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यीशु मसीह की तीन प्रमुख परीक्षाएँ

भूमिका

जब यीशु पवित्र आत्मा के द्वारा जंगल में ले जाए गए (मत्ती 4:1), यह केवल शैतान के साथ एक संघर्ष नहीं था; यह उनके सेवा-कार्य से पहले की दिव्य तैयारी थी। यीशु का 40 दिन का उपवास पिता के साथ गहरे संबंध और आने वाली सेवकाई की तैयारी का प्रतीक था — जैसे मूसा ने सीनै पर्वत पर 40 दिन उपवास किया था (निर्गमन 34:28)।

इन्हीं दिनों में शैतान ने उन पर तीन विशेष परीक्षाएँ डालीं—साधारण परीक्षाएँ नहीं, बल्कि ऐसी चुनौतियाँ जो हर विश्वासियों के जीवन के मूल संघर्षों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

“यीशु, पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर यरदन से लौटे, और आत्मा के द्वारा जंगल में ले जाए गए।”
— लूका 4:1

इन तीन परीक्षाओं के माध्यम से हमें यह समझ मिलता है:

  • सच्चे पुत्रत्व और आज्ञाकारिता का अर्थ,
  • सामर्थ और अधिकार का सही उपयोग,
  • तथा दुःख सहने की विश्वासयोग्य राह, जो आत्म-सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण है।

अब हम हर परीक्षा को गहराई से समझते हैं।


1. पत्थरों को रोटी बनाना – शारीरिक इच्छा और स्व-इच्छा की परीक्षा

“शैतान ने उससे कहा, ‘यदि तू परमेश्‍वर का पुत्र है, तो इस पत्थर से कह कि यह रोटी बन जाए।’
यीशु ने उत्तर दिया, ‘लिखा है— मनुष्य केवल रोटी से नहीं, बल्कि हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहता है।’”

— लूका 4:3–4

यीशु भूखे थे — यह एक वास्तविक और जायज़ आवश्यकता थी। पर शैतान ने उन्हें पिता की इच्छा से अलग होकर अपनी शक्ति स्वयं के लिए प्रयोग करने की लालसा दी। यह परीक्षा थी —
निर्भरता बनाम आत्मनिर्भरता

फिलिप्पियों 2:6–8 में बताया गया है कि यीशु, जो परमेश्वर थे, फिर भी उन्होंने अपने आप को दीन किया और क्रूस तक आज्ञाकारी बने।

“उन्होंने अपने आप को दीन किया और मृत्यु तक—हाँ, क्रूस की मृत्यु तक—आज्ञाकारी बने।”
— फिलिप्पियों 2:8

शैतान अक्सर हमें हमारी कमजोरियों में उकसाता है—भूख, अकेलापन, तनाव, या जीवन की ज़रूरतों में।
समस्या खाना, विवाह करना या उन्नति करना नहीं है,
समस्या है परमेश्वर की समय-सीमा और इच्छा से बाहर होकर करना।

सच्चा पुत्रत्व यह है कि हम भूखे होने पर भी पिता पर भरोसा रखें।

“धन्य है वह मनुष्य जो परीक्षा सहता रहता है… क्योंकि जब वह खरा उतरेगा, तब उसे जीवन का मुकुट मिलेगा।”
— याकूब 1:12


2. संसार के राज्य – महिमा, शक्ति और समझौते की परीक्षा

“शैतान ने उसे एक ऊँचे स्थान पर ले जाकर संसार के सब राज्य… दिखाए।
और कहा, ‘यदि तू मेरे सामने दण्डवत करेगा, तो मैं यह सब अधिकार तुझे दूँगा।’”

— लूका 4:5–7

यह अधीनता और समझौते की परीक्षा थी।
यीशु सचमुच एक राज्य स्थापित करने आए थे (यशायाह 9:6–7),
पर शैतान ने क्रूस के बिना ताज देने की पेशकश की।

यीशु ने तुरन्त उत्तर दिया—

“तू अपने प्रभु परमेश्वर की उपासना कर और केवल उसी की सेवा कर।”
— लूका 4:8; व्यवस्थाविवरण 6:13

यीशु ने ऐसी महिमा ठुकरा दी जो परमेश्वर की राह को छोटा कर देती। यह दर्शाता है कि उच्चता आज्ञाकारिता और क्रूस के मार्ग से ही आती है।

