Title 2024

बाइबल की किताबों का विभाजन

बाइबल, परमेश्वर का प्रेरित वचन, दो भागों में विभाजित है: पुराना नियम और नया नियम। हर भाग में परमेश्वर की योजना और मानवता के लिए संदेश अलग-अलग दृष्टिकोण से सामने आता है।


पुराना नियम 

पुराना नियम मुख्य रूप से चार विषयों में विभाजित है: परमेश्वर का वाचा, इस्राएल का इतिहास, ज्ञान और जीवन के सिद्धांत, और भविष्यवाणी जो आने वाले मसीहा की ओर संकेत करती है।


1. कानून (तोरा)

तोरा इस्राएल के साथ परमेश्वर के वाचा की नींव है। ये किताबें परमेश्वर के चरित्र, धर्मपूर्ण जीवन और उद्धार की योजना को प्रकट करती हैं, जो अंततः मसीह में पूरी हुई (मत्ती 5:17 – “मैं यह नहीं समझता कि मैं परमेश्वर के नियम या भविष्यवक्ताओं को मिटाने आया हूँ; मैं उन्हें पूरा करने आया हूँ।”)

पुस्तक लेखक अध्याय लेखन स्थल धार्मिक टिप्पणी
उत्पत्ति (Genesis) मूसा 50 रेगिस्तान सृष्टि, मानव का पतन, परमेश्वर के वाचा और उद्धार योजना की शुरुआत (उत्पत्ति 3:15)।
निर्गमन (Exodus) मूसा 40 रेगिस्तान परमेश्वर को उद्धारक और मुक्तिदाता के रूप में दिखाता है, जो मसीह के रक्त की पूर्वसूचना है (निर्गमन 12; यूहन्ना 1:29)।
लैव्यव्यवस्था (Leviticus) मूसा 27 रेगिस्तान परमेश्वर की पवित्रता और बलिदान व्यवस्था का प्रदर्शन; मसीह के अंतिम प्रायश्चित की ओर संकेत (इब्रानियों 10:1-10)।
गिनती (Numbers) मूसा 36 रेगिस्तान मानव असफलता के बावजूद परमेश्वर की निष्ठा दिखाता है।
व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) मूसा 34 रेगिस्तान वाचा की आज्ञाओं और प्रेम पर जोर; मसीह के प्रेम के नियम की पूर्वसूचना (व्यवस्थाविवरण 6:5; मत्ती 22:37)।

2. ऐतिहासिक पुस्तकें 

ये किताबें परमेश्वर के वाचा के क्रियान्वयन को दिखाती हैं—उनकी निष्ठा, न्याय और इतिहास पर प्रभुत्व। साथ ही ये मसीहा की तैयारी भी दिखाती हैं।

पुस्तक लेखक अध्याय लेखन स्थल धार्मिक टिप्पणी
यहोशू (Joshua) यहोशू 24 कैनान परमेश्वर की वाचा में विश्वासयोग्यता; वादाकृत भूमि का वितरण।
न्यायियों (Judges) शमूएल 21 इस्राएल पाप और उद्धार का चक्र; धार्मिक और निष्ठावान राजा की आवश्यकता (न्यायियों 21:25)।
रूथ (Ruth) शमूएल 4 इस्राएल परमेश्वर की देखभाल और मसीह के क़रीबी उद्धारक की पूर्वसूचना (रूथ 4:14-17)।
1 शमूएल (1 Samuel) शमूएल 31 इस्राएल परमेश्वर नेता उठाता है; मसीह सच्चा राजा हैं (1 शमूएल 8:7; मत्ती 21:5)।
2 शमूएल (2 Samuel) एज़्रा 24 इस्राएल दाऊदिक वाचा की स्थापना; मसीहा का वचन (2 शमूएल 7:12-16)।
1 राजा (1 Kings) यिर्मयाह 22 इस्राएल अवज्ञा पर परमेश्वर का न्याय।
2 राजा (2 Kings) यिर्मयाह 25 इस्राएल न्याय की निरंतरता; निर्वासन के बावजूद परमेश्वर की निष्ठा।
1 इतिहास (1 Chronicles) एज़्रा 29 फारस दाऊद के वाचा पर प्रकाश; उपासना पर ध्यान।
2 इतिहास (2 Chronicles) एज़्रा 36 फारस मंदिर उपासना, राजत्व और परमेश्वर की दया पर जोर।
एज़्रा (Ezra) एज़्रा 10 इस्राएल वाचा की आज्ञा का पुनर्निर्माण।
नेहेमायाह (Nehemiah) नेहेमायाह 13 इस्राएल आध्यात्मिक और भौतिक पुनर्निर्माण; प्रार्थना और आज्ञाकारिता का महत्व।
एस्तेर (Esther) मोरदेकई 10 सूसा, फारस परमेश्वर की देखभाल भले ही उसका नाम न लिखा गया हो।

3. काव्य और ज्ञान की पुस्तकें (Poetic & Wisdom Books)

ये किताबें उपासना, ज्ञान और धर्मपूर्ण जीवन की शिक्षा देती हैं। ये परमेश्वर का भय और उसकी ओर निर्भरता सिखाती हैं।

पुस्तक लेखक अध्याय लेखन स्थल धार्मिक टिप्पणी
अय्यूब (Job) मूसा 42 रेगिस्तान दुःख और परमेश्वर की सर्वोच्चता (अय्यूब 1:21)।
भजन संहिता (Psalms) दाऊद, श्लोम, आसाफ आदि 150 इस्राएल उपासना, प्रार्थना, भविष्यवाणी और मसीहा की पूर्वसूचना (भजन 22)।
नीतिवचन (Proverbs) श्लोम 31 यरूशलेम ज्ञान, परमेश्वर का भय और नैतिक जीवन (नीतिवचन 1:7)।
सभोपदेशक (Ecclesiastes) श्लोम 12 यरूशलेम बिना परमेश्वर जीवन व्यर्थ; असली उद्देश्य उसमें (सभोपदेशक 12:13)।
शिर्षगीत (Song of Solomon) श्लोम 8 यरूशलेम मानव प्रेम के माध्यम से परमेश्वर की वाचा और प्रेम।

4. प्रमुख भविष्यवक्ताएँ 

पुस्तक लेखक अध्याय लेखन स्थल धार्मिक टिप्पणी
यशायाह (Isaiah) यशायाह 66 इस्राएल मसीहा की भविष्यवाणी; सभी जातियों के लिए उद्धार (यशायाह 53)।
यिर्मयाह (Jeremiah) यिर्मयाह 52 यरूशलेम न्याय का चेतावनी और पुनर्स्थापना की आशा (यिर्मयाह 31:31-34)।
विलापगीत (Lamentations) यिर्मयाह 5 मिस्र पाप पर परमेश्वर का दुःख; पीड़ा में उसकी निष्ठा।
यहेजकेल (Ezekiel) यहेजकेल 48 बबीलोन परमेश्वर का न्याय और भविष्य की पुनर्स्थापना।
दानिय्येल (Daniel) दानिय्येल 12 बबीलोन परमेश्वर का राज्य विजयी होगा; मसीह के अनन्त राज्य की भविष्यवाणी।

