के उद्देश्य में आज्ञाकारिता के साथ कष्ट सहने को भी।
“हम जहाज पर चढ़े और अस्सोस के लिए रवाना हो गए, जहाँ हमें पौलुस को लेना था; क्योंकि उसने इस प्रकार से व्यवस्था की थी, कि आप पैदल वहाँ जाएगा।” (प्रेरितों के काम 20:13 — ERV-HI)
यहाँ “प्रस्थान” का अर्थ है कि पौलुस के साथी जहाज़ में चढ़कर उसे अस्सोस में लेने जाते हैं, जबकि पौलुस पैदल जाने का निर्णय लेता है।
यह एक रणनीतिक निर्णय था — पौलुस कभी-कभी स्वयं को अलग करता था, शायद प्रार्थना या आत्म-चिंतन के लिए, फिर भी वह मिशन से जुड़ा रहता था।
“जब हम उनसे अलग हुए, तो सीधे कोस को रवाना हुए; अगले दिन रोड्स पहुँचे और वहाँ से पातरा गए।” (प्रेरितों के काम 21:1 — ERV-HI)
यहाँ “रवाना होना” (या समुद्र की यात्रा शुरू करना) एक नई यात्रा के चरण की शुरुआत को दर्शाता है।
यह लगातार चलता जाना दिखाता है कि प्रारंभिक कलीसिया कभी स्थिर नहीं थी — मिशन एक चलायमान कार्य था, हमेशा बाहर की ओर बढ़ता हुआ (cf. मत्ती 28:19)।
“जब यह निर्णय लिया गया कि हमें इटली जाना है, तो पौलुस और अन्य बंदियों को एक शाही दल के कप्तान, यूलियुस, को सौंप दिया गया। हमने अद्रुमुतियुम के एक जहाज पर चढ़ाई की, जो एशिया के किनारों के बंदरगाहों की ओर जा रहा था, और हमने यात्रा शुरू की।” (प्रेरितों के काम 27:1–2 — ERV-HI)
यहाँ पौलुस एक बंदी के रूप में यात्रा पर निकलता है — रोम की ओर।
धार्मिक दृष्टि से यह दिखाता है कि परमेश्वर की योजना दुख से नहीं रुकती। बंदी होने के बावजूद, पौलुस साक्षी बना रहा — और रोम में गवाही देने की परमेश्वर की योजना को पूरा किया (cf. प्रेरितों 23:11)।
“उन्होंने हमारा आदर किया और जब हम यात्रा को तैयार हुए, तो हमें जरूरत की सारी वस्तुएँ दीं। तीन महीने बाद हम एक मिस्री जहाज पर रवाना हुए, जो सर्दियों में वहीं ठहरा था; उस जहाज पर कास्टोर और पॉलक्स का प्रतीक था।” (प्रेरितों के काम 28:10–11 — ERV-HI)
यहाँ प्रस्थान फिर से होता है — इस बार दूसरों की सहायता और भेंटों के साथ।
धार्मिक रूप से यह बताता है कि परमेश्वर अक्सर अपरिचित स्थानों पर भी दूसरों की उदारता के माध्यम से अपने सेवकों की आवश्यकता पूरी करता है (cf. फिलिप्पियों 4:19)।
बाइबल में “प्रस्थान” केवल यात्रा का शब्द नहीं है, यह दर्शाता है:
जैसे पौलुस बार-बार “प्रस्थान” करता था, वैसे ही आज के विश्वासी भी परमेश्वर के मिशन में बुलाए जाते हैं — कभी सहजता में, कभी कठिनाइयों में, पर हमेशा उद्देश्य के साथ।
शालोम!
आइए आज हम परमेश्वर के वचन की एक गहरी सच्चाई पर मनन करें। शास्त्र कहता है:
“यहोवा के वचन शुद्ध वचन हैं; वे उस चाँदी के समान हैं, जो मिट्टी के भट्ठे में ताई जाती और सात बार शुद्ध की जाती है।” – भजन संहिता 12:6 (ERV-HI)
इसका अर्थ है कि परमेश्वर का वचन अनंत गहराई से भरा है। हर बार पढ़ने पर यह नई समझ और प्रकाशन देता है। इसीलिए आज भी, सदियों बाद भी, बाइबल जीवित और प्रासंगिक है।
“परमेश्वर का वचन जीवित और प्रभावशाली है, और किसी भी दोधारी तलवार से अधिक तीव्र है…” – इब्रानियों 4:12 (ERV-HI)
(मत्ती 25:14–30)
इस दृष्टांत में यीशु एक स्वामी की कहानी बताते हैं, जो यात्रा पर जाने से पहले अपने तीन सेवकों को अलग-अलग धन (जिसे “प्रतिभाएं” कहा गया) सौंपता है।
एक को पाँच प्रतिभाएं दी गईं, दूसरे को दो और तीसरे को एक।
पहले दो सेवक तुरंत उस धन का उपयोग करते हैं और उसे दुगुना कर देते हैं। परंतु तीसरा सेवक अपनी प्रतिभा ज़मीन में गाड़ देता है और कुछ भी लाभ नहीं कमाता।
सुनिए उसने क्या कहा:
“हे स्वामी, मैं जानता था कि तू कठोर मनुष्य है, जो जहाँ नहीं बोया वहाँ से काटता है, और जहाँ नहीं छींटा वहाँ से बटोरता है। इसलिये मैं डर गया, और जाकर तेरी प्रतिभा मिट्टी में छिपा दी; देख, तेरा धन।” – मत्ती 25:24–25 (ERV-HI)
उसके शब्द चौंकाने वाले हैं। उसने झूठ नहीं कहा—उसने डर और अपनी सोच के आधार पर जवाब दिया।
उसने अपने स्वामी को कठोर और अपेक्षा रखने वाला माना, जो बिना संसाधन दिए फल चाहता है। इस भय के कारण, उसने कुछ भी नहीं किया।
जबकि बाकी सेवक, जिन्होंने आदर्श स्थिति न होने पर भी कार्य किया, उन्होंने डर को रोकने नहीं दिया। वे अपने पास जो था, उसमें विश्वासयोग्य रहे।
यह दृष्टांत हमें एक गहरी आत्मिक सच्चाई सिखाता है: परमेश्वर हमें केवल अनुकूल परिस्थितियों में सेवा के लिए नहीं बुलाता—वह चाहता है कि हम जो कुछ हमारे पास है, उसमें विश्वासयोग्य बनें।
यीशु ने कहा:
“जो थोड़ा सा कार्य में विश्वासयोग्य है, वह बड़े कार्य में भी विश्वासयोग्य होता है…” – लूका 16:10 (ERV-HI)
और पौलुस हमें याद दिलाता है:
“जो कुछ तुम करते हो, उसे मन से प्रभु के लिए करो, मनुष्यों के लिए नहीं।” – कुलुस्सियों 3:23 (ERV-HI)