“इस कारण परमेश्वर ने उन्हें अत्यन्त ऊँचा किया और वह नाम दिया जो हर नाम से श्रेष्ठ है।”
— फिलिप्पियों 2:9

आज भी बहुत से विश्वासियों को यह परीक्षा आती है —
थोड़ी-सी प्रसिद्धि, धन, मान-सम्मान, या दुनिया की सफलता के लिए सिद्धांतों से समझौता करना।

“यदि कोई मनुष्य सारे संसार को प्राप्त करे, पर अपना प्राण खो दे, तो उसे क्या लाभ?”
— मत्ती 16:26


3. मंदिर की चोटी – घमण्ड और गलत ‘आध्यात्मिकता’ की परीक्षा

“फिर शैतान उसे यरूशलेम ले गया, और मंदिर की चोटी पर खड़ा करके कहा, ‘यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो यहाँ से नीचे कूद जा…’”
— लूका 4:9

शैतान ने भजन 91 का हवाला देकर यीशु को अपनी सुरक्षा का दिखावा करने के लिए उकसाया।
परन्तु विश्वास का अर्थ परमेश्वर को आज़माना नहीं है।

यीशु ने उत्तर दिया—

“लिखा है— तू अपने प्रभु परमेश्वर की परीक्षा न ले।”
— लूका 4:12; व्यवस्थाविवरण 6:16

यीशु ने दिखाया कि परमेश्वर के वचन का उपयोग कभी भी घमण्ड, प्रदर्शन या आत्म-प्रमाण के लिए नहीं होता।

“परमेश्वर घमण्डियों का विरोध करता है, परन्तु दीनों पर अनुग्रह करता है।”
— याकूब 4:6

आज बहुत लोग “घोषणा”, “दर्शक-प्रिय विश्वास”, या “आत्मिक दिखावा” के नाम पर परमेश्वर की इच्छा पूछे बिना “कूद पड़ते” हैं—और अपेक्षा करते हैं कि परमेश्वर उन्हें पकड़ेगा।


प्रलोभन में विजय का गूढ़ संदेश

उत्पत्ति 3:6 में मानवता की तीन कमजोरियाँ दिखती हैं—

  1. “भोजन के लिए अच्छी” – इच्छा
  2. “देखने में मनोहर” – महिमा
  3. “बुद्धिमान बनाने वाली” – घमण्ड

यीशु, दूसरे आदम (रोमियों 5:18–19), इन तीनों में विजयी हुए जहाँ पहला आदम असफल हुआ।

“एक मनुष्य की अवज्ञा से बहुत लोग पापी ठहरे; उसी प्रकार एक की आज्ञाकारिता से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।”
— रोमियों 5:19

और हर बार यीशु ने व्यवस्थाविवरण से वचन उद्धृत किया—यह दिखाता है कि परमेश्वर का वचन परीक्षा में सबसे बड़ा हथियार है (इफिसियों 6:17)।

जंगल उनकी हार नहीं;
उनकी सेवा से पहले की प्रशिक्षण भूमि थी।


मसीही जीवन की तीन महत्त्वपूर्ण परीक्षाएँ

हर विश्वासी अपने जीवन में इन तीन चरणों से गुजरता है:

1. आवश्यकताओं की परीक्षा

विश्वास की शुरुआत में — जब हम सीखते हैं कि अपनी आवश्यकताओं के लिए परमेश्वर पर भरोसा करना है (मत्ती 6:33).

2. महत्वाकांक्षा की परीक्षा

सेवा में — जब हम प्रसिद्धि, प्रभाव, और सफलता चाहते हैं (1 यूहन्ना 2:16).

3. आत्म-उन्नति की परीक्षा

अन्तिम वर्षों में या बुलाहट के अन्त में — जब हम कष्ट से बचना चाहते हैं (2 तीमुथियुस 4:6–8).