5. लघु भविष्यवक्ताएँ 

पुस्तक लेखक अध्याय लेखन स्थल धार्मिक टिप्पणी
होशे (Hosea) होशे 14 इस्राएल इस्राएल की अविश्वास के बावजूद परमेश्वर का प्रेम।
योएल (Joel) योएल 3 इस्राएल प्रभु का दिन; आत्मा की वर्षा (योएल 2:28)।
आमोस (Amos) आमोस 9 इस्राएल सामाजिक न्याय और परमेश्वर की धर्मिता।
ओबद्याह (Obadiah) ओबद्याह 1 इस्राएल एडोम का न्याय; राष्ट्रों पर परमेश्वर की सर्वोच्चता।
योना (Jonah) योना 4 इस्राएल परमेश्वर की दया इस्राएल से परे भी।
मीका (Micah) मीका 7 इस्राएल परमेश्वर का न्याय और मसीहा की पूर्वसूचना (मीका 5:2)।
नाहूम (Nahum) नाहूम 3 इस्राएल निनवेह पर न्याय; परमेश्वर की न्यायप्रियता।
हबक्कूक (Habakkuk) हबक्कूक 3 इस्राएल परिस्थितियों में भी परमेश्वर पर विश्वास (हबक्कूक 2:4)।
सिफन्याह (Zephaniah) सिफन्याह 3 इस्राएल प्रभु का दिन; पश्चाताप का आह्वान।
हाग्गै (Haggai) हाग्गै 2 इस्राएल परमेश्वर के घर को प्राथमिकता देने का आह्वान।
ज़कर्याह (Zechariah) ज़कर्याह 14 इस्राएल मसीही आशा और परमेश्वर की अंतिम विजय।
मलाकी (Malachi) मलाकी 4 इस्राएल संदेशवाहक की पूर्वसूचना (मलाकी 3:1; यूहन्ना 1:23)।

 

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क्या यह परमेश्वर है या स्वर्गदूत?

प्रश्न:

भजन संहिता 8:4–5 और इब्रानियों 2:6–7 में क्या बाइबल खुद से विरोध करती है? भजन 8 कहता है कि मनुष्य “परमेश्वर से थोड़े ही कम बनाया गया,” जबकि इब्रानियों कहता है कि “स्वर्गदूतों से थोड़े ही कम बनाया गया।” यह कैसे समझें?

उत्तर:
पहली नजर में यह भ्रमित करने वाला लग सकता है, लेकिन बाइबल स्वयं में विरोधाभासी नहीं है।

आइए श्लोक देखें:

भजन संहिता 8:4–5 (हिंदी सर्वमान्य बाइबल)
“मनुष्य क्या है कि तू उसका ध्यान रखता है, और मानव पुत्र क्या है कि तू उसे देखता है? तूने उसे थोड़े ही कम परमेश्वर से बनाया, और महिमा और गौरव से उसे सजाया।”

इब्रानियों 2:6–7 (हिंदी सर्वमान्य बाइबल)
“मनुष्य क्या है कि तू उसका ध्यान रखता है, या मानव पुत्र क्या है कि तू उसकी परवाह करता है? तूने उसे स्वर्गदूतों से थोड़े ही कम बनाया, और महिमा और गौरव से उसे सजाया।”

इस अंतर को समझने की कुंजी मूल हिब्रू शब्द “एलोहीम” है, जिसे भजन 8:5 में “परमेश्वर” के रूप में अनुवादित किया गया। “एलोहीम” आमतौर पर सच्चे परमेश्वर (यहोवा) के लिए इस्तेमाल होता है, लेकिन संदर्भ के अनुसार इसका अर्थ दैवीय प्राणी या स्वर्गदूत भी हो सकता है (भजन 82:1 देखें)।

इब्रानियों, जो ग्रीक में लिखा गया था, इस व्यापक अर्थ को दर्शाता है और इसे “स्वर्गदूतों” के रूप में अनुवादित करता है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है: मानवता की स्थिति आध्यात्मिक व्यवस्था में स्वर्गदूतों के ठीक नीचे है।

यह श्लोक यह दिखाता है कि मानवता का परमेश्वर की रचना में विशेष स्थान है—स्वर्गदूतों से थोड़ी ही कम बनाई गई, लेकिन महिमा और सम्मान से सजाई गई (उत्पत्ति 1:26–27)। यह मानव की गरिमा और जिम्मेदारी को भी दर्शाता है, क्योंकि उसे परमेश्वर के कार्यों पर अधिकार सौंपा गया है (इब्रानियों 2:7)।

यह समझ बाइबल में अन्य उदाहरणों के अनुरूप है:

  • “इस्राएल” व्यक्तिगत याकूब (उत्पत्ति 35:10) या पूरी जाति/राष्ट्र (निर्गमन 5:2) के लिए प्रयुक्त होता है।
  • “यहूदा” किसी व्यक्ति या जनजाति/राज्य के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है।

इसलिए, इब्रानियों भजन 8 का विरोध नहीं कर रहा है। यह स्पष्ट कर रहा है कि भजन 8:5 में “परमेश्वर” का आशय दैवीय परिषद या स्वर्गीय प्राणी हैं, जिनमें स्वर्गदूत भी शामिल हैं।

भगवान आपका भला करें।

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धर्मार्थ (दान) शैतानी वेदियों की शक्ति को नष्ट करता है

 

(भेंट और दान पर विशेष शिक्षाएँ)

स्वागत है! आइए हम बाइबल का अध्ययन करें  परमेश्वर का यह पवित्र वचन जो हमारे मार्ग को प्रकाशित करता है और हमारे कदमों को दिशा देता है। “तेरा वचन मेरे पांव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है।” (bible.com)


नए वाचा में दान की शक्ति

ईसा मसीह के अनुयायी होने का एक महत्वपूर्ण पहलू दान और उदारता है। यीशु ने अपने उपदेशों में उदार आत्मा को आध्यात्मिक वृद्धि और शक्तिशाली मुक्ति के साथ जोड़ा। पोतलुस हमें लिखते हैं कि:

हर एक जन जैसा मन में ठाने वैसा ही दान करे, न कुढ़ कुढ़ के, न दबाव से; क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम करता है।” (bible.com)

यह दिखाता है कि दान केवल एक वित्तीय कार्य नहीं, बल्कि यह हमारे विश्वास और परमेश्वर के प्रति हमारी आत्म‑समर्पण की अभिव्यक्ति है। जब हम ईश्वर को खुशी से अपनी भेंट चढ़ाते हैं, तो हम उसके हाथ में अपने जीवन और संसाधनों को सौंपते हैं।

लेकिन शैतान इस सत्य को जानता है। इसलिए वह धार्मिक भ्रम, गलत शिक्षाएँ और भय का उपयोग करता है ताकि लोग दान से कतराएँ या आत्म‑समर्पण न करें। ऐसे लोग दान को नकारात्मक रूप से पेश करते हैं और लोगों को डराते हैं कि “दान देना आपके लिये हानिकारक होगा।” लेकिन वास्तव में, दान ही शैतानी शक्तियों को कमजोर करता है और परमेश्वर की कृपा को बुलाता है


दान की शक्ति: शैतानी वेदियों का नाश

धर्मार्थ की एक सबसे महत्वपूर्ण शक्ति यह है कि यह शैतानी वेदियों को नष्ट करता है — वे आध्यात्मिक प्लेटफॉर्म जिनके द्वारा शत्रु परिवारों, समुदायों और राष्ट्रों पर प्रभाव डालता है।

कुछ वेदियाँ केवल प्रार्थना से नहीं नष्ट होतीं; दान और भेंट की शक्ति से ही वे टूटती हैं।


गिदोन की कहानी और बाअल वेदी का नाश

जब परमेश्वर ने गिदोन को बुलाया, उसने उसे एक कठिन आध्यात्मिक कार्य दिया:

“अपने पिता का सात वर्ष का बैल ले,
बाअल की वेदी को गिरा दे,
आशेरा के खम्भों को काट दे…
फिर उस स्थान पर अपने परमेश्वर के लिए एक वेदी बनाया
और उस बैल को यज्ञ के रूप में चढ़ाया।”
(Bible Gateway)