परमेश्वर की सेवा करना हमेशा सुविधाजनक नहीं लगता। कभी-कभी हम सोचते हैं, “जब मेरे पास और पैसा, घर या गाड़ी होगी, तब मैं देना या सेवा करना शुरू करूँगा।”
लेकिन यह सोच डर और गलत समझ पर आधारित है।
तीसरे सेवक ने डर को अपने निर्णयों पर हावी होने दिया। उसने अपने स्वामी को अविश्वास और आत्म-संरक्षण के चश्मे से देखा। जबकि बाकी सेवकों ने विश्वास किया और जोखिम के बावजूद कार्य किया।
जब स्वामी लौटा, उसने विश्वासयोग्य सेवकों की प्रशंसा की:
“धन्य है तू, अच्छा और विश्वासयोग्य सेवक; तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत पर अधिकार दूँगा। अपने स्वामी के आनंद में प्रवेश कर।” – मत्ती 25:21 (ERV-HI)
परंतु तीसरे सेवक को उसने डांटा:
“हे दुष्ट और आलसी सेवक… उसकी प्रतिभा उससे लेकर, उस को दो जो दस प्रतिभाएं रखता है… और उस निकम्मे सेवक को बाहर अंधकार में फेंक दो।” – मत्ती 25:26, 28, 30 (ERV-HI)
यह केवल धन की बात नहीं है। यह परमेश्वर के राज्य की जिम्मेदारी की बात है। परमेश्वर ने हम में से प्रत्येक को कुछ न कुछ सौंपा है—समय, गुण, संसाधन।
वह चाहता है कि हम उन्हें बुद्धिमानी और विश्वास से उपयोग करें, चाहे स्थिति कठिन हो या सुविधाजनक न हो।
आपको परमेश्वर की सेवा के लिए “पर्याप्त” होने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। वह आपसे वो नहीं मांगता जो आपके पास नहीं है— वह चाहता है कि आप जो कुछ आपके पास पहले से है, उसी का उपयोग करें।
अगर आपके पास केवल एक घंटा है—उसे दें। अगर थोड़ा है—तो उसे विश्वास से दें। परमेश्वर आपके हृदय को देखता है।
“हर एक जन जैसा अपने मन में ठान ले, वैसा ही दे; ना अनिच्छा से, ना दबाव में, क्योंकि परमेश्वर आनंद से देने वाले को प्रेम करता है।” – 2 कुरिन्थियों 9:7 (ERV-HI)
जब आप थोड़े में विश्वासयोग्य होते हैं, तो परमेश्वर आपको अधिक सौंपता है— जैसे कि उन सेवकों को नगरों का अधिकार दिया गया। (लूका 19:17)
डर, तुलना, या अव्यावहारिक अपेक्षाएँ आपको रोकने न दें। उस सेवक जैसे मत बनो जिसने अपनी प्रतिभा गाड़ दी। उनके जैसे बनो जिन्होंने जो था, उसी में कार्य किया—और भरपूर आशीष पाए।
आपको ऐसा लग सकता है कि आप अपनी कमी में से दे रहे हैं— लेकिन परमेश्वर के राज्य में, आज्ञाकारिता हमेशा फलदायी होती है।
जहाँ हैं वहीं से आरंभ करें। जो आपके पास है, उसका उपयोग करें। विश्वास से सेवा करें।
मुख्य प्रश्न
1 तीमुथियुस 4:3 में प्रेरित पौलुस ने बात की है कि कुछ लोग दूसरों को “विवाह करने से रोकते हैं।” इसका असल मतलब क्या है, और आज के लिए इसका क्या अर्थ है?
बाइबिल पद – 1 तीमुथियुस 4:1–3“परन्तु आत्मा स्पष्ट रूप से कहता है कि आने वाले समयों में कुछ लोग विश्वास से भटक जाएंगे, वे कपटपूर्ण आत्माओं और दानवों की शिक्षा के अनुसार काम करेंगे,झूठे लोगों की धोखे की चालों के कारण, जिनकी चेतना जलाई हुई है,जो विवाह को रोकते हैं और उन भोज्य पदार्थों से परहेज करते हैं जिन्हें परमेश्वर ने विश्वास रखने वालों के लिए धन्यवाद के साथ ग्रहण करने के लिए बनाया है, जो सत्य को जानते हैं।”(1 तीमुथियुस 4:1–3)
पौलुस, जो पवित्र आत्मा के नेतृत्व में लिख रहे थे, “आने वाले समयों” (ग्रीक शब्द: kairos, जिसका मतलब एक निर्णायक समय है) के बारे में भविष्यवाणी करते हैं। वे कहते हैं कि कुछ विश्वास वाले झूठी, दानवीय शिक्षाओं का पालन करेंगे। उन शिक्षाओं में से एक है विवाह पर रोक लगाना — जो कि परमेश्वर द्वारा बनाई गई एक बुनियादी संस्था है (उत्पत्ति 2:24)
“विवाह पर रोक लगाना” का असली मतलब क्या है?ग्रीक शब्द kōlyontōn का अर्थ है रोकना, अवरुद्ध करना, या किसी को कुछ उचित या अच्छा करने से रोकना। यह केवल सलाह देना नहीं है, बल्कि जानबूझकर परमेश्वर द्वारा स्थापित किसी चीज़ तक पहुँच को रोकना है।
यीशु ने भी इसी तरह की बात कही है:
“वे कानून के जानने वाले, तुम पर विपत्ति हो! क्योंकि तुम ज्ञान की कुंजी छीन ली है। तुम खुद अंदर नहीं गए, और जो अंदर जाना चाहते थे उन्हें रोक दिया।”(लूका 11:52)
यहाँ धार्मिक नेता परमेश्वर की सच्चाई को गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं, जिससे दूसरों को राज्य में प्रवेश से रोका जाता है।
यह आज कैसे होता है – व्यावहारिक उदाहरणपौलुस की चेतावनी केवल उनके समय तक सीमित नहीं थी—यह आज भी बहुत प्रासंगिक है। “विवाह पर रोक” के कई आधुनिक रूप मौजूद हैं, जो कभी-कभी सूक्ष्म या सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य होते हैं।
चर्चों में समलैंगिक “विवाह”कई संप्रदाय अब समलैंगिक विवाह को स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि ये पवित्र संबंध हैं। पर बाइबल में विवाह स्पष्ट रूप से एक पुरुष और एक महिला के बीच का संबंध है:
“इसलिए मनुष्य अपने पिता और माँ को छोड़कर अपनी पत्नी से जुड़ जाएगा, और दोनों एक देह होंगे।”(उत्पत्ति 2:24)
