प्रश्न:क्या बाइबल अपने-आप से विरोध करती है कि यीशु ने पीलातुस को उत्तर दिया या नहीं?यूहन्ना 18:33–34 में लिखा है कि यीशु ने पीलातुस को उत्तर दिया, लेकिन मत्ती 27:13–14 में लिखा है कि उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। फिर सही क्या है?
उत्तर:सबसे पहले, यह समझना बहुत आवश्यक है कि बाइबल अपने-आप से विरोधाभास नहीं करती। जो चीजें हमें विरोधाभास जैसी लगती हैं, वे अक्सर हमारे अधूरे समझ या गलत व्याख्या के कारण होती हैं। बाइबल पवित्र और परमेश्वर की प्रेरणा से लिखी गई है (2 तीमुथियुस 3:16), इसलिए उसमें कोई गलती नहीं है।
आइए दोनों संदर्भों को ध्यान से देखें।
यहाँ पीलातुस यीशु से पूछता है कि क्या वे यहूदियों के राजा हैं। यीशु उत्तर देते हैं और यह स्पष्ट करते हैं कि उनका राज्य इस संसार का नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण आत्मिक सत्य है यीशु कोई राजनीतिक राज्य स्थापित करने नहीं आए थे, बल्कि उनका राज्य आत्मिक है, जो इस संसार की व्यवस्थाओं से ऊपर है (यूहन्ना 18:36)।
यूहन्ना 18:36“यीशु ने उत्तर दिया, ‘मेरा राज्य इस संसार का नहीं है… मेरा राज्य तो किसी और स्थान का है।’”
यहाँ जब पीलातुस यीशु से पूछता है कि क्या वे यहूदियों के राजा हैं, तो यीशु संक्षिप्त उत्तर देते हैं—“जैसा तू कहता है वैसा ही है।”लेकिन जब महायाजक और पुरनिए उन पर दोष लगाते हैं, तो यीशु चुप रहते हैं।
मत्ती 27:12–14“जब महायाजकों और पुरनियों ने उन पर दोष लगाया, तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया… परन्तु उन्होंने उसको एक भी उत्तर नहीं दिया; इससे राज्यपाल बहुत अचंभित हुआ।”
यीशु की यह चुप्पी गहरी आत्मिक महत्ता रखती है। पुराने नियम में भविष्यवाणी की गई थी कि मसीह अपने आरोप लगाने वालों के सामने मौन रहेगा (यशायाह 53:7), और यीशु ने इस भविष्यवाणी को पूरा किया। यह उनके पूर्ण समर्पण और उद्धार की दिव्य योजना को स्वीकार करने का प्रमाण है (रोमियों 5:8)।
नहीं! बिलकुल नहीं। दोनों वर्णन एक ही घटना के अलग-अलग पहलुओं को दिखाते हैं।
पहले, पीलातुस के सीधे प्रश्न “क्या तुम यहूदियों के राजा हो?” का यीशु उत्तर देते हैं (मत्ती 27:11)। लेकिन जब धार्मिक नेता झूठे आरोप लगाते हैं, यीशु चुप रहते हैं (मत्ती 27:12–14)। बाद में, पीलातुस द्वारा निजी बातचीत में पूछे गए प्रश्नों का यीशु विस्तार से उत्तर देते हैं (यूहन्ना 18:33–37), और अपने राज्य के आत्मिक स्वरूप को स्पष्ट करते हैं।
इसलिए कोई विरोधाभास नहीं है सिर्फ अलग-अलग परिस्थितियाँ हैं।
क्योंकि वे सत्य की खोज नहीं कर रहे थे। उनका उद्देश्य छल, आरोप और यीशु को दोषी ठहराना था। इसलिए यीशु ने मौन रहकर परमेश्वर की इच्छा को पूरा किया।
इसके विपरीत, जब पीलातुस ने सच्चाई जानने की भावना से प्रश्न पूछा, तब यीशु ने उत्तर दिया। इससे हमें यह सीख मिलती है कि कब बोलना उचित है और कब मौन रहना बुद्धिमानी है।
कभी-कभी आरोपों, बहसों और व्यर्थ विवादों के सामने चुप रहना ही सर्वोत्तम उत्तर होता है। जब लोग सत्य की खोज नहीं, बल्कि झगड़ा और आरोप चाहते हैं, तब मौन रहना बुद्धिमानी है।
तीतुस 3:9–10“मूर्खता के विवादों, वंशावलियों, झगड़ों और व्यवस्था के बारे में वाद-विवादों से दूर रहो, क्योंकि ये निरर्थक और बेकार हैं…।”
यीशु हमें सिखाते हैं कि हर प्रश्न का उत्तर देना आवश्यक नहीं; कभी-कभी मौन ही सबसे शक्तिशाली साक्षी होता है।
परमेश्वर आपको आशीष दे। 🙏अगर चाहें तो मैं इसे और सरल, हिंदी बाइबल के किसी अन्य संस्करण या हिंदी बोलचाल की शैली में भी लिख सकता हूँ।
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