यह आदेश केवल एक भौतिक कार्य नहीं था — यह एक आध्यात्मिक लड़ाई का निर्देश था। गिदोन को अपने घर की मूर्तिपूजा व्यवस्था और शैतानी प्रभाव से सीधे टकराना था।

यह कहानी हमें चार महत्वपूर्ण आध्यात्मिक कदम सिखाती है:


अपने पिता का बैल लेना

यह कदम दर्शाता है कि हमें अपने घर और पीढ़ीगत बंधनों से लड़ना होगा।
शैतानी प्रतीक और आदान‑प्रदान पर आधारित शक्तियाँ अक्सर हमारे पूर्वजों और जीवन की संरचनाओं में गहराई से बसी होती हैं।

प्रभु हमें बुलाता है कि हम उन्हें अपने जीवन के केंद्र में रखें, न कि पुराने डर, अनुष्ठान या बाधाओं को।


बाअल की वेदी गिराना

यह कदम यह दिखाता है कि केवल निर्णय लेना ही पर्याप्त नहीं है 
हमें निर्णय पर पालन भी करना होता है।
शैतानी वेदी को गिराना साहस, आज्ञाकारिता और विश्वास का प्रतीक है।

यह दिखाता है कि हमें अपने जीवन की उन चीजों को तोड़ना है जो परमेश्वर के मार्ग में बाधा डालती हैं।


प्रभु के लिए वेदी बनाना

जब हमने वेदी गिरा दी, तो अगला चरण था  वहां परमेश्वर का स्थान बनाना
हम सिर्फ शैतानी प्रभाव को खत्म नहीं करते 
हम उस स्थान को परमेश्वर की उपस्थिति और प्रेम से भरते हैं।

यह वह स्थान है जहाँ परमेश्वर की शक्ति और आध्यात्मिक विजय की स्थापना होती है।


यज्ञ चढ़ाना

गिदोन ने उस स्थान पर यज्ञ चढ़ाया 
यह दर्शाता है कि हमारा दान और समर्पण परमेश्वर को सम्मानित करता है।

पौलुस लिखते हैं:

हर कोई जैसा उसने अपने हृदय में ठाना है, वैसा ही दे; बिना अनिच्छा या दबाव के… परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम करता है।” (bible.com)

हमारा दान  चाहे वह समय, संसाधन या सेवाएँ हों 
शैतानी प्रभावों को कमजोर करता है और परमेश्वर की कृपा को बुलाता है।


दान का वास्तविक अर्थ

दान केवल पैसा देना नहीं है 
यह आध्यात्मिक आज्ञाकारिता, समर्पण और विश्वास की घोषणा है।
हम जब परमेश्वर की सेवा में अपना सर्वस्व देते हैं,
तो हम यह कह रहे हैं कि:

हम परमेश्वर पर निर्भर हैं
हम उसके मार्ग से चलना चाहते हैं
हम उसके अधिकार को अपने जीवन में स्थापित करना चाहते हैं

और यही कारण है कि दान में शक्ति है 
यह प्रार्थना के साथ मिलकर विपत्तियों, कमजोरियों और वेदियों को तोड़ता है।


निष्कर्ष

जब आप:

 प्रार्थना के साथ
 विश्वास के साथ
और हर्षपूर्वक दान के साथ

परमेश्वर के सामने आगे आते हैं 
तो शैतानी बाधाएँ कमजोर होती हैं, आध्यात्मिक बंधन टूटते हैं और आशीषें बहती हैं।

केवल प्रार्थना मत करो  दान भी करो!
दान करो, दान करो, दान करो!!!

परमेश्वर आपको प्रचुर आशीष से भर दे और आपके जीवन की वेदियाँ नष्ट कर दे।


 

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वह जो आने वाला है, निश्चित ही आएगा  और विलंब नहीं करेगा


इब्रानियों 10:37 (ESV)

“क्योंकि थोड़े ही समय के लिए, वह आने वाला आएगा और विलंब नहीं करेगा।”

बाइबिल बिल्कुल स्पष्ट है  यीशु मसीह लौट रहे हैं। यह रूपक या प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि वास्तविक और दृष्टिगोचर होगा। उनका लौटना ईसाई विश्वास की केंद्रीय आशा है और यह परमेश्वर के उद्धार कार्य का अंतिम अध्याय है। लेकिन उनके लौटने से पहले, संसार को संकेत दिए जाते हैं — और वर्तमान में, वे तेजी से प्रकट हो रहे हैं।

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब परिवर्तन तेज़ हैं, नैतिक पतन बढ़ रहा है, आध्यात्मिक उदासीनता फैली है और सत्य के प्रति शत्रुता बढ़ रही है। शास्त्र चेतावनी देता है कि ये स्थितियाँ “अंतिम दिनों” की पहचान होंगी (2 तीमुथियुस 3:1–5)। ये घटनाएँ संयोग नहीं हैं —ये उनके शीघ्र आगमन की भविष्यवाणी करने वाले संकेत हैं।

📌 ये संकेत क्या दर्शाते हैं?

जैसे हवा से उड़ता धूल किसी वाहन के आने स फैलता है, वैसे ही मसीह के लौटने के संकेत उनके आने से पहले संसार में फैल रहे हैं। हम उन्हें आने से पहले उनके संदेश सुनते हैं  और जो समझदारी से देखते हैं, वे सतर्क हो जाते हैं।

🔍 “वह जो आने वाला है” की पहचान और स्वरूप

1. वह स्वर्ग से आता है, पृथ्वी से नहीं
यूहन्ना 3:31 (ESV)

“जो ऊपर से आता है वह सब से ऊपर है। जो पृथ्वी से है वह पृथ्वी का है और सांसारिक ढंग से बात करता है। जो स्वर्ग से आता है वह सब से ऊपर है।”

यीशु कोई मानव द्वारा उठाया गया भविष्यवक्ता नहीं हैं, न ही कोई सांस्कृतिक दृष्टिकोणों के अधीन धार्मिक शिक्षक। वह ईश्वर का अवतार हैं, स्वर्ग से अवतरित हुए। उनकी सत्ता हर सांसारिक आवाज़ से ऊपर है क्योंकि उनका मूल दिव्य है।

2. वह सभी भविष्यवक्ताओं से महान है
मत्ती 3:11 (ESV)

“मैं तुम्हें पश्चाताप के लिए जल से बपतिस्मा देता हूँ, परन्तु मेरे बाद आने वाला मुझसे महान है, जिसकी चप्पलें पहनने के योग्य मैं नहीं हूँ। वह तुम्हें पवित्र आत्मा और अग्नि से बपतिस्मा देगा।”

जॉन द बैप्टिस्ट, जो पुराने नियम के सबसे महान भविष्यवक्ता थे (लूका 7:28), ने पहचाना कि उनके बाद आने वाला  यीशु  बहुत महान है। यीशु सभी भविष्यवाणियों का पूरा करने वाला, आत्मा का स्रोत और अंतिम न्याय के कार्यकारी हैं।

3. वह धन्य और महिमा से पूर्ण हैं
मत्ती 21:9 (ESV)

“दाऊद के पुत्र को होसन्ना! धन्य है जो यहोवा के नाम में आता है! सर्वोच्च में होसन्ना!”