ग़लत संबंधों को स्वीकार करके ये चर्च लोगों को धोखा देते हैं कि वे परमेश्वर के सामने विवाहित हैं — जबकि सच तो यह है कि वे वास्तविक संविदात्मक विवाह में प्रवेश से वंचित हैं।
बाइबिल के अनुसार बिना विवाह के सहवासआज कई चर्चों में, जोड़े बिना विवाह के साथ रहते हैं, बच्चे पालते हैं, और ऐसा माना जाता है जैसे वे विवाहित हैं। जब नेतृत्व इस पाप को नहीं उठाता, तो वे सच्चाई को छुपाते हैं और उन जोड़ों को परमेश्वर की योजना का सम्मान करने से रोकते हैं।
“विवाह सभी के बीच सम्मानित हो, और विवाह का शय्यास्थान अविनाशी रहे, क्योंकि परमेश्वर व्यभिचारियों और व्यभिचारियों को न्याय देगा।”(इब्रानियों 13:4)
इस तरह की चुप्पी लोगों को बिना सुधार के पाप में बनाए रखती है और उन्हें सही विवाह से रोकती है।
बिना बाइबिल के आधार के पुनर्विवाहकुछ चर्च उन लोगों का विवाह करते हैं जिनका तलाक बाइबिल के अनुसार नहीं था, बिना उनकी पिछली स्थिति की जांच किए। यीशु ने स्पष्ट कहा है:
“जो अपनी पत्नी को तलाक देता है और दूसरी से विवाह करता है, वह व्यभिचारी है; और जो व्यभचारी महिला से विवाह करता है, वह भी व्यभिचारी है।”(लूका 16:18)
जब चर्च ऐसे संबंधों को स्वीकार करते हैं, तो वे अनजाने में किसी को आजीवन व्यभिचार में ले जाते हैं।
बहुविवाह (एक से अधिक पत्नियाँ)कुछ चर्च, खासकर कुछ संस्कृतियों में, पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की अनुमति देते हैं, पुराने नियम के उदाहरण जैसे सुलैमान या दाऊद का हवाला देते हैं। पर नया नियम विवाह में एक पति एक पत्नी का आदेश देता है:
“वरमंदरी वही हो जो दोषरहित हो, एक पत्नी का पति …”(1 तीमुथियुस 3:2)
हालांकि पुराने नियम में बहुविवाह था, वह कभी परमेश्वर की इच्छा नहीं थी। आज इसे स्वीकार करने वाली चर्च अपने सदस्यों को गुमराह करती हैं।
पाप को अनदेखा करना और सुधार न करनाजब चर्च अविवाहित जोड़ों के बीच असभ्य संबंधों को अनदेखा करते हैं — जो बिना विवाह के साथ रहते हैं, विवाह के बाहर संबंध रखते हैं, या एक साथ सोते हैं — वे सच्चाई छुपाते हैं।
यदि नेता बाइबिल की सच्चाई नहीं बताते, तो लोग कभी पाप की समझ से नहीं गुजरेंगे और विवाह नहीं करेंगे। वे पाप में रहेंगे और सोचेंगे कि वे परमेश्वर के साथ ठीक हैं।
“क्या तुम नहीं जानते कि अधर्मी परमेश्वर के राज्य को नहीं पाएंगे? धोखा मत खाओ: न व्यभिचारी … न वे परमेश्वर के राज्य को पाएंगे।”(1 कुरिन्थियों 6:9–10)
इस छल से कैसे बचें
परमेश्वर से पूर्ण प्रेम करो
“तुम अपने परमेश्वर से पूरे हृदय, पूरे प्राण और पूरे मन से प्रेम करो।”(मत्ती 22:37)
जब तुम परमेश्वर से पूरी तरह प्रेम करते हो, तब तुम उसकी सच्चाई खोजते हो, शास्त्र पढ़ते और समझते हो, और गलत शिक्षाओं को ठुकराते हो।
परमेश्वर के वचन में डूबो जाओ
“तेरा वचन मेरे पैर के लिए दीपक है, और मेरी राह के लिए ज्योति है।”(भजन संहिता 119:105)
परमेश्वर का वचन आध्यात्मिक धोखे से बचाता है। यदि तुम सत्य नहीं जानते, तो तुम झूठ के शिकार हो सकते हो — जैसे समलैंगिक विवाह, बहुविवाह, या बिना विवाह के सहवास को विवाह कहना।
लगातार प्रार्थना करो
“प्रार्थना में निरंतर रहो, उसमें सतर्क और कृतज्ञ रहो।”(कलुस्सियों 4:2)
प्रार्थना तुम्हारा विवेक तेज करती है और परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध को मजबूत बनाती है। यह तुम्हें सच्चाई में स्थिर रहने और सांस्कृतिक या सैद्धांतिक समझौते से बचने में मदद करता है।
अंतिम विचार: क्या तुम तैयार हो?
1 तीमुथियुस में पौलुस ने जिस छल से चेतावनी दी, वह आज भी सक्रिय है, खासकर विवाह के विषय में। वह धीरे-धीरे काम करता है—सांस्कृतिक प्रवृत्तियों, चर्च की परंपराओं, और पादरियों की चुप्पी के माध्यम से।
हमें जागना होगा और सच्चाई में चलना होगा। यदि तुम बाइबिल की शादी में नहीं हो या तुम्हारा रिश्ता शास्त्र के अनुसार नहीं है, तो परमेश्वर की खोज करो और पश्चाताप करो। हर उस व्यक्ति के लिए अनुग्रह है जो मसीह की ओर लौटता है।
“इसलिए पश्चाताप करो और अपनी ओर मुड़ो, कि तुम्हारे पाप मिट जाएं …”(प्रेरितों के काम 3:19)
और यदि तुमने यीशु मसीह को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता नहीं माना है, तो अब समय है। दिन कम हैं। प्रभु शीघ्र आने वाला है।
शलोम।
पुराने नियम में, कोढ़ केवल एक त्वचा रोग नहीं था — यह पाप, अशुद्धता और परमेश्वर के न्याय का प्रतीक था।जिस व्यक्ति को कोढ़ होता था, वह धार्मिक रीति से अशुद्ध माना जाता था और उसे समाज से अलग रहना होता था जब तक वह शुद्ध न हो जाए।यह दिखाता है कि पाप कैसे हमें परमेश्वर और दूसरों से अलग करता है।
“कोढ़ी… अकेला रहे; उसकी बस्ती छावनी के बाहर हो।”– लैव्यव्यवस्था 13:46