वास्तविक विजय केवल परीक्षा से बचना नहीं, बल्कि अन्त तक विश्वासयोग्य रहना है।

“जो जय पाएगा, वह मेरे साथ मेरे सिंहासन पर बैठेगा, जैसा कि मैंने भी जय पाई…”
— प्रकाशितवाक्य 3:21


अन्त तक यीशु का अनुसरण

यीशु क्रूस से बच सकते थे।
लोगों ने क्रूस पर उन्हें चुनौती भी दी कि नीचे उतर आएँ (मत्ती 27:40–43)।
परन्तु उन्होंने धैर्यपूर्वक पीड़ा सहकर पिता की इच्छा पूरी की।

“यदि कोई मेरे पीछे आना चाहता है, तो वह स्वयं का इन्कार करे, अपना क्रूस प्रतिदिन उठाए और मेरे पीछे चले।”
— लूका 9:23

यीशु आज भी हमें चेताते हैं—

“जागते रहो और प्रार्थना करते रहो ताकि तुम परीक्षा में न पड़ो; आत्मा तो उत्सुक है, पर शरीर दुर्बल है।”
— मत्ती 26:41

और जो अन्त तक बने रहते हैं, उनके लिए प्रतिफल तैयार है—

“मैं अच्छी लड़ाई लड़ चुका हूँ, मैंने दौड़ पूरी कर ली है, और विश्वास को स्थिर रखा है… अब मेरे लिए धार्मिकता का मुकुट रखा हुआ है।”
— 2 तीमुथियुस 4:7–8

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“यह पीढ़ी मिटेगी नहीं…” — यीशु ने क्या कहा था?

(मत्ती 24:34)

“मैं तुम से सच कहता हूँ, जब तक ये सब बातें पूरी न हो लेंगी, यह पीढ़ी कभी न मिटेगी।”

यह बात यीशु ने उस समय कही जब चेलों ने उनसे पूछा कि “तेरे आने और संसार के अन्त का चिन्ह क्या होगा?” (मत्ती 24:3)। इसके उत्तर में यीशु ने अन्त समय की घटनाओं का विस्तृत वर्णन दिया। यह संदेश केवल उस समय के लोगों के लिए नहीं, बल्कि हर युग के विश्वासियों के लिए है—विशेषकर उन लोगों के लिए जो अन्त के दिनों में जीवित होंगे। यीशु हमें याद दिलाते हैं कि परमेश्वर का वचन कभी असफल नहीं होता (यशायाह 55:11)।


1. अन्त समय के चिन्ह: यह प्रसव-वेदना की शुरुआत है

मत्ती 24:6–8

“तुम लड़ाइयों और लड़ाइयों की खबरें सुनोगे… राष्ट्र राष्ट्र के विरुद्ध और राज्य राज्य के विरुद्ध उठ खड़े होंगे। जगह-जगह अकाल, रोग और भूकम्प होंगे। ये सब तो प्रसव-वेदना का आरम्भ है।”

यीशु बता रहे हैं कि ये घटनाएँ प्रसव-वेदना की तरह होंगी—जैसे-जैसे जन्म का समय पास आता है, दर्द बढ़ता जाता है। इसी प्रकार अन्त समय के चिन्ह भी बढ़ते और तेज होते जाएँगे। यह दिखाता है कि इतिहास परमेश्वर की योजना के अन्तिम चरण की ओर बढ़ रहा है (दानिय्येल 2:44; प्रकाशितवाक्य 11:15)।


2. धर्मत्याग और प्रेम का ठंडा पड़ना

मत्ती 24:10–12

“तब बहुत से लोग ठोकर खाएँगे, एक-दूसरे को पकड़वाएँगे… बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे और बहुतों को भ्रम में डाल देंगे। अधर्म बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा पड़ जाएगा।”

यीशु एक ऐसे समय का वर्णन कर रहे हैं जब अधर्म इतना बढ़ जाएगा कि लोगों का प्रेम—even कलीसिया के भीतर का प्रेम—ठंडा पड़ने लगेगा। यह वही “महाधर्मत्याग” है जिसका उल्लेख
2 थिस्सलुनीकियों 2:3 में है।
यहाँ “प्रेम” के लिए ग्रीक शब्द अगापे प्रयोग हुआ है, जो दर्शाता है कि यदि विश्वासी मसीह में न बने रहें, तो उनका प्रेम भी ठंडा हो सकता है (यूहन्ना 15:5–6)।


3. यरूशलेम का विनाश: एक ऐतिहासिक पूरा होना

लूका 21:20–24

“जब तुम देखोगे कि यरूशलेम सेनाओं से घिर गया है, तब समझ लो कि उसका उजड़ना निकट है…”