यह सिर्फ स्वागत नहीं है  यह मसीहा की पहचान का उद्घोष है। यीशु अभिषिक्त राजा हैं, भजन 118:26 का पूर्णता, और दाऊद की सिंहासन के योग्य उत्तराधिकारी हैं। वह यहोवा के नाम और सत्ता के साथ आते हैं, उद्धार और न्याय लेकर।

4. वह शीघ्र और बिना विलंब के आएंगे
इब्रानियों 10:37 (ESV)

“क्योंकि थोड़े ही समय के लिए, वह आने वाला आएगा और विलंब नहीं करेगा।”

बहुत से लोग उनके लौटने के वादे पर हँस सकते हैं (2 पतरस 3:3–4), परन्तु परमेश्वर का समय पूर्ण है। वह विलंब नहीं करता क्योंकि वह धीमा है, बल्कि दया से, यह न चाहते हुए कि कोई नाश पाए, बल्कि सभी पश्चाताप करें (2 पतरस 3:9)। फिर भी, वह दिन अचानक और निश्चित रूप से आएगा (1 थिस्सलुनीकियों 5:2)।

क्या आपने इन गंभीर प्रश्नों पर विचार किया है?

अगर आप कल सुबह उठें और सुनें कि यीशु ने अपने लोगों को ले लिया, और आप पीछे रह गए?

अगर आप अपने दैनिक जीवन में व्यस्त थे  स्कूल, काम, योजनाएँ  और अचानक रैप्चर हो जाए, और आप उनमें शामिल न हों?

अगर कल आपने सुसमाचार सुना, लेकिन आज दरवाज़ा बंद हो गया?

बाइबिल चेतावनी देती है कि रैप्चर के बाद, संसार महान संकट का सामना करेगा (मत्ती 24:21), जो असाधारण पीड़ा और दिव्य न्याय का समय होगा। अनुग्रह का दरवाज़ा बंद हो जाएगा, और बहुत लोग देर से जान पाएंगे कि उन्होंने क्या अस्वीकार किया।

⚖️ न्याय आने वाला है
यशायाह 26:21 (ESV)

“देखो, प्रभु अपने स्थान से पृथ्वी के निवासियों के अपराध का दंड देने के लिए आ रहा है…”

भजन 96:13 (ESV)

“…क्योंकि वह पृथ्वी का न्याय करने आ रहा है। वह धर्म से संसार का न्याय करेगा और अपनी निष्ठा में लोगों का।”

यीशु लौटने पर दुखी सेवक के रूप में नहीं, बल्कि धर्मी न्यायाधीश के रूप में आएंगे (प्रकाशितवाक्य 19:11–16)। हर कार्य, हर रहस्य, हर विद्रोह का हिसाब लिया जाएगा (रोमियों 2:16)। छुपने की कोई जगह नहीं, बहाने नहीं, दूसरा मौका नहीं।

🚪 अनुग्रह का संकीर्ण दरवाज़ा बंद हो जाएगा
लूका 13:24–28 (ESV)

“संकीर्ण दरवाज़े से प्रवेश करने का प्रयास करो। क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ, बहुत से लोग प्रवेश करने का प्रयास करेंगे और असफल होंगे। जब घर के स्वामी उठे और दरवाज़ा बंद कर देंगे… तब तुम बाहर खड़े रहोगे और दरवाज़े पर खटखटाओगे, कहोगे, ‘प्रभु, हमें खोलो,’ तो वह तुम्हें जवाब देगा, ‘मैं नहीं जानता कि तुम कहाँ से आए हो।’”

यीशु एक ऐसे समय का वर्णन करते हैं जब लोग उद्धार बहुत देर से पाने की कोशिश करेंगे। उनके बारे में जानना, धर्मोपदेश सुनना और सत्य के निकट होना पर्याप्त नहीं होगा। सुरक्षित स्थान केवल उद्धार के कुंड में है, अब, जब तक दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं हुआ।

📢 आज उद्धार का दिन है
2 कुरिन्थियों 6:2 (ESV)

“देखो, अब अनुकूल समय है; देखो, अब उद्धार का दिन है।”

इंतजार मत करो। वह “सुविधाजनक समय” कभी न आ सके। अपना जीवन आज यीशु को सौंपो — डर से नहीं, बल्कि उनके गहन प्रेम और अनंत आशा के कारण। उन्होंने तुम्हारे पाप उठाए, तुम्हारी मृत्यु मारी, और अब तुम्हें अपनी धार्मिकता का उपहार देते हैं।

🎺 सुर भी कभी भी बज सकता है
1 थिस्सलुनीकियों 4:16–17 (ESV)

“प्रभु स्वयं स्वर्ग से उतरेंगे, आदेश की पुकार, महदूत की आवाज और परमेश्वर के सुर का साथ। मसीह में मृत पहले उठेंगे। फिर हम जो जीवित हैं… उनके साथ बादलों में प्रभु से मिलने के लिए उठाए जाएंगे…”

यह विश्वासियों की धन्य आशा है (तितुस 2:13)। परन्तु पश्चाताप न करने वालों के लिए, यह अत्यंत दुःख की शुरुआत होगी।

🙏 क्या आप आज उन्हें स्वीकार करेंगे?
प्रकाशितवाक्य 22:20 (ESV)

“जो इन बातों का साक्ष्य देता है कहता है, ‘मैं शीघ्र आ रहा हूँ।’ आमीन। आओ, प्रभु यीशु!”

अगर आप अपना जीवन यीशु मसीह को सौंपने के लिए तैयार हैं, तो आप ईमानदारी से प्रार्थना कर सकते हैं:

📖 पश्चाताप की प्रार्थना

“प्रभु यीशु, मैं जानता हूँ कि मैं पापी हूँ और मुझे आपके अनुग्रह की आवश्यकता है। मैं विश्वास करता हूँ कि आपने मेरे पापों के लिए मृत्यु पाई और मेरे उद्धार के लिए पुनर्जीवित हुए। मैं अपने पापों से मुड़कर अपना जीवन आपके अधीन कर रहा हूँ। मुझे अपना प्रभु और उद्धारकर्ता बनाइए। मुझे अपनी आत्मा से भर दीजिए और मेरे जीवन के सभी दिनों में मेरे साथ चलने में मदद कीजिए। आमीन।”

मरानथा आओ, प्रभु यीशु!


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ماذا يعني حقًا أن تُبنى على الصخرة؟

 


 

هل أنت حقًا مبني على الصخرة

إذا سألت معظم المسيحيين عن معنى “الصخرة” في الكتاب المقدس، سيرد كثيرون بسرعة: “يسوع”، وهذا صحيح تمامًا، فالكتاب المقدس يؤكد هذه الحقيقة:

“الحَجَرُ الَّذِي رَفَضَهُ الْبَنَّاؤُونَ قَد صارَ رَأْسَ الزَّاوِيَةِ.” — متى 21:42

“وَكُلُّهُمْ شَرِبُوا نَفْسَ المَاءِ الرُّوحِيِّ الَّذِي سَارَ مَعَهُمْ، وَالْمَاءُ كَانَ مَسِيحًا.” — كورنثوس الأولى 10:4

من الواضح أن يسوع هو الصخرة—الأساس الثابت لخلاصنا وأملنا. وهذه حقيقة جوهرية في علم المسيح (المسيحيات): فالمسيح هو الحَجَر المرفوض وفي نفس الوقت أساس شعب العهد الجديد لدى الله.

لكن يسوع نفسه يوضح لنا ما معنى أن تُبنى على الصخرة فعليًا—وليس مجرد معرفة من هو.