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि कोढ़ केवल लोगों को ही नहीं, बल्कि इमारतों को भी प्रभावित कर सकता था।लैव्यव्यवस्था 14:33–45 में परमेश्वर ने इस्राएलियों को चेतावनी दी कि जब वे प्रतिज्ञात देश में प्रवेश करेंगे, तो वह स्वयं किसी घर पर “कोढ़” ला सकता है — यह आत्मिक अशुद्धता का चिन्ह होता।
“जब तुम कनान देश में पहुंचो… और मैं तुम्हारे अधिकार के देश में किसी घर में कोढ़ की छाया डालूं…”– लैव्यव्यवस्था 14:34
उस घर की जांच याजक करता था।अगर रोग एक सप्ताह बाद भी बना रहता, या बढ़ जाता, और उसे ठीक नहीं किया जा सकता, तो वह घर पूरी तरह से तोड़ दिया जाता।यह परमेश्वर के न्याय का बाहरी चिन्ह था — न केवल भौतिक सड़न पर, बल्कि छिपे हुए भ्रष्टाचार पर।
धार्मिक दृष्टिकोण से यह दिखाता है कि परमेश्वर पवित्र और धर्मी है।वह केवल बाहरी कार्यों की ही परवाह नहीं करता, बल्कि वह हर छिपी बात को जानता है।प्राचीन काल में कुछ घर अन्याय, खून-खराबा, चोरी, रिश्वत, या यौन पाप से बनाए गए थे।
“हाय उन पर जो अनर्थ की युक्ति करते हैं… वे खेतों की लालसा करके उन्हें छीन लेते हैं, और घरों को भी…”– मीका 2:1–2
इस प्रकार, कोढ़ से पीड़ित घर भ्रष्टाचार का प्रतीक था।परमेश्वर उसे प्रकट करता, और यदि सफाई नहीं होती, तो वह नष्ट कर दिया जाता।
नए नियम में ध्यान शारीरिक घरों से हटकर आत्मिक घरों पर आता है — अर्थात हमारे शरीर।पौलुस सिखाता है कि विश्वासियों का शरीर अब पवित्र आत्मा का मन्दिर है:
“क्या तुम नहीं जानते कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है?”– 1 कुरिन्थियों 3:16
“यदि कोई परमेश्वर के मन्दिर को नाश करेगा, तो परमेश्वर उसे नाश करेगा। क्योंकि परमेश्वर का मन्दिर पवित्र है, और वह तुम हो।”– 1 कुरिन्थियों 3:17
इसका अर्थ है कि जैसे परमेश्वर ने कभी भ्रष्ट घरों का न्याय किया, वैसे ही वह अब हमारे जीवन की आत्मिक स्थिति का न्याय करता है।यदि हमारे भीतर पाप बसा है — जैसे यौन पाप, नशाखोरी, मूर्तिपूजा या चुगली — तो यह परमेश्वर के मन्दिर को अशुद्ध करता है।वह धैर्यशील है, लेकिन लगातार पाप न्याय को आमंत्रित करता है।
“शरीर के काम प्रकट हैं: व्यभिचार, अशुद्धता… मतवाला होना, उल्टी-सीधी और ऐसी ही बातें… जो ऐसा करते हैं, वे परमेश्वर के राज्य के अधिकारी न होंगे।”– गलतियों 5:19–21
यह सत्य है कि परमेश्वर हृदय को देखता है (1 शमूएल 16:7),लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वह हमारे कर्म या शरीर की उपेक्षा करता है।हमारा शरीर हमारी आत्मिक जीवन का हिस्सा है — यह या तो उपासना का उपकरण है, या अवज्ञा का।
“मैं तुमसे बिनती करता हूं… कि अपने शरीरों को जीवित, पवित्र और परमेश्वर को भाए ऐसी बलि के रूप में चढ़ाओ — यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।”– रोमियों 12:1
इसलिए, जैसे अश्लील वस्त्र पहनना, मादक पदार्थ लेना, या अश्लील सामग्री देखना, ये केवल “शारीरिक” पाप नहीं हैं — ये परमेश्वर के मन्दिर को अपवित्र करते हैं।और यदि परमेश्वर ने निर्जीव घरों का न्याय किया, तो वह उन जीवित मन्दिरों का न्याय क्यों नहीं करेगा, जिनमें उसका आत्मा वास करता है?
आप सोच सकते हैं, “अभी तक तो परमेश्वर ने कुछ नहीं किया।”जैसे याजक कोढ़ग्रस्त घर को सात दिन देता था, वैसे ही परमेश्वर भी हमें प्रायः पश्चाताप का समय देता है।लेकिन वह धैर्य अनुज्ञा नहीं — करुणा है।
“या तू उसकी भलाई, सहनशीलता और धीरज को तुच्छ जानता है? क्या तू नहीं जानता कि परमेश्वर की भलाई तुझे मन फिराव के लिए प्रेरित करती है?”– रोमियों 2:4
लेकिन यदि हम नहीं बदलते, तो न्याय आएगा — शायद शारीरिक रूप में नहीं, पर आत्मिक रूप से अवश्य।कोई व्यक्ति बाहरी रूप से जीवित दिखाई दे सकता है, पर भीतर से मृत हो सकता है — और अनन्त विभाजन की ओर बढ़ सकता है।
“तू जीवित कहलाता है, पर तू मरा हुआ है।”– प्रकाशितवाक्य 3:1
परमेश्वर चाहता है कि विश्वासी आत्मिक फल लाएं — आज्ञाकारिता, प्रेम, और धर्म।यदि हम निष्फल हैं, तो हम केवल भूमि को बेकार करते हैं — जैसे एक बंजर पेड़।
“देख, मैं तीन वर्ष से आकर इस अंजीर के पेड़ में फल ढूंढ़ता हूं, और कुछ नहीं पाता; उसे काट डाल! वह भूमि को क्यों घेरे रहता है?”– लूका 13:7
यदि परमेश्वर ने पुराने नियम में घरों का न्याय किया क्योंकि वे पाप से दूषित थे, तो वह आज हमें भी ज़िम्मेदार ठहराएगा।लेकिन यहाँ शुभ समाचार है — यीशु पवित्र करने और चंगा करने आया है।यदि हम मन फिराएं, तो वह क्षमा करता है और पुनःस्थापित करता है।केवल वही पाप के कोढ़ को हमारे जीवन से दूर कर सकता है।
“आओ, हम आपस में विचार करें, यहोवा की यही वाणी है: यदि तुम्हारे पाप लाल रंग जैसे हों, तो भी वे हिम के समान उजले हो जाएंगे।”– यशायाह 1:18
मसीह की ओर लौट आओ।यह संसार कभी तुम्हारी आत्मा की गहराई की भूख को शांत नहीं कर सकता।केवल यीशु ही चंगा कर सकता है, पुनःस्थापित कर सकता है, और तुम्हें सच्चा विश्राम दे सकता है।
