1. अशुद्धता क्या है?
अशुद्धता वह सब कुछ है जो परमेश्वर के सामने हमारी पवित्रता को बिगाड़ता या मैला करता है। यह ज़रूरी नहीं कि कोई बड़ा पाप ही हो—even छोटे-छोटे पाप भी पवित्र जीवन को दागदार बना देते हैं।
जैसे एक सफ़ेद कपड़े पर स्याही की एक बूँद भी उसे गंदा दिखा देती है, वैसे ही एक छोटा-सा गलत विचार या काम भी हमारे जीवन की पवित्रता को खराब कर देता है। शास्त्र कहता है:
“तेरी आँखें इतनी पवित्र हैं कि तू बुराई को देख ही नहीं सकता। तू बुराई को बर्दाश्त नहीं कर सकता।” (हबक्कूक 1:13, ERV-HI)
परमेश्वर पवित्र है और वह अपने लोगों को भी पवित्र होने के लिए बुलाता है (लैव्यवस्था 19:2)।
2. पुराने नियम में अशुद्धता
व्यवस्था में परमेश्वर ने इस्राएलियों को बताया कि कौन-सी बातें किसी को अशुद्ध बना देती हैं:
- किसी मृत शरीर को छूना—ऐसा करने वाला सात दिन तक अशुद्ध रहता था (गिनती 19:12)।
- कुछ जानवर, जैसे सूअर, अशुद्ध माने जाते थे। उन्हें खाना व्यक्ति को अशुद्ध कर देता था (लैव्यवस्था 11:7)।
- शारीरिक स्राव पुरुष और स्त्री दोनों को अशुद्ध कर देता था जब तक कि शुद्धि न हो जाए (लैव्यवस्था 15:16–33)।
- बच्चे के जन्म के बाद भी निश्चित समय तक स्त्री अशुद्ध मानी जाती थी (लैव्यवस्था 12:4–5)।
उन दिनों, चाहे व्यक्ति ने स्नान क्यों न कर लिया हो, फिर भी वह परमेश्वर की सभा में नहीं जा सकता था। इससे पता चलता है कि परमेश्वर पवित्रता को कितना गंभीर मानता है।
“जो कोई उन्हें छुएगा वह अशुद्ध हो जायेगा। उसको अपने वस्त्र धोने होंगे और पानी से स्नान करना होगा। वह शाम तक अशुद्ध रहेगा।” (लैव्यवस्था 15:27, ERV-HI)
अगर कोई इन नियमों का पालन न करता, तो उसकी मृत्यु तक हो सकती थी। यह हमें दिखाता है कि परमेश्वर की पवित्रता के सामने आने से पहले शुद्ध होना कितना आवश्यक है।
3. नए नियम में अशुद्धता
यीशु ने आकर सिखाया कि असली अशुद्धता बाहरी नहीं, बल्कि मन की होती है। उन्होंने कहा:
“पर जो बातें मुँह से निकलती हैं, वे मन से आती हैं और वही किसी को अशुद्ध कर सकती हैं। क्योंकि बुरे विचार मन से ही आते हैं। ये बुरे विचार किसी को हत्या करने, व्यभिचार करने, कोई अन्य यौन पाप करने, चोरी करने, झूठी गवाही देने और परमेश्वर के विरुद्ध अपमानजनक बातें कहने के लिये प्रेरित करते हैं। ये बातें हैं जो लोगों को अशुद्ध बनाती हैं।” (मत्ती 15:18–20, ERV-HI)
इसलिए मसीह में सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि हम किसी बाहरी अशुद्ध वस्तु को छू लें, बल्कि यह कि हमारे विचार, वचन या कर्म पाप से दूषित हो जाएँ।
पौलुस भी कहता है:
“इसलिये हे मित्रों, जब हमें ये प्रतिज्ञाएँ मिली हैं, तो हमें अपने को हर प्रकार की शारीरिक और आत्मिक अशुद्धियों से शुद्ध करना चाहिये। हमें परमेश्वर के प्रति डर और श्रद्धा में पवित्र जीवन जीना चाहिये।” (2 कुरिन्थियों 7:1, ERV-HI)
4. अशुद्धता के परिणाम
अशुद्धता परमेश्वर से हमारी संगति को तोड़ देती है। जैसे पुराने नियम में अशुद्ध व्यक्ति सभा में प्रवेश नहीं कर सकता था, वैसे ही आज पाप हमें परमेश्वर की निकटता से दूर कर देता है।
यशायाह लिखता है:
“किन्तु तुम्हारे पाप ही वे बातें हैं जिनके कारण तुम्हारे और तुम्हारे परमेश्वर के बीच में दूरी हो गई है। तुम्हारे पापों के कारण ही उसने मुँह छिपा लिया है। इसलिये वह तुम्हारी बात नहीं सुनता।” (यशायाह 59:2, ERV-HI)
इसी कारण जब हम चुगली, बुरी बातें, वासना या गंदे विचारों में पड़ जाते हैं, तो आत्मिक रूप से सूखा महसूस करते हैं। प्रार्थना कठिन लगती है और परमेश्वर की उपस्थिति का अनुभव कम हो जाता है।
5. अशुद्धता से बचने के उपाय
बाइबल हमें स्पष्ट शिक्षा देती है:
- मन की रक्षा करो – पापी विचारों को जगह मत दो। पौलुस कहते हैं:
“हम हर विचार को पकड़ कर उसे मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं।” (2 कुरिन्थियों 10:5, ERV-HI)
- आँखों और कानों की रक्षा करो – ध्यान रखो क्या देखते और सुनते हो। दुनियावी फ़िल्में, अश्लील गीत, चुगली और भ्रष्ट बातें आत्मा को अशुद्ध कर देती हैं।
- जीभ की रक्षा करो – गाली, चुगली और बेकार की बातें मत बोलो। याकूब लिखते हैं:
“यदि कोई यह सोचता है कि वह धार्मिक है किन्तु अपनी जीभ पर नियन्त्रण नहीं रखता तो वह अपने को धोखा देता है और उसका धर्म व्यर्थ है।” (याकूब 1:26, ERV-HI)
- हृदय की रक्षा करो –
“सब से बढ़कर तू अपने मन की रक्षा करना क्योंकि तेरे जीवन के सारे स्रोत उसी से निकलते हैं।” (नीतिवचन 4:23, ERV-HI)
इसका रहस्य यही है कि हम अपने मन और हृदय को परमेश्वर के वचन और उसकी प्रतिज्ञाओं से भरें। तभी हम पाप की अशुद्धता का विरोध कर पाएंगे।
निष्कर्ष
अशुद्धता कोई हल्की बात नहीं है। यह हमें परमेश्वर की निकटता से वंचित कर सकती है, हमारी प्रार्थना को कमजोर कर सकती है और यदि अनदेखा किया जाए तो आत्मिक मृत्यु तक पहुँचा सकती है।
परन्तु मसीह में हमें क्षमा और शुद्धि मिलती है:
“यदि हम अपने पापों को स्वीकार करें, तो वह विश्वासी और धर्मी है। वह हमारे पापों को क्षमा करेगा और हमें सब अधर्म से शुद्ध करेगा।” (1 यूहन्ना 1:9, ERV-HI)
इसलिए हम पवित्रता में चलें और हर प्रकार की अशुद्धता से अपने आप को बचाए रखें ताकि परमेश्वर के साथ हमारा मार्ग अवरुद्ध न हो।
“धन्य हैं वे जिनका मन शुद्ध है, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।” (मत्ती 5:8, ERV-HI)
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