لننظر إلى كلماته في متى 7:24–27:

“فَكُلُّ مَنْ يَسْمَعُ كَلاَمِي هذَا وَيَعْمَلُ بِهِ، يُشَبَّهُ بِرَجُلٍ حَكِيمٍ بَنَى بَيْتَهُ عَلَى الصَّخْرِ. فَنَزَلَتِ الْمَطَرُ وَجَاءَتِ الْفَيَاضَانُ وَهَبَّتِ الرِّيَاحُ وَصَدَمَتِ ذَلِكَ الْبَيْتَ، فَلَمْ يَسْقُطْ، لأَنَّهُ كَانَ مُؤَسَّسًا عَلَى الصَّخْرِ.
وَأَمَّا كُلُّ مَنْ يَسْمَعُ كَلاَمِي وَلَا يَعْمَلُ بِهِ، فَيُشَبَّهُ بِرَجُلٍ جَاهِلٍ بَنَى بَيْتَهُ عَلَى الرِّمْلِ. فَنَزَلَتِ الْمَطَرُ وَجَاءَتِ الْفَيَاضَانُ وَهَبَّتِ الرِّيَاحُ وَصَدَمَتِ ذَلِكَ الْبَيْتَ، فَسَقَطَ وَكَانَ سَقُوطُهُ عَظِيمًا.”

هذه الكلمات هي خاتمة موعظة الجبل (متى 5–7)، التي وضعت أخلاقيات ملكوت الله. ينهي يسوع هذه الموعظة بدعوة ليس فقط للاستماع، بل للعيش وفق تعاليمه.

النقطة الأساسية: الأساس (الصخرة) ليس مجرد معرفة هوية يسوع، بل هو طاعة كلامه.

وهذا مرتبط بعقيدة الكتاب المقدس عن التقديس: التحول المستمر في حياة المؤمن بقوة الروح القدس وطاعته للمسيح. ويؤكد يعقوب هذا في رسالته:

“فَلْتَكُنُوا لا مُسْمِعِينَ فَقَط، مُخَدِّعِينَ أَنْفُسَكُمْ، بَلْ كُونُوا عَامِلِينَ بِالْكَلِمَةِ.” — يعقوب 1:22


ما ليست عليه الصخرة:

ليست مجرد معرفة اسم يسوع.

ليست قراءة أو حفظ الكتاب المقدس فقط.

ليست القدرة على شرح اللاهوت العميق أو مصطلحات اليونانية والعبرية.

ليست حتى كونك معلّمًا أو واعظًا ممتازًا.

كل ذلك يمكن أن يوجد دون طاعة.


ما هي الصخرة:

سماع كلمات يسوع

والعمل با

هذا هو ما يبني حياة تستطيع أن تصمد أمام العواصف الروحية—كالإغراء والمعاناة والاضطهاد والابتلاءات.

“كُلُّ مَنْ يَسْمَعُ … وَيَعْمَلُ”
هذه هي الصورة الكتابية للتلميذ الحقيقي (راجع لوقا 6:46: “لِمَاذَا تَدْعُونَنِي رَبًّا رَبًّا وَأَنْتُمْ لا تَفْعَلُونَ مَا أَقُولُ؟”).


مأساة اليوم

في كنائس اليوم، كثير من المؤمنين مبنيون على التعليم وليس على الطاعة. نُعجب بالمواعظ الجيدة، ونشعر بالبركة من دراسة الكتاب المقدس، ونقول: “كانت الرسالة قوية”—لكن إذا لم نطبقها في حياتنا، فلن يكون لها قوة حقيقية.

اللاهوت بدون التطبيق يصبح معرفة فارغة (راجع كورنثوس الأولى 8:1: “المعرفة تعظم، أما المحبة فتبني”).


الحقيقة البسيطة

إذا عشت حتى كلمة واحدة قالها يسوع، فأنت أقوى روحيًا من شخص يعرف الكتاب المقدس كله لكنه لا يطيعه.

أحبوا البر. اسعوا إلى القداسة. مارسوا نقاء القلب. التزموا بالنمو الروحي. افعلوا الخير.

هكذا تُبنى على الصخرة.

ليبارككم الرب، ويمنحكم نعمة السير في الطاعة، ويحفظكم أقوياء في كل عاصفة. شالوم.


إذا أحببت، أستطيع أيضًا أن أصيغه بأسلوب أكثر دعويًا/وعظيًا ليكون جاهزًا للنشر على وسائل التواصل أو الخطبة، مع الحفاظ على جمال اللغة العربية وعمق المعنى.

هل تريد أن أفعل ذلك؟

 

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सच में “चट्टान पर आधारित” होने का क्या मतलब है?

क्या आप वास्तव में चट्टान पर बने हैं?

अगर आप अधिकांश ईसाइयों से पूछें कि बाइबल में “चट्टान” किसके लिए है, तो अधिकतर लोग तुरंत कहेंगे, “यीशु।” और यह बिल्कुल सही है। शास्त्र भी इसे स्पष्ट रूप से कहता है:

“वह पत्थर जिसे भवन बनाने वालों ने खारिज किया, वही कोने का मुख्य पत्थर बना।”
— मत्ती 21:42

“…वे उस आध्यात्मिक चट्टान से पीते रहे जो उनके साथ थी, और वह चट्टान मसीह था।”
— 1 कुरिन्थियों 10:4

स्पष्ट है, यीशु ही वह चट्टान हैं—हमारे उद्धार और आशा की अडिग नींव। यह मसीहशास्त्र (Christology) का एक मूल सिद्धांत है: यीशु अस्वीकार किया गया पत्थर भी हैं और परमेश्वर के नए वाचा-लोगों की नींव भी।

लेकिन यीशु स्वयं हमें बताते हैं कि वास्तव में उन पर आधारित होना क्या है—और यह केवल यह जानने का मामला नहीं कि वह कौन हैं।

आइए उनके शब्द मत्ती 7:24–27 में देखें:

“इसलिए जो कोई भी मेरे इन वचनों को सुनता है और उन्हें मानता है, वह उस बुद्धिमान मनुष्य के समान है जिसने अपने घर को


पर बनाया।
बारिश आई, नदियाँ बहीं, हवाएँ आईं और उस घर पर टकराईं; फिर भी वह नहीं गिरी, क्योंकि उसकी नींव चट्टान पर थी।
पर जो कोई मेरे इन वचनों को सुनता है और उन्हें मानता नहीं, वह उस मूर्ख मनुष्य के समान है जिसने अपने घर को रेत पर बनाया।
बारिश आई, नदियाँ बहीं, हवाएँ आईं और उस घर पर टकराईं, और वह बड़ी तबाही के साथ गिर गया।”

— मत्ती 7:24–27

यह पर्वत प्रवचन (मत्ती 5–7) का निष्कर्ष है, जिसमें परमेश्वर के राज्य की जीवन शैली और सिद्धांत बताए गए हैं। यीशु इस प्रवचन को केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि उसे जीने के लिए कहते हैं।

मुख्य बात: नींव (चट्टान) केवल यीशु की पहचान नहीं है—यह उनके वचन के पालन में है।

यह पवित्रता की बाइबिल शिक्षा से जुड़ा है: यह विश्वासियों के जीवन का सतत रूपांतरण है, जो पवित्र आत्मा की शक्ति और मसीह के प्रति आज्ञाकारिता से होता है। जेम्स पत्र में इसे इस तरह कहा गया है:

“शब्द को केवल सुनकर अपने आप को मत धोखा दो; जो कहता है वही करो।”
— याकूब 1:22


चट्टान क्या नहीं है

  • केवल यीशु का नाम जानना नहीं है।
  • बाइबल पढ़ना या याद करना नहीं है।
  • गहन धर्मशास्त्र, ग्रीक या हिब्रू शब्दों को समझाना नहीं है।
  • उत्कृष्ट शिक्षक या उपदेशक होना भी नहीं है।