परमेश्वर तुम्हें आशीष दे और तुम्हारी रक्षा करे, जब तुम उसे ढूंढ़ते हो।
(वंश/कुल) का अर्थ होता है परिवार की एक पीढ़ी या पूर्वजों का समूह। उदाहरण के लिए, आप कहीं पढ़ेंगे, “ये उनके पिता की कुलों के मुखिया थे।” इसका मतलब है, “ये उनके पिता की परिवार की पीढ़ी के मुखिया थे।” यह हमें परमेश्वर की वाचा की विश्वसनीयता, नेतृत्व व्यवस्था और आध्यात्मिक विरासत की महत्ता को समझने में मदद करता है।
1. (वंश/कुल) नेतृत्व और उत्तराधिकार की संरचना के रूप में
प्राचीन इस्राएल में नेतृत्व और संपत्ति वंशों के माध्यम से दी जाती थी। वंश वह विस्तृत परिवार था जो व्यक्ति को उसकी जनजाति और समाज में उसकी भूमिका से जोड़ता था।
1 राजा 8:1 “तब राजा सोलोमन ने इस्राएल के कुलों के मुखियों को बुलाया, और यहूदा के सभी मुख्यों को, यहोवा के धर्मबंध की पात्र को सिय्योन से, दाऊद के नगर से, लेकर आने के लिए।”
यहां कुलों के मुखियाओं को धर्मबंध की पात्र लाने के आध्यात्मिक कार्य का साक्षी बनने के लिए बुलाया गया, जो दिखाता है कि परिवार के मुखिया धार्मिक और सामाजिक अधिकार रखते थे।
2. युद्ध और समुदाय के संगठन में कुल
कुल अक्सर युद्ध और पूजा में भूमिका तय करते थे। परिवारों को उनकी वंशावली के अनुसार सेवा और जिम्मेदारी दी जाती थी।
1 इतिहास 7:4 “उनकी कुलवंशानुसार उनके पास 36,000 लड़ाके युद्ध के लिए तैयार थे, क्योंकि उनके कई शादियां और बच्चे थे।”
यह दर्शाता है कि कुल केवल खून का रिश्ता नहीं था—बल्कि समाज के संगठन में इसका व्यावहारिक महत्व था, विशेषकर रक्षा के लिए।
3. पूजा और मंदिर सेवा में कुल
मंदिर के कार्य भी कुलों के आधार पर बांटे गए थे, जो दिखाता है कि पूजा एक पारिवारिक विरासत थी।
1 इतिहास 9:33 “जो संगीतकार थे, लेवी कुलों के मुखिया थे, वे मंदिर के कक्षों में रहते थे और अन्य कार्यों से मुक्त थे क्योंकि वे दिन-रात सेवा के लिए जिम्मेदार थे।”
धार्मिक ज्ञान: परमेश्वर व्यवस्था और विरासत को महत्व देते हैं। पूजा अनियमित नहीं थी, बल्कि यह विश्वासयोग्य परिवारों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आती थी। यह मेल खाता है व्यवस्थाविवरण 6:6-7 से, जहाँ माता-पिता को परमेश्वर के आज्ञाओं को बच्चों को सिखाने के लिए कहा गया है।
4. मसीह की वंशावली में कुल और पहचान
नए नियम में भी वंश महत्वपूर्ण है—विशेषकर मसीह की मसीही पहचान की पुष्टि में।
लूका 1:26-27 “छठे महीने में परमेश्वर ने स्वर्गदूत गब्रियल को गलील के नगर नज़रथ भेजा, एक कन्या के पास जो यूसुफ नाम के पुरुष से सगाईशुदा थी, जो दाऊद की वंशावली से था। कन्या का नाम मरियम था।”
“दाऊद की वंशावली से” शब्द से पता चलता है कि यूसुफ दाऊद की कुल से था। यह पुष्टि करता है कि यीशु राजवंश से हैं, जैसा कि यशायाह 11:1 में भविष्यवाणी की गई है।
5. वंश वाचा की विश्वसनीयता का चिन्ह
वंश वाचा की पूर्ति में महत्वपूर्ण थे। नेहेमायाह में परिवारों का वापस आना और यरुशलेम का पुनर्निर्माण इसके उदाहरण हैं।
नेहेमायाह 10:34 “हम—कहने वाले, लेवी और लोग—हमने भाग डाला कि हमारे-अपने परिवारों में से कौन-कौन से परिवार साल के नियत समय पर परमेश्वर के घर में लकड़ी लाएगा, जिसे परमेश्वर के वेदी पर जलाया जाएगा, जैसा कि कानून में लिखा है।”
यह दिखाता है कि प्रत्येक कुल अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाता था।
आध्यात्मिक उपयोग
वंश को समझना हमें दिखाता है कि:
1 पतरस 2:9 कहता है: “पर तुम लोग चुनी हुई जाति, राजपुरोहित, पवित्र राष्ट्र, परमेश्वर की खास मिल्कियत हो…”
यह नया वंश है—एक आध्यात्मिक परिवार, जो अनुग्रह से, मसीह के द्वारा चुना गया है।
शलोम। आप अपने सांसारिक और आध्यात्मिक वंश में अपनी जगह को स्वीकार करें।
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स्वागत है जब हम परमेश्वर के वचन पर चिंतन करते हैं—जो हमारे जीवन और आत्मा के लिए सच्चा मार्गदर्शक है।
1. परमेश्वर की आज्ञाएँ मनमानी या परिवर्तनीय नहीं हैंधर्मशास्त्र की एक मूल सच्चाई है कि परमेश्वर अपरिवर्तनीय हैं—उनका स्वभाव, उद्देश्य और इच्छा कभी नहीं बदलती।
“मैं यहोवा हूँ, मैं नहीं बदलता; इसलिए हे याकूब के बच्चे, तुम नष्ट नहीं हुए।”— मलाकी 3:6
इसका मतलब यह भी है कि उनकी आज्ञाएँ सुस्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण हैं। जब परमेश्वर कोई आज्ञा देते हैं, तो वे पूर्ण आज्ञाकारिता की अपेक्षा करते हैं, जब तक कि वे स्पष्ट रूप से इसके पूरा होने या समाप्ति को न प्रकट करें।
दुर्भाग्यवश, आज कई विश्वासियों ने परमेश्वर की मूल आज्ञाओं को नजरअंदाज कर दिया है। वे नए प्रकाशनों के लिए प्रतीक्षा करते हैं या परिस्थितियों के अनुसार बदल जाते हैं, यह सोचते हुए कि परमेश्वर ने अपना मन बदल लिया होगा। यह सोच आध्यात्मिक स्थिरता, देरी से आशीर्वाद या दिव्य सुधार का कारण बनती है।