यह भविष्यवाणी वर्ष 70 ईस्वी में पूरी हुई जब रोमियों ने यरूशलेम और मन्दिर को तबाह कर दिया। यीशु ने पहले ही इस शहर के लिए रोया था
(लूका 19:41–44)। यह दानिय्येल 9:26–27 का भी आंशिक पूरा होना था।


4. इस्राएल का पुनर्निर्माण: अंजीर का वृक्ष फिर हरा होना

मत्ती 24:32–33

“अंजीर के वृक्ष से यह दृष्‍टान्त सीखो… जब उसकी डाल कोमल हो जाती है और पत्तियाँ निकल आती हैं, तो तुम जानते हो कि ग्रीष्म निकट है।”

बाइबल में अंजीर का वृक्ष अक्सर इस्राएल का प्रतीक है
(होशे 9:10; यिर्मयाह 24:5–7)।
इस दृष्‍टान्त का “हरा होना” इस्राएल के एक राष्ट्र के रूप में फिर से स्थापित होने की ओर संकेत करता है। यह 1948 में लगभग 2,000 वर्षों के बिखराव के बाद सचमुच पूरा हुआ—बिल्कुल वैसे ही जैसे यहेजकेल 36:24–28 और यशायाह 66:8 में भविष्यवाणी की गई थी।


5. “यह पीढ़ी मिटेगी नहीं…” — किस पीढ़ी की बात है?

मत्ती 24:34

“जब तक ये सब बातें पूरी न हों, यह पीढ़ी कभी न मिटेगी।”

यहाँ “पीढ़ी” के लिए प्रयुक्त ग्रीक शब्द genea के तीन संभावित अर्थ हैं:

  1. उस समय जीवित लोग
  2. एक विशेष प्रकार के लोग (जैसे अविश्वासी इस्राएली)
  3. वह पीढ़ी जो इस्राएल के दोबारा राष्ट्र बनने को देखे

संदर्भ के अनुसार, यह तीसरे अर्थ की ओर संकेत करता है—1948 के बाद की वह पीढ़ी जिसने इस्राएल की पुनर्स्थापना को देखा।

भजन 90:10 कहता है:

“हमारे जीवन के दिन सत्तर वर्ष के होते हैं, और बल के कारण अस्सी वर्ष तक पहुँचते हैं…”

इससे संकेत मिलता है कि अन्त की घटनाएँ उसी पीढ़ी के भीतर होंगी।
यह बताता है कि मसीह के लौटने का समय अब बहुत निकट है।


6. “आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे…” — पर उसका वचन नहीं टलेगा

मत्ती 24:35

“आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे, पर मेरी बातें कभी न टलेंगी।”

यीशु यहाँ अपने वचनों की पूरी विश्वसनीयता पर ज़ोर देते हैं।
यशायाह 40:8 भी यही कहता है:

“घास सूख जाती है, फूल मुरझा जाता है, पर हमारे परमेश्वर का वचन सदैव बना रहता है।”


7. जागते रहो और प्रार्थना करते रहो

लूका 21:34–36

“सावधान रहो… इसलिये जागते रहो और हर समय प्रार्थना करते रहो कि तुम इन सब होनेवाली बातों से बच सको…”

यीशु चेतावनी देते हैं कि सांसारिक चिन्ताएँ हमें सुस्त न बना दें।
हमें आत्मिक रूप से जाग्रत रहना है (रोमियों 13:11–14), और हर समय प्रभु के आने के लिए तैयार रहने की आवश्यकता है (1 यूहन्ना 2:28)।


8. पवित्र आत्मा का होना आवश्यक है

रोमियों 8:9

“यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं है तो वह उसका नहीं है।”

मत्ती 25 में बुद्धिमान कुँवारियों के पास “तेल”—अर्थात् पवित्र आत्मा था।
मूर्ख कुँवारियों के पास नहीं था, इसलिए वे तैयार नहीं मिलीं।
विश्वासियों को पवित्र आत्मा से भरना आवश्यक है (इफिसियों 4:30)।


9. संप्रदाय नहीं बचाता—यीशु ही बचाते हैं

यीशु किसी संप्रदाय को लेने नहीं आ रहे,
बल्कि एक पवित्र दुल्हन को लेने आ रहे हैं
(प्रकाशितवाक्य 19:7–8)।

उद्धार धार्मिक पहचान से नहीं मिलता, बल्कि:

  • नए जन्म से (यूहन्ना 3:3–6)
  • मसीह में बने रहने से (यूहन्ना 15:4)
  • आत्मा के अनुसार जीवन जीने से (गलातियों 5:16–25)

10. “उसमें से निकल आओ, मेरे लोगो…” — बाबुल से अलग होना

प्रकाशितवाक्य 18:4

“हे मेरे लोगो, उसमें से निकल आओ, ताकि तुम उसके पापों में सहभागी न बनो…”

बाबुल झूठे धर्म, भ्रष्टाचार और दुनियावी प्रणालियों का प्रतीक है।
परमेश्वर अपने लोगों को पवित्रता और सत्य के साथ अलग रहने के लिए बुलाता है
(2 कुरिन्थियों 6:17–18)।


हम अन्तिम पीढ़ी हैं

यीशु ने जिन चिन्हों की बात की थी, वे हमारी पीढ़ी में पूरी हो रही हैं
इस्राएल की पुनर्स्थापना से लेकर बढ़ते अधर्म, प्राकृतिक आपदाओं और आत्मिक छल तक।
यह सब संयोग नहीं, यह भविष्यवाणियों की स्पष्ट पूर्ति है।

समय बहुत कम है।

क्या आप उसके आने के लिए तैयार हैं?

अब समय है:

  • मन फिराने का (प्रेरितों के काम 3:19)
  • पवित्र आत्मा से भरने का (इफिसियों 5:18)
  • धर्मी और पवित्र जीवन जीने का (तीतुस 2:11–13)

“हाँ, आओ, प्रभु यीशु!”
(प्रकाशितवाक्य 22:20)

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जीवन का वृक्ष और भला-बुरा जानने का वृक्ष

उत्पत्ति 2:8-9

“और यहोवा परमेश्वर ने ईदन में एक बगीचा लगाया, जो पूर्व में था, और वहाँ उसने उस मनुष्य को रखा जिसे उसने बनाया था। और पृथ्वी से यहोवा परमेश्वर ने हर वह वृक्ष उगाया जो देखने में सुहावना और खाने में अच्छा था। और बगीचे के बीच में जीवन का वृक्ष और भला-बुरा जानने का वृक्ष था।”


1. हर वृक्ष जो देखने में सुहावना और खाने में अच्छा है

परमेश्वर ने आदम के लिए पर्याप्त व्यवस्था की—फलदार वृक्ष जो “देखने में सुहावने और खाने में अच्छे” थे (उत्पत्ति 2:9)। यह दर्शाता है कि परमेश्वर ने सृष्टि में मानव की ज़रूरतों की पूरी तरह से देखभाल की और उसकी उदारता दिखाई (भजन संहिता 104:14-15)। आदम को इन वृक्षों से परहेज करने का आदेश नहीं था; उन्हें परमेश्वर की कृपा का आनंद लेने की स्वतंत्रता दी गई थी (उत्पत्ति 1:29)।

यह संपन्नता दिखाती है कि पतन (Fall) से पहले परमेश्वर की सृष्टि पूरी तरह अच्छी और भलाई से भरी हुई थी।


2. बगीचे के मध्य में जीवन का वृक्ष

यह वृक्ष अनंत जीवन का प्रतीक था। इसका फल खाने से जीवन मिलता जो कभी समाप्त नहीं होता। यह जीवन केवल परमेश्वर से आता है। आदम के पाप के बाद जीवन के वृक्ष तक पहुँचना बंद हो गया (उत्पत्ति 3:22-24), यह दर्शाता है कि मानव पाप के कारण अनंत जीवन से अलग हो गया, जब तक कि परमेश्वर की कृपा से पुनर्स्थापित न हो।

यीशु मसीह स्वयं जीवन का सच्चा स्रोत हैं:

यूहन्ना 14:6
“यीशु ने कहा, मैं मार्ग, सत्य और जीवन हूँ; मुझ से बिना कोई पिता के पास नहीं आता।”

यूहन्ना 6:47-51
“सत्य-सत्य मैं तुमसे कहता हूँ, जो कोई विश्वास करता है, उसका अनन्त जीवन है। मैं जीवन का अन्न हूँ… जो इस अन्न को खाएगा वह अनंतकाल तक जीवित रहेगा।”