ये सब बिना आज्ञाकारिता के भी हो सकते हैं।

चट्टान क्या है

  • यीशु के वचन सुनना
  • और उनका पालन करना

यही वह चीज़ है जो जीवन को आध्यात्मिक तूफानों—प्रलोभन, पीड़ा, उत्पीड़न या परीक्षाओं—सहन करने योग्य बनाती है।

“जो सुनता है…और करता है…”
यह सच्चे शिष्य का बाइबिल चित्र है (लूका 6:46—“हे प्रभु, प्रभु! कहकर तुम क्यों नहीं करते जो मैं कहता हूँ?”)।


आज की स्थिति

आज की चर्च में, कई विश्वासियों की नींव केवल शिक्षाओं पर है, आज्ञाकारिता पर नहीं।
हम अच्छे उपदेशों की सराहना करते हैं, बाइबल अध्ययन से आशीष महसूस करते हैं, और कहते हैं, “यह संदेश बहुत प्रभावशाली था”—लेकिन अगर हम उसे नहीं जीते, तो इसका हमारे जीवन में कोई वास्तविक असर नहीं होता।

आवेदन के बिना धर्मशास्त्र खाली ज्ञान बन जाता है (1 कुरिन्थियों 8:1—“ज्ञान घमंड बढ़ाता है, पर प्रेम उठाता है”)।


सरल सत्य

यदि आप यीशु के एक भी शब्द को जीते हैं, तो आप उस व्यक्ति से आध्यात्मिक रूप से मजबूत हैं जो पूरी बाइबल जानता है लेकिन कभी पालन नहीं करता।

  • धर्म के प्रेम में रहें।
  • पवित्रता की खोज करें।
  • हृदय की पवित्रता का अभ्यास करें।
  • आध्यात्मिक वृद्धि के लिए प्रतिबद्ध रहें।
  • भलाई करें।

यही तरीका है कि आप चट्टान पर आधारित बनते हैं।

प्रभु आपको आशीष दें, आज्ञाकारिता में चलने की शक्ति दें, और हर तूफान में मजबूत बनाए रखें।

शालोम।

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प्रभु में घमंड करो

तुम किस बात पर घमंड करते हो?

अपने धन पर, अपने पद पर, या अपनी क्षमताओं पर?

यदि ये सब प्रभु ने तुम्हें दिया है, तो उसके लिये धन्यवाद करो—परन्तु इन बातों पर घमंड मत करो। क्योंकि संसार की सारी वस्तुएँ क्षणिक हैं और अंत में व्यर्थ सिद्ध होती हैं।
सभोपदेशक 1:2 में लिखा है:

“व्यर्थ ही व्यर्थ, उपदेशक कहता है; व्यर्थ ही व्यर्थ! सब कुछ व्यर्थ है।”

इसलिये अपने आप पर नहीं, बल्कि यीशु मसीह को जानने में घमंड करो।

यीशु मसीह को जानना सबसे बड़ा धन है।
मत्ती 13:44 कहता है:

“स्वर्ग का राज्य उस खजाने के समान है जो खेत में छिपा हुआ था…”

यह संसार के किसी भी धन, पद, या मानवीय सामर्थ्य से कहीं बढ़कर है। यही सबसे बड़ा सम्मान और सच्ची सामर्थ्य है।

यदि घमंड करना ही है, तो इसी बात का घमंड करो कि तुम यीशु को जानते हो!
आनन्दित हो, क्योंकि तुम्हें ऐसा खजाना मिला है जो अनमोल भी है और अनन्त भी।

प्रेरित पौलुस इसे 1 कुरिन्थियों 1:30–31 में स्पष्ट रूप से समझाता है:

“परन्तु उसी की ओर से तुम मसीह यीशु में हो, जो परमेश्वर की ओर से हमारे लिये बुद्धि, और धर्म, और पवित्रता, और छुटकारा ठहरा—
ताकि जैसा लिखा है, ‘जो घमंड करे, वह प्रभु में घमंड करे।’”

इसका अर्थ यह है:

परमेश्वर की बुद्धि:
यीशु मसीह स्वयं परमेश्वर की बुद्धि हैं (1 कुरिन्थियों 1:24)। और यदि वह तुम्हारे भीतर वास करते हैं (कुलुस्सियों 1:27), तो तुम संसार की नहीं, बल्कि परमेश्वर की दिव्य बुद्धि में सहभागी हो।

धार्मिकता (धर्म):
मसीह के द्वारा विश्वासियों को परमेश्वर के सामने धर्मी ठहराया जाता है—अपने कामों के कारण नहीं, बल्कि विश्वास के द्वारा (2 कुरिन्थियों 5:21)। यही धार्मिकता हमें निर्दोष ठहराती है और अनन्त जीवन देती है (रोमियों 5:1)।

पवित्रता (पवित्रीकरण):
यीशु हमें अपने लिये अलग करके पवित्र ठहराते हैं (1 थिस्सलुनीकियों 4:3), ताकि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से हम परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला जीवन जी सकें।

छुटकारा:
मसीह का बलिदान हमें पाप और उसके परिणामों से छुड़ाता है, और शाप व अनन्त दण्ड से स्वतंत्र करता है (गलातियों 3:13; प्रकाशितवाक्य 20:14–15)।

तो यदि यीशु तुम्हारे भीतर वास करते हैं, तो उन पर गर्व क्यों न हो?

लज्जा कहाँ से आती है, जब परमेश्वर की बुद्धि और धार्मिकता—यीशु मसीह—तुम्हारे भीतर है?
फिर उसके वचन (बाइबल) को खुलेआम उठाने, उसके विषय में बोलने, या उसकी आज्ञाओं का पालन करने में शर्म कैसी?

उसी ने तुम्हें अनन्त दण्ड से बचाया है।
यूहन्ना 3:16 कहता है कि उसने संसार से ऐसा प्रेम रखा कि अपना एकलौता पुत्र दे दिया।
और रोमियों 8:1 में लिखा है:

“अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं रही।”

यीशु ने मरकुस 8:38 में चेतावनी दी:

“जो कोई इस व्यभिचारी और पापी पीढ़ी में मुझ से और मेरी बातों से लज्जा करेगा, मनुष्य का पुत्र भी जब अपने पिता की महिमा में पवित्र स्वर्गदूतों के साथ आएगा, तो उससे लज्जा करेगा।”

इसलिये उसी में घमंड करो!
निडर होकर अपने विश्वास को प्रकट करो।
सब लोग देखें कि यीशु ही तुम्हारा सब कुछ है।
यही सच्चा आशीष है और तुम्हारे जीवन में उसकी सामर्थ्य की सजीव गवाही।

प्रेरित पौलुस गलातियों 6:14 में कहता है:

“परन्तु मुझ से यह न हो कि मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस को छोड़ और किसी बात का घमंड करूँ, जिसके द्वारा संसार मेरे लिये और मैं संसार के लिये क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ।”

प्रभु तुम्हें भरपूर आशीष दे, ताकि तुम केवल उसी में घमंड करो।

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थॉमस को स्मरण करें


हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के नाम में आप सबको नमस्कार। आइए आज हम प्रभु के एक प्रेरित थॉमस—के जीवन के माध्यम से सुसमाचार के शुभ संदेश पर मनन करें।

थॉमस, जिसे दिदिमुस (अर्थात् “जुड़वाँ”) भी कहा जाता है, यीशु के बारह प्रेरितों में से एक था। वह यहूदा इस्करियोती के समान नहीं था, जिसने प्रभु से विश्वासघात किया। वास्तव में, थॉमस का हृदय प्रभु यीशु के प्रति गहरे प्रेम से भरा हुआ था। एक अवसर पर, जब यीशु ने यहूदिया लौटने की बात कही—जहाँ उनके प्राणों को खतरा था तब थॉमस ने अन्य शिष्यों से कहा,