2. प्रथम आज्ञा को नजरअंदाज करने के बाइबिल उदाहरण
a. अवज्ञाकारी भविष्यवक्ता – 1 राजा 13परमेश्वर ने एक युवा भविष्यवक्ता को राजा येरोबोआम के पास एक विशिष्ट आदेश के साथ भेजा:
उसे न तो खाना, न पीना था, और न उसी रास्ते से लौटना था (1 राजा 13:9)।लेकिन अपने कार्य के बाद, एक वृद्ध भविष्यवक्ता ने झूठ बोला कि एक फरिश्ता ने नई आज्ञाएँ दी हैं (1 राजा 13:18)। उसने उस व्यक्ति पर विश्वास किया बजाय परमेश्वर की मूल आज्ञा के, और अवज्ञा कर दी — और एक शेर ने उसे मार डाला (1 राजा 13:24)।
धार्मिक समझ:यह कहानी एक महत्वपूर्ण सत्य प्रकट करती है: अनुभव, उम्र या पद परमेश्वर के वचन से ऊपर नहीं हैं।पौलुस ने विश्वासियों को चेतावनी दी कि वे “स्वर्ग से भी कोई फरिश्ता” जो अलग सुसमाचार लाए, उसे न स्वीकारें (गलातीयन्स 1:8)। परमेश्वर का वचन हमारी सर्वोच्च प्राधिकारी होना चाहिए।
b. बलाम का समझौता – गिनती 22बलाक को परमेश्वर ने शुरू में इस्राएल को शाप देने से मना किया था (गिनती 22:12)। फिर भी वह जोर देता रहा, और परमेश्वर ने उसे जाने दिया – लेकिन क्रोध और न्याय के साथ (गिनती 22:20–22)।
धार्मिक समझ:परमेश्वर कभी-कभी उन चीज़ों को अनुमति देते हैं जिनके लिए उन्होंने चेतावनी दी है — स्वीकृति के रूप में नहीं बल्कि न्याय के रूप में (रोमियों 1:24)। अवज्ञा जो “दैवी अनुमति” के रूप में छुपी हो, अक्सर आत्म-भ्रम होती है।
3. परमेश्वर के आदेश को त्यागने का खतरा – एज्रा 1–670 वर्षों के बाबुलनवास के बाद, परमेश्वर ने फारस के राजा कुरूस को प्रोत्साहित किया कि वे यहूदियों को यरूशलेम लौटने और मंदिर का पुनर्निर्माण करने की अनुमति दें, यह यिर्मयाह की भविष्यवाणी की पूर्ति थी।
“फारस के राजा कुरूस ने कहा: स्वर्ग के परमेश्वर यहोवा ने मुझे यरूशलेम में उसके लिए एक घर बनाने का आदेश दिया है।”— एज्रा 1:2
शुरू में लोग आज्ञाकारिता करते थे। परंतु विरोध उत्पन्न हुआ (एज्रा 4:1–5), और एक नया राजा निर्माण रोकने का आदेश जारी किया (एज्रा 4:23)। यहूदी हतोत्साहित हो गए और लगभग 16 वर्षों तक काम बंद रखा (हाग्गै 1:2–4)।
धार्मिक समझ:मानवीय विरोध दैवी आदेशों को समाप्त नहीं करता।
“हमें मनुष्यों से अधिक परमेश्वर का आज्ञाकारी होना चाहिए।”— प्रेरितों के काम 5:29
बाद में, परमेश्वर ने भविष्यवक्ताओं हाग्गै और जकरय्या को जगाया ताकि वे निर्माण फिर से शुरू करें (हाग्गै 1:4–8, जकरय्या 1:3–6)। देरी परमेश्वर की इच्छा में बदलाव के कारण नहीं थी, बल्कि उनकी डर और भूल के कारण थी।
4. अपरिवर्तनीय महान आयोग – मरकुस 16:15–16
येसु ने हमें एक स्पष्ट और अंतिम आदेश दिया:
“सारी दुनिया में जाकर सारे सृष्टि को सुसमाचार प्रचार करो। जो विश्वास करेगा और बपतिस्मा लेगा वह उद्धार पाएगा; जो विश्वास नहीं करेगा वह निंदा पाएगा।”— मरकुस 16:15–16
आज कई जगहों पर कानून प्रचार-प्रसार को रोकते हैं। कुछ मसीही कहते हैं, “शायद यह सही समय नहीं है।” परंतु परमेश्वर ने यह आदेश वापस नहीं लिया है।
धार्मिक समझ:येसु का आदेश सार्वभौमिक और कालातीत है। यह परमेश्वर की मिशन भावना का प्रतिबिंब है (मत्ती 28:19–20) और चर्च की पहचान का हिस्सा है। डर के कारण इसे टालना अविश्वास है।
5. बहाने और देरी अक्सर आध्यात्मिक जाल होते हैंकई विश्वासियों के शब्द:
“मैं बेहतर समय का इंतजार कर रहा हूँ।”
“मेरी वित्तीय स्थिति तैयार नहीं है।”
“परिवार की स्थिति जटिल है।”
पर ये अक्सर शत्रु के उपकरण होते हैं ताकि आपका आज्ञाकारिता टल जाए। भोज के दृष्टांत को याद करें—जिन्होंने बहाने बनाए, वे निकाल दिए गए (लूका 14:16–24)।
विश्वास में कार्रवाई जरूरी है—अनिश्चितता में भी।
“अपने सम्पूर्ण हृदय से यहोवा पर भरोसा रखो, और अपनी समझ पर भरोसा न करो।”— नीति वचन 3:5
6. विश्वास की यात्रा हमेशा आसान नहीं होतीपरमेश्वर की आज्ञा का पालन करना आसान नहीं होगा। विरोध, भ्रम और हतोत्साह होगा। लेकिन परमेश्वर हमारे साथ है।
“जब तुम पानी से गुजरोगे, मैं तुम्हारे साथ हूँ; जब तुम आग के बीच से चलोगे, तो जलो नहीं।”— यशायाह 43:2
यह वादा अब तक सत्य है—अब्राहम से लेकर मूसा, प्रारंभिक चर्च से आज तक।
निष्कर्ष: परमेश्वर की पहली आज्ञा पर बने रहेंपरमेश्वर दोमना नहीं हैं (याकूब 1:17)। उनकी पहली आज्ञा अभी भी बनी हुई है जब तक कि वे स्पष्ट रूप से उसे बदल न दें।
दबाव के कारण अपने बुलावे को न छोड़े।
भय या देरी को अपनी जिम्मेदारी न चुराने दें।
जब पहली आवाज़ स्पष्ट हो, दूसरी की प्रतीक्षा न करें।
आज्ञाकारिता करो, धैर्य रखो और विश्वास करो। परमेश्वर वफादार हैं और जो उन्होंने तुममें शुरू किया है उसे पूरा करेंगे (फिलिप्पियों 1:6)।
अगर आप चाहें तो मैं इसे खूबसूरती से फॉर्मेट किए हुए दस्तावेज़ या पीडीएफ भी बना सकता हूँ। क्या आप चाहते हैं?