यह सिद्धांत बताता है कि उद्धार केवल विश्वास के द्वारा और केवल यीशु मसीह में संभव है। अनंत जीवन कर्मों या किसी प्राकृतिक प्रयास से नहीं मिलता, बल्कि केवल मसीह के साथ मिलन से (इफिसियों 2:8-9)।

गैलातियों 5:22-23 में बताए अनुसार, इस जीवन का फल पवित्र आत्मा का फल है, जो परमेश्वर की कृपा द्वारा आंतरिक परिवर्तन का प्रमाण है।


3. भला-बुरा जानने का वृक्ष

यह वृक्ष पाप और मृत्यु का प्रतीक है। परमेश्वर ने आदम से इसे खाने से मना किया और चेतावनी दी कि यदि वह खाएगा तो मृत्यु आएगी (उत्पत्ति 2:17)। यह वृक्ष परमेश्वर के अधिकार और मानव की जिम्मेदारी का प्रतीक है।

आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा न मानकर स्वतंत्रता को चुना, जिससे पतन हुआ (रोमियों 5:12)। पाप ने मानवता और पूरे संसार में आध्यात्मिक और शारीरिक मृत्यु ला दी (रोमियों 6:23)।

साँप, जिसे बाद में शैतान कहा गया (प्रकाशितवाक्य 12:9), ने छल से मानवता को लुभाया (उत्पत्ति 3)। यह प्रलोभन मानव गर्व और परमेश्वर से अलग अपनी इच्छा को बढ़ावा देता है (1 यूहन्ना 2:16)।


आध्यात्मिक वास्तविकता और आज का चुनाव

इन दो वृक्षों के बीच का चुनाव आज भी आध्यात्मिक रूप से जारी है:

  • जीवन का वृक्ष → मसीह में विश्वास और आज्ञाकारिता, जो अनंत जीवन की ओर ले जाता है (यूहन्ना 3:16)।
  • भला-बुरा जानने का वृक्ष → विद्रोह और पाप, जो मृत्यु की ओर ले जाता है (रोमियों 6:23)।

पौलुस हमें चेतावनी देते हैं:

रोमियों 6:16
“क्या तुम नहीं जानते कि जो कोई किसी के अधीन दास बनकर अपनी सेवा देता है, वह उसी का दास होता है जिसके अधीन वह है—या तो पाप का, जो मृत्यु देता है, या आज्ञाकारिता का, जो धार्मिकता देता है?”

बाइबिल स्पष्ट रूप से कहती है कि अनंत जीवन केवल यीशु मसीह में है (प्रेरितों के काम 4:12)। पाप चुनने से हम परमेश्वर से अनंतकाल के लिए अलग हो जाते हैं (मत्ती 25:46)।

परमेश्वर की कृपा आज भी तत्काल है (इब्रानियों 3:7-8)। आज ही जीवन का चुनाव करें, यीशु मसीह के माध्यम से (व्यवस्थाविवरण 30:19; 2 कुरिन्थियों 6:2)।


अंतिम प्रश्न

  • क्या आपने यीशु मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार किया है?
  • क्या आपने पवित्र आत्मा प्राप्त किया है? (प्रेरितों के काम 2:38; इफिसियों 1:13-14)

ईश्वर की कृपा आपको अनंत जीवन की ओर मार्गदर्शन करे।.

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सात विपत्तियाँ और प्रभु का दिन

आज हम जो अनुग्रह अनुभव कर रहे हैं, वह एक दिन समाप्त हो जाएगा। दुनिया में कुछ आवाज़ें कहती हैं कि पुराने नियम का परमेश्वर अब अस्तित्व में नहीं है, या जो चमत्कार और संकेत उसने अतीत में किए, उनकी अब कोई प्रासंगिकता नहीं है। लेकिन प्रभु का दिन आने वाला है, और कोई भी नहीं चाहेगा कि वह इसे अनुभव करे! यह परमेश्वर के क्रोध का अटल समय है — ऐसा समय जिसे कोई भी, अपने सबसे बड़े शत्रु के लिए भी, नहीं चाहता। वर्तमान में परमेश्वर अपने क्रोध को दया के कारण रोक रहे हैं, ताकि संसार को पश्चाताप करने का समय मिले। लेकिन जब समय आएगा, जो लोग इस अनुग्रह को ठुकराएंगे, उन्हें अपने कर्मों का परिणाम भुगतना होगा।