“आओ, हम भी उसके साथ चलें कि उसके साथ मरें।”
(यूहन्ना 11:16)

यह वचन दर्शाता है कि थॉमस केवल नाम का नहीं, बल्कि हृदय से समर्पित शिष्य था, जो प्रभु के लिए अपने प्राण तक देने को तैयार था।

फिर भी, थॉमस की एक कमजोरी थी—उसका संदेह और प्रश्न करने वाला स्वभाव, विशेषकर परमेश्वर की सामर्थ्य को लेकर। यह आंतरिक संघर्ष उसके विश्वास और अन्य शिष्यों के साथ उसकी आत्मिक सहभागिता पर प्रभाव डालता था।

यीशु के पुनरुत्थान के बाद, शिष्य भय के कारण बंद दरवाज़ों के भीतर एकत्र होकर प्रार्थना कर रहे थे, और उसी समय प्रभु यीशु उनके बीच प्रकट हुए। परंतु उस अवसर पर थॉमस उनके साथ नहीं था। उसकी अनुपस्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि वह उस अद्भुत अनुभव से वंचित रह गया, जिसे बाकी शिष्यों ने प्राप्त किया।

जब बाद में शिष्यों ने उत्साह से उसे बताया,
“हमने प्रभु को देखा है,”
तो थॉमस ने विश्वास करने से इंकार करते हुए कहा,

“जब तक मैं उसके हाथों में कीलों के निशान न देख लूँ, और कीलों के स्थान में अपनी उँगली न डालूँ, और अपना हाथ उसके पंजर में न डालूँ, तब तक मैं विश्वास न करूँगा।”
(यूहन्ना 20:25)

यह घटना हमें आत्मिक अलगाव के खतरे के बारे में गंभीर चेतावनी देती है। संभव है कि थॉमस निराशा, भ्रम या गहरे दुःख से गुजर रहा हो, परंतु संगति से दूर होकर वह उस स्थान से भी दूर हो गया जहाँ प्रभु स्वयं प्रकट होते हैं।

आठ दिन बाद, शिष्य फिर एकत्र हुए—और इस बार थॉमस भी उनके साथ था। तब प्रभु यीशु फिर से प्रकट हुए और अपनी करुणा में सीधे थॉमस से कहा,

“अपनी उँगली यहाँ ला और मेरे हाथ देख; और अपना हाथ बढ़ाकर मेरे पंजर में डाल; और अविश्वासी न बन, पर विश्वास करने वाला बन।”
(यूहन्ना 20:27)

यह देखकर थॉमस का हृदय विश्वास से भर गया और वह पुकार उठा,

“हे मेरे प्रभु और मेरे परमेश्वर!”
(यूहन्ना 20:28)

तब यीशु ने उससे कहा,

“तूने मुझे देखकर विश्वास किया है; धन्य हैं वे जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया।”
(यूहन्ना 20:29)

इस घटना से हमें कई गहरी आत्मिक सच्चाइयाँ सीखने को मिलती हैं:

परमेश्वर हमारे ईमानदार प्रश्नों और संदेहों को समझता है, पर वह हमें अविश्वास में नहीं, बल्कि विश्वास में आगे बढ़ने के लिए बुलाता है।

आत्मिक संगति में बड़ी सामर्थ्य है। कुछ आत्मिक अनुभव और प्रकाशन तब ही मिलते हैं जब हम एकता में एकत्र होते हैं (मत्ती 18:20)।

कठिन समय में अलगाव विश्वास को कमजोर कर देता है। जब हम स्वयं को दुर्बल महसूस करते हैं, तब भी संगति में बने रहना हमें प्रोत्साहन, सामर्थ्य और प्रभु की उपस्थिति का अनुभव दिला सकता है।

इसी कारण पवित्रशास्त्र हमें स्मरण दिलाता है:

“और हम एक-दूसरे को प्रेम और भले कामों में उकसाने का ध्यान रखें। और अपनी सभाओं में जाना न छोड़ें, जैसा कि कुछ लोगों की रीति है, पर एक-दूसरे को समझाते रहें।”
(इब्रानियों 10:24–25)

आत्मिक अनुपस्थिति से बचें। निराशा या संदेह को आपको अकेलेपन में न ले जाने दें। जुड़े रहें। प्रार्थनाशील रहें। उपस्थित रहें। क्योंकि कुछ आशीषें और प्रकाशन परमेश्वर ने समुदाय के बीच ही प्राप्त करने के लिए ठहराए हैं।

प्रभु हमें हर परिस्थिति में विश्वासयोग्य और स्थिर बने रहने की सामर्थ्य दे। थॉमस की तरह, हमें भी कभी-कभी संदेह हो सकता है, पर हम वहीं बने रहें जहाँ प्रभु हमें पा सकें—उसके लोगों के बीच।

शलोम।


अगर आप चाहें, मैं इसे

उपदेश (Sermon) शैली,

भजन/ध्यान (Devotional),

या सरल ग्रामीण हिंदी में भी ढाल सकता हूँ।

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संसार की मलिनताओं से दूर भागना

2 पतरस 2:20 में लिखा है:

“यदि वे हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की पहचान के द्वारा संसार की भ्रष्टता से बच निकले, और फिर उसी में फँसकर हार गए, तो उनकी अंतिम दशा पहली से भी अधिक बुरी हो जाती है।”

यह पद हमें मसीही जीवन के बारे में एक गहरी और गंभीर सच्चाई सिखाता है। यीशु मसीह को जानना केवल दिमागी या बौद्धिक ज्ञान नहीं है, बल्कि यह एक बदले हुए जीवन की माँग करता है—ऐसा जीवन जो संसार के पापों से मुँह मोड़ ले। उद्धार केवल एक बार की घटना नहीं है, बल्कि संसार की भ्रष्टता से अलग किया जाना है, जिसे हम पवित्रीकरण कहते हैं।
यदि कोई विश्वासी फिर से पाप में लौट जाता है और दोबारा उसका दास बन जाता है, तो उसकी आत्मिक दशा उद्धार से पहले की अवस्था से भी अधिक खराब हो जाती है। यह बाइबल में बताए गए धर्मत्याग के सिद्धांत को दर्शाता है—अर्थात परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव करने के बाद पाप की ओर लौटना, जो एक अत्यंत गंभीर चेतावनी है (इब्रानियों 6:4–6)।

संसार की मलिनताएँ क्या हैं?