उत्तर: आइए हम इस पद को ध्यानपूर्वक देखें।
दानिय्येल 9:21 “मैं प्रार्थना ही कर रहा था, कि वही पुरूष गब्रिएल, जिसे मैंने पहिले दर्शन में देखा था, बड़े वेग से उड़ता हुआ मेरे पास आ पहुंचा, और संध्या की भेट के समय के निकट मुझे छू लिया।”
यहाँ “बड़े वेग से उड़ता हुआ” यह दर्शाता है कि स्वर्गदूत गब्रिएल को परमेश्वर ने तुरंत और शीघ्रता से भेजा। यह केवल शारीरिक उड़ान नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि परमेश्वर अपने लोगों की प्रार्थनाओं का तत्काल उत्तर देता है। यह पद यह भी प्रकट करता है कि परमेश्वर अपने विश्वासयोग्य सेवकों की पुकार को सुनता है और विलंब नहीं करता।
इस विचार को यह आयत और बल देती है:
यशायाह 65:24 “वे पुकारेंगे, मैं उत्तर दूंगा; वे बोलेंगे ही, कि मैं सुन लूंगा।”
इस संदर्भ में, “तेज़ी से उड़ाया गया” यह दर्शाता है कि गब्रिएल परमेश्वर के दूत के रूप में कार्य कर रहा है — जो परमेश्वर की ओर से उत्तर लेकर तुरंत आता है। यह परमेश्वर की सार्वभौमिकता और समय एवं स्थान पर उसके नियंत्रण को दर्शाता है। पवित्र शास्त्र में परमेश्वर के दूतों को अकसर तेज़, शक्तिशाली और आज्ञाकारी बताया गया है।
भजन संहिता 103:20 “हे यहोवा के स्वर्गदूतों, उसकी स्तुति करो, हे बलवंत वीरों, जो उसका वचन मानते हो और उसके वचन का शब्द सुनते हो।”
हमें गब्रिएल की भूमिका के आध्यात्मिक महत्व को भी समझना चाहिए। बाइबल में गब्रिएल परमेश्वर का एक प्रमुख दूत है, जो उसकी इच्छा को लोगों तक पहुँचाता है।
लूका 1:19 “स्वर्गदूत ने उससे कहा, मैं गब्रिएल हूँ, जो परमेश्वर के सामने खड़ा रहता हूँ, और तेरे साथ बातें करने और तुझे यह शुभ समाचार सुनाने को भेजा गया हूँ।”
यह स्पष्ट करता है कि गब्रिएल परमेश्वर की ओर से सीधे भेजा गया एक अधिकृत दूत है, जिसे महत्त्वपूर्ण और जीवन परिवर्तक संदेश सौंपे जाते हैं।
गब्रिएल की शीघ्रता परमेश्वर की तत्परता को दर्शाती है, जिससे वह अपने लोगों को आशा और उद्धार का संदेश भेजता है। दानिय्येल के मामले में यह भविष्य की घटनाओं का प्रकाशन था, जो परमेश्वर की योजना का हिस्सा थीं। जकर्याह और मरियम के लिए यह संदेश मसीह के आगमन की घोषणा थी — उद्धार की योजना की पूर्ति।
दानिय्येल 8:16-17 “मैंने उलाई नदी के बीच में से एक मनुष्य का शब्द सुना, जिसने पुकार के कहा, ‘हे गब्रिएल, इसको दर्शन का अर्थ समझा दे।’ और वह जहां मैं खड़ा था, वहीं आया। जब वह मेरे पास आया, तो मैं भय के मारे भूमि पर गिर पड़ा; उसने मुझसे कहा, ‘हे मनुष्य के सन्तान, ध्यान दे, क्योंकि यह दर्शन अंतकाल की बातों का है।'”
यह प्रकट करता है कि परमेश्वर जब अपने लोगों से बात करना चाहता है, तो वह अपने दूतों के माध्यम से सीधे उन्हें अपने उद्देश्य प्रकट करता है।
नए नियम में गब्रिएल की भूमिका और भी स्पष्ट होती है। वह परमेश्वर की उद्धार की योजना के प्रमुख क्षणों को प्रकट करता है। उसने जकर्याह को युहन्ना बप्तिस्मा देनेवाले के जन्म की सूचना दी — जो यीशु मसीह का अग्रदूत था:
लूका 1:13-17 “स्वर्गदूत ने उससे कहा, ‘हे जकर्याह, मत डर! क्योंकि तेरी प्रार्थना सुन ली गई है, और तेरी पत्नी एलीशिबा तेरे लिए एक पुत्र उत्पन्न करेगी, और तू उसका नाम यूहन्ना रखना…'”
बाद में गब्रिएल कुँवारी मरियम को दिखाई देता है और उसे यीशु मसीह के जन्म का शुभ समाचार देता है:
लूका 1:26-33 “छठे महीने में परमेश्वर ने गब्रिएल स्वर्गदूत को गलील के नासरत नामक नगर में एक कुँवारी के पास भेजा… और उसने कहा, ‘देख, तू गर्भवती होगी, और एक पुत्र उत्पन्न करेगी, और उसका नाम यीशु रखना।'”
आज भले ही गब्रिएल के प्रत्यक्ष दर्शन आम नहीं हैं, फिर भी हम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर अब भी अपने वचन, पवित्र आत्मा और अपने सेवकों के माध्यम से अपने लोगों से बात करता है। उद्धार का संदेश आज भी वही है — यीशु मसीह के द्वारा। और परमेश्वर अब भी हमारे प्रार्थनाओं का उत्तर देता है, यद्यपि कभी-कभी वह हमारे विचार से भिन्न होता है।
क्या आपने मसीह को अपने जीवन में स्वीकार किया है? यीशु शीघ्र आनेवाला है।
मरानाथा!
1 कुरिन्थियों 16:22 “यदि कोई प्रभु से प्रेम नहीं करता, तो वह शापित हो; मरानाथा — हे प्रभु, आ!”
आज हम इस बात पर मनन करते हैं कि कैसे हमारी समस्याएँ कभी-कभी हमें अंधा कर देती हैं, ताकि हम उन चमत्कारों को न देख सकें जो परमेश्वर पहले से ही हमारे जीवन में कर रहा है। यह अंधापन अक्सर हमारी परेशानियों पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने के कारण आता है, जो हमें परमेश्वर के अद्भुत कार्यों को देखने से रोकता है — यहाँ तक कि जब वे हमारे सामने ही हो रहे हों।
बाइबल हमें याद दिलाती है कि परमेश्वर की प्रभुता हमारे जीवन में निरंतर काम कर रही है, भले ही हम उसे न पहचानें।
रोमियों 8:28 में पौलुस लिखता है:
“हम जानते हैं कि परमेश्वर सब बातों में उनके भले के लिये कार्य करता है जो उससे प्रेम रखते हैं, जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए गए हैं।” (रोमियों 8:28, ERV-HI)
यह पद हमें सिखाता है कि परमेश्वर हर स्थिति में कार्य कर रहा है — यहाँ तक कि उन क्षणों में भी जब हम इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते। यह बहुत आवश्यक है कि हम विश्वास रखें कि वह हर समय हमारे साथ सक्रिय और विश्वासयोग्य है, यहाँ तक कि हमारे दुःख में भी।
उस क्षण को याद कीजिए जब मसीह मारा गया और कब्र में रखा गया। बहुत कुछ उस समय घटित हो रहा था, परन्तु एक महत्वपूर्ण सीख हमें मरियम मगदलीनी से मिलती है। जब वह कब्र पर पहुँची, तो वह गहरे शोक में थी। उसने यीशु के चमत्कार देखे थे, उसका धर्ममय जीवन, उसका प्रेम और उसकी पूर्णता। पर अब उसे क्रूस पर चढ़ा दिया गया था और दफनाया गया था। और उससे भी दुखद बात — उसका शरीर वहाँ नहीं था। यह उसके लिए असहनीय था। वह इतनी दुखी थी कि कब्र से जा ही नहीं सकी — बस खड़ी रही और रोती रही।
लेकिन यहीं पर परमेश्वर की मुक्ति की योजना प्रकट होने लगती है।
यूहन्ना 20:11–13 में हम पढ़ते हैं:
“मरियम बाहर कब्र के पास खड़ी रो रही थी। वह रोते रोते झुककर कब्र की ओर देखती है, और देखती है कि दो स्वर्गदूत उजले कपड़े पहने हुए वहाँ बैठे हैं, एक सिराहने और दूसरा पैताहने, जहाँ यीशु की देह पड़ी थी। उन्होंने उससे पूछा, ‘हे नारी, तू क्यों रो रही है?’ उसने कहा, ‘वे मेरे प्रभु को उठा ले गए हैं और मैं नहीं जानती कि उन्होंने उसे कहाँ रखा है।'” (यूहन्ना 20:11–13)
ध्यान दीजिए कि वह दो स्वर्गदूतों के सामने खड़ी थी, फिर भी उसकी पीड़ा इतनी तीव्र थी कि वह उस चमत्कारी दृश्य को नहीं पहचान पाई। बाइबल में स्वर्गदूत परमेश्वर के संदेशवाहक होते हैं, और उनकी उपस्थिति इस बात का संकेत थी कि परमेश्वर कुछ अद्भुत करने वाला है। फिर भी, मरियम अपने दुःख में इतनी डूबी थी कि वह इसे नहीं देख पाई।
इसी तरह हम भी, जब दर्द और चिंता में होते हैं, परमेश्वर के कार्यों को नहीं देख पाते।
मरियम जब और रो रही थी, तब उसने किसी को देखा — उसने सोचा कि वह माली है। पर वास्तव में वह यीशु था, जी उठे प्रभु। उसने उससे वही प्रश्न पूछा: “तू क्यों रो रही है?” यही प्रश्न स्वर्गदूतों ने उससे पहले पूछा था।
यूहन्ना 20:15–16 में लिखा है:
“यीशु ने उससे कहा, ‘हे नारी, तू क्यों रो रही है? तू किसको ढूंढ़ रही है?’ उसने सोचा कि यह माली है, और कहा, ‘हे स्वामी, यदि तू ही उसे उठा ले गया है, तो मुझे बता कि तूने उसे कहाँ रखा है, ताकि मैं जाकर उसे ले आऊँ।’ यीशु ने उससे कहा, ‘मरियम!’ वह मुड़ी और उससे इब्रानी में कहा, ‘रब्बूनी!’ (जिसका अर्थ है: गुरु)।” (यूहन्ना 20:15–16)
जब यीशु ने उसे नाम लेकर पुकारा, तभी उसकी आँखें खुलीं। उसने उसे पहचान लिया, और उसका दुःख आनन्द में बदल गया।
धार्मिक रूप से यह क्षण बहुत गहरा है — यह मसीह के साथ उसके अनुयायियों के व्यक्तिगत और घनिष्ठ संबंध को प्रकट करता है। यीशु दूर या अनजाना नहीं रहा; उसने मरियम को उसके नाम से पुकारा, जैसे वह आज हमें भी पुकारता है।
यूहन्ना 10:27 में लिखा है:
“मेरी भेड़ें मेरी आवाज़ सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे-पीछे चलती हैं।” (यूहन्ना 10:27, ERV-HI)
यीशु हमें व्यक्तिगत रूप से जानता है। जब वह हमें हमारे नाम से पुकारता है, तो यह उसकी उपस्थिति की एक सुंदर और सशक्त याद दिलाता है — विशेष रूप से तब जब हम दुःख में खोए हुए होते हैं।
अगर यीशु ने उसे नाम लेकर नहीं पुकारा होता, तो मरियम उस चमत्कार को देख ही नहीं पाती जो उसके सामने घट रहा था। यह दिखाता है कि हमारी भावनाएँ और पीड़ा कैसे हमें अंधा कर सकती हैं।
गिनती 22 में यह सिद्धांत हमें बिलाम की कहानी में भी देखने को मिलता है। वह इस्राएल को शाप देने की यात्रा पर था, पर परमेश्वर ने उसकी गधी के माध्यम से उसे रोकने की कोशिश की। गधी ने उससे बात की, लेकिन बिलाम अपने मकसद में इतना लीन था कि उसने इस चमत्कार को नहीं पहचाना। वह उससे बहस करने लगा जैसे यह कोई सामान्य बात हो।
गिनती 22:28–31 कहती है:
“तब यहोवा ने गधी का मुँह खोल दिया, और उसने बिलाम से कहा, ‘मैंने तुझसे क्या किया कि तूने मुझे तीन बार मारा?’ बिलाम ने गधी से कहा, ‘क्योंकि तू मुझे चिढ़ा रही है! अगर मेरे पास तलवार होती तो मैं तुझे अभी मार डालता!’ गधी ने कहा, ‘क्या मैं तेरी वही गधी नहीं हूँ जिस पर तू हमेशा सवारी करता आया है? क्या मैंने तुझसे पहले कभी ऐसा किया?’ बिलाम ने कहा, ‘नहीं।’ तब यहोवा ने बिलाम की आँखें खोलीं, और उसने यहोवा के दूत को रास्ते में खड़े देखा, जिसकी तलवार हाथ में थी। तब वह झुक गया और मुँह के बल गिर पड़ा।” (गिनती 22:28–31)
बिलाम ने उस चमत्कार को नहीं पहचाना क्योंकि उसका ध्यान पहले ही कहीं और था। यह हमारे लिए एक चेतावनी है: जब हम अपनी समस्याओं पर अधिक ध्यान देते हैं, तो हम परमेश्वर की चमत्कारी गतिविधियों को नहीं देख पाते।
धार्मिक दृष्टिकोण से, मरियम मगदलीनी की यीशु से मुलाकात और बिलाम की गधी के साथ बातचीत – दोनों कहानियाँ हमें यह सिखाती हैं कि हम कितनी आसानी से परमेश्वर की उपस्थिति को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जब हम अपने दुःख, इच्छाओं या संघर्षों में उलझे रहते हैं।
फिर भी, पवित्रशास्त्र बार-बार हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर हमारे साथ है — यहाँ तक कि उन क्षणों में भी जब हम उसे नहीं पहचानते।
भजन संहिता 34:18 हमें आश्वस्त करती है:
“यहोवा टूटे मन वालों के समीप रहता है और पिसे हुए मन वालों को बचाता है।” (भजन संहिता 34:18)
आज मैं तुम्हें प्रोत्साहित करता हूँ: अपने मन को शांत करो। उस स्थान पर अब और मत रोओ जहाँ परमेश्वर पहले ही तुम्हारी प्रार्थना सुन चुका है। शोक में बने रहने के बजाय, परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हो जाओ। अपने चारों ओर देखो — और तुम पाओगे कि उसने तुम्हारे जीवन में पहले ही कितने अद्भुत कार्य शुरू कर दिए हैं।
परमेश्वर तुम्हें आशीष दे।