ये वे पापपूर्ण कार्य और जीवन-शैली हैं जो परमेश्वर के पवित्र मानक के विरुद्ध हैं—जैसे नशाखोरी, व्यभिचार, चोरी, टोना-टोटका, लोभ, गर्भपात, समलैंगिकता और ऐसे अन्य काम (गलातियों 5:19–21)।

फिर से गिर जाने का खतरा

यदि कोई विश्वासी इन पापों में फिर से फँस जाता है और उनसे बाहर नहीं निकल पाता, तो उसका नुकसान पहले से कहीं अधिक होता है। यह उस बीमारी के समान है, जो समय पर इलाज न मिलने पर और भी गंभीर हो जाती है।
उदाहरण के लिए, जो व्यक्ति कभी नशे की लत में था और उससे मुक्त हो गया, वह यदि दोबारा गिरता है तो वह लत पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हो सकती है (रोमियों 6:12–14)। इससे यह स्पष्ट होता है कि जब हम पाप को बार-बार स्थान देते हैं, तो उसकी पकड़ और मजबूत होती जाती है।

फिलिप्पियों 2:12 हमें स्मरण दिलाता है:

“इसलिए, हे मेरे प्रिय लोगो, जैसे तुम सदा आज्ञाकारी रहे हो, वैसे ही अब भी—न केवल मेरी उपस्थिति में, पर मेरी अनुपस्थिति में भी—डरते और काँपते हुए अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ।”

इसका अर्थ यह है कि उद्धार केवल अतीत में घटी हुई बात नहीं है, बल्कि यह आज्ञाकारिता और परमेश्वर पर निर्भरता के साथ चलने की एक निरंतर प्रक्रिया है।

यीशु की चेतावनी का उदाहरण

यीशु ने उस मनुष्य का उदाहरण दिया जिसमें से दुष्ट आत्मा निकल गई थी, लेकिन उसने अपने जीवन को परमेश्वर की उपस्थिति से नहीं भरा। परिणामस्वरूप वह दुष्ट आत्मा सात और दुष्ट आत्माओं को साथ लेकर लौट आई, और उस मनुष्य की दशा पहले से भी अधिक बुरी हो गई (मत्ती 12:43–45)।
जो आत्मा छुटकारा पाने के बाद भी परमेश्वर को स्थान नहीं देती, वह बुराई के लिए और अधिक खुली हो जाती है।

यदि आप फिर से गिर जाएँ तो क्या करें?

तुरंत मन फिराएँ! अनुग्रह का द्वार अभी खुला है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति जान-बूझकर पाप में बना रहता है, तो वह द्वार बंद हो सकता है। बाइबल हमें बुलाती है कि हम शैतान का विरोध करें और परमेश्वर के निकट जाएँ (याकूब 4:7–8)।
यदि आप नशाखोरी, व्यभिचार, लोभ या अशुद्धता जैसे पापों में लौट आए हैं, तो उन प्रलोभनों से तुरंत भागिए।

यीशु हमें पवित्र जीवन के लिए बुलाते हैं—
“पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।” (1 पतरस 1:16)

पवित्र जीवन का अर्थ है आज्ञाकारिता में चलना और निरंतर मन फिराते रहना।

उद्धार एक अनमोल वरदान है, जो एक ही बार दिया गया है (इब्रानियों 9:27–28)। इसलिए हमें इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए, बल्कि परमेश्वर के भय और आदर में जीवन बिताना चाहिए। जब हम सच्चे मन से पश्चाताप करते हैं और पूरी तरह मसीह का अनुसरण करने का निर्णय लेते हैं, तो परमेश्वर दया करता है और हमें फिर से स्थापित करता है (1 यूहन्ना 1:9)।

प्रभु आपको आशीष दे कि आप इस संसार की मलिनताओं से दूर भागें और पूरे मन से उसके लिए जीवन जिएँ!

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चप्पू क्या होते हैं? (योना 1:13)

प्रश्न: “चप्पू चलाना” का क्या अर्थ है?

चप्पू  ऐसे औज़ार होते हैं जिनसे पानी में नाव चलाई जाती है। ये लंबे, पैडल जैसे होते हैं, जिनसे नाविक पानी को पीछे की ओर धकेलते हैं ताकि नाव आगे बढ़े। जब पाल चलाने के लिए हवा न हो, या समुद्र बहुत उग्र हो, तब चप्पुओं से नाव चलाना अत्यंत आवश्यक होता है।

योना 1:13 में लिखा है:

“तब वे पुरुष बड़ी कोशिश करके नाव को किनारे की ओर खेने लगे, परन्तु खे न सके, क्योंकि समुद्र पहले से भी अधिक उग्र होता चला गया।”
(योना 1:13 – हिंदी बाइबल)

इस पद में हम देखते हैं कि नाविक अपनी पूरी ताकत से नाव को किनारे की ओर ले जाने का प्रयास कर रहे थे, ताकि वे स्वयं भी बच जाएँ और योना भी सुरक्षित रहे। लेकिन चाहे उन्होंने कितना भी परिश्रम किया, उनका मानवीय प्रयास सफल नहीं हुआ। इसके विपरीत, समुद्र और भी अधिक भयानक होता चला गया।

यहाँ “खेना” शब्द के लिए प्रयुक्त इब्रानी भाषा का मूल शब्द “खोदना” दर्शाता है, जो उनके अत्यंत कठिन, थकाने वाले और निराशाजनक प्रयास को स्पष्ट करता है।


मानवीय प्रयास और परमेश्वर की इच्छा

योना की इस घटना से एक गहरी आत्मिक सच्चाई प्रकट होती है:
जब मनुष्य का प्रयास परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध होता है, तो उसकी सीमा होती है।

नाविक बुरे लोग नहीं थे। वे योना को समुद्र में फेंकना नहीं चाहते थे और हर संभव उपाय कर रहे थे। परन्तु परमेश्वर पहले ही यह ठहरा चुका था कि इस स्थिति का समाधान क्या होगा। यह हमें सिखाता है कि हमारी बुद्धि, सामर्थ्य और अच्छे इरादे भी परमेश्वर की योजनाओं को बदल नहीं सकते।

बाइबल में लिखा है:

“मनुष्य के मन में बहुत सी युक्तियाँ होती हैं, परन्तु जो युक्ति यहोवा करता है वही स्थिर रहती है।”
(नीतिवचन 19:21)

और यह भी:

“यदि यहोवा घर न बनाए, तो उसके बनाने वालों का परिश्रम व्यर्थ है; यदि यहोवा नगर की रक्षा न करे, तो रखवाले का जागना व्यर्थ है।”
(भजन 127:1)

धर्मी प्रयास भी तब तक पूर्ण नहीं होता, जब तक वह परमेश्वर की सार्वभौमिक इच्छा के अधीन न हो।


चप्पुओं और खेने से जुड़े अन्य बाइबल उदाहरण

मरकुस 6:48

“उसने देखा कि वे चप्पू चलाते हुए बहुत कठिनाई में हैं, क्योंकि हवा उनके विरोध में थी…”
यहाँ तक कि यीशु के चेले भी अपने नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे—जब तक यीशु स्वयं वहाँ नहीं पहुँचे।

यूहन्ना 6:19

“जब वे कोई तीन या चार मील तक खे चुके, तब उन्होंने यीशु को पानी पर चलते हुए नाव के पास आते देखा…”
यह हमें दिखाता है कि मानवीय प्रयास हमें एक सीमा तक ही ले जा सकता है—परन्तु यीशु की उपस्थिति तूफ़ान में शांति ले आती है।

यशायाह 33:21 और यहेजकेल 27:6 में भी नावों और चप्पुओं का उल्लेख प्रतीकात्मक और भविष्यद्वाणी की भाषा में किया गया है।


निष्कर्ष: संघर्ष से अधिक सामर्थी है समर्पण

योना की कहानी हमें यह स्मरण कराती है कि कई बार और ज़ोर से खेना समाधान नहीं होता, बल्कि परमेश्वर की इच्छा के आगे झुक जाना ही सच्ची सामर्थ है।

जीवन के हर तूफ़ान में हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए:
क्या मैं परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध संघर्ष कर रहा हूँ, या उसके मार्गदर्शन पर भरोसा कर रहा हूँ?

योना अध्याय 1 को ध्यानपूर्वक पढ़िए और अपने जीवन के तूफ़ानों पर मनन कीजिए।
क्या आप अपनी ही शक्ति पर निर्भर हैं, या सब से पहले परमेश्वर की इच्छा को खोज रहे हैं?

शलोम।

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