प्रभु का दिन और भविष्य की घटनाएँ
परमेश्वर के उद्धार योजना में तीन महत्वपूर्ण भविष्य की घटनाएँ हैं, जिन्हें हमें समझना चाहिए:

महाप्रलय (The Great Tribulation)

प्रभु का दिन (The Day of the Lord)

आग का समुद्र (Lake of Fire)

इस खंड में हम प्रभु के दिन पर ध्यान देंगे — वह विशेष समय जब परमेश्वर दुनिया पर अपना अंतिम न्याय करेंगे, और कौन प्रभावित होगा।

1. महाप्रलय
महाप्रलय एक अभूतपूर्व पीड़ा का समय होगा, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो मसीह के प्रति वफादार बने रहेंगे। यह समय मुख्य रूप से उन ईसाइयों से संबंधित है जो जन्तु के चिन्ह (Mark of the Beast) को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, जैसा कि प्रकाशितवाक्य (Revelation) में बताया गया है। उन्हें भयानक सताएँ झेलनी होंगी, और कई लोग अपने विश्वास के लिए शहीद होंगे। महाप्रलय तीन वर्ष और छह महीने तक चलेगी, जब दुनिया पाप में डूबी रहेगी, अंतिम प्रतिशय (Antichrist) का पालन करेगी और उसकी सत्ता की पूजा करेगी।

मत्ती 24:21-22:
“क्योंकि उस समय बड़ा संकट होगा, जैसे संसार की उत्पत्ति से अब तक कभी नहीं हुआ और न फिर कभी होगा। यदि वे दिन कम न किए गए होते, तो कोई भी जीवित न बच पाता; परन्तु चुने हुए के कारण उन दिनों को कम किया जाएगा।”

इस पीड़ा के बावजूद, जो लोग अंत तक दृढ़ रहेंगे, वे उद्धार पाएंगे। महाप्रलय का चरम प्रभु के दिन में होगा, जो धरती पर अंतिम न्याय और परमेश्वर के क्रोध का समय है।

2. प्रभु का दिन
प्रभु का दिन केवल 24 घंटे का दिन नहीं है, बल्कि वह अवधि है जब परमेश्वर दुनिया पर अपना न्याय प्रकट करेंगे, पाप को दंडित करेंगे और धर्म का पुरस्कार देंगे। जो पश्चाताप नहीं करते, उनके लिए यह दिन भयानक होगा। इसे बाइबल में अंधकार, विनाश और ब्रह्मांडीय उलटफेर का समय कहा गया है।

यशायाह 13:6-9:

“आह! प्रभु का दिन निकट है; वह सर्वशक्तिमान से विपत्ति के रूप में आता है। इसलिए सभी हाथ शक्ति रहित होंगे, प्रत्येक हृदय भय से पिघल जाएगा। भय उन्हें घेर लेगा, पीड़ा और वेदना उन्हें पकड़ लेंगी; वे प्रसूति में स्त्री की तरह मरोड़ेंगे। वे एक-दूसरे को भयभीत दृष्टि से देखेंगे, उनके चेहरे जलेंगे। देखो, प्रभु का दिन आता है — क्रोध और प्रचंड गुस्से से भरा दिन — भूमि को वीरान करने और उसमें पापियों को नष्ट करने के लिए।”

इस समय दुनिया अपने पापों के लिए परमेश्वर के क्रोध का अनुभव करेगी, विशेष रूप से वे जिन्होंने जन्तु का चिन्ह स्वीकार किया, अंतिम प्रतिशय की पूजा की या परमेश्वर की जनता का उत्पीड़न किया।

योएल 2:31:

“बड़ा और भयानक प्रभु का दिन आने से पहले सूरज अंधकार में बदल जाएगा और चंद्रमा रक्त में।”

3. प्रभु के दिन की अवधि
प्रभु का दिन 75 दिन चलेगा, जैसा कि दानियेल 12:11-12 में भविष्यवाणी है। यह महाप्रलय के 1,260 दिनों और 1,335 दिनों के अंतर से निकलता है। इस अवधि में सात शृंगों और सात कटोरियों के न्याय सहित भयंकर घटनाएँ होंगी।

दानियेल 12:11-12:

“जिस दिन से दैनंदिन बलिदान हटाया जाएगा और विध्वंस का घृणित चिन्ह स्थापित होगा, वहाँ 1,290 दिन होंगे। धन्य है वह जो प्रतीक्षा करता है और 1,335 दिनों का अंत देखता है।”

सात शृंग और सात विपत्तियाँ
सात शृंग प्रभु के दिन के पहले बजाई जाएँगी, प्रत्येक पृथ्वी पर एक विशेष न्याय की घोषणा करेगी। ये मानवता के लिए परमेश्वर की चेतावनी हैं। कुछ लोग पश्चाताप करेंगे, परंतु अधिकांश नहीं।

प्रकाशितवाक्य 8:6-7:

“सात शृंग रखने वाले सात स्वर्गदूत तैयार हो गए। पहले ने अपनी शृंग बजाई, और हिम और आग, रक्त के मिश्रण सहित, पृथ्वी पर गिराए गए। पृथ्वी का एक तिहाई भाग जल गया, एक तिहाई पेड़ जल गए, और सारा हरित घास जल गया।”

सात विपत्तियाँ
प्रकाशितवाक्य 16 में हमें सात कटोरियाँ दिखाई गई हैं, जो प्रभु के दिन दुनिया पर उंडेली जाएँगी। ये अंतिम न्याय हैं उन लोगों पर जो जन्तु का पालन करते हैं।

पहली विपत्ति – जन्तु का चिन्ह रखने वालों पर छाले:
“पहला स्वर्गदूत अपनी कटोरी पृथ्वी पर उंडेलता है, और जन्तु का चिन्ह रखने वाले और उसकी मूर्ति की पूजा करने वाले लोगों पर भयानक छाले उभरते हैं।”

दूसरी विपत्ति – समुद्र रक्त में बदल जाता है।

तीसरी विपत्ति – नदियाँ और जल स्रोत रक्त में बदल जाते हैं।

चौथी विपत्ति – सूर्य की तपिश से लोग जलते हैं।

पाँचवीं विपत्ति – जन्तु के राज्य में अंधकार और पीड़ा।

छठी विपत्ति – युफ्रेट नदी सूखती है, आर्मगेडन के लिए मार्ग तैयार।

सातवीं विपत्ति – भूकंप और शहरों का विनाश।

आग का समुद्र और अंतिम न्याय
प्रभु के दिन के बाद सभी पापियों का न्याय होगा और उन्हें आग के समुद्र में फेंक दिया जाएगा, जो अनंत पीड़ा का स्थान है।

प्रकाशितवाक्य 20:11-15:
“फिर मैंने एक बड़ा सफेद सिंहासन देखा, और उस पर बैठा हुआ…”

 

 

 

 

 

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हम परमेश्वर के लिए कैसे फल ला सकते हैं?

हम परमेश्वर के लिए कैसे फल ला सकते हैं?
परमेश्वर के लिए फल लाने के लिए, हर ईसाई को आध्यात्मिक वृद्धि की यात्रा से गुजरना पड़ता है। यीशु ने इस यात्रा को बीजारक की दृष्टांत (Parable of the Sower) के माध्यम से समझाया, जो बताती है कि हर विश्वास करने वाले को चार चरणों से गुजरना पड़ता है। आइए इन चरणों को विस्तार से देखें:

मत्ती 13:2–9 (ERV-HI)

“और बड़ी भीड़ उनके चारों ओर इकट्ठी हो गई, जिससे वह नाव में बैठ गया और बैठकर सिखाने लगे। भीड़ समुद्र तट पर खड़ी थी। उन्होंने उन्हें अनेक दृष्टांतों में बातें सुनाईं, और कहा: ‘एक बीजारक बीज बोने निकला। और जब वह बो रहा था, कुछ बीज रास्ते के किनारे गिर गए, और पक्षी आकर उन्हें खा गए। कुछ बीज चट्टानी जमीन पर गिरे, जहां मिट्टी कम थी, और वे तुरंत उगे, क्योंकि उनकी मिट्टी गहरी नहीं थी। लेकिन सूरज के उगने पर वे जल गए। चूंकि उनका मूल नहीं था, वे सूख गए। कुछ बीज कांटों के बीच गिरे, और कांटे उन्हें दबा दिए। कुछ बीज अच्छी जमीन में गिरे और अनाज पैदा किया, कुछ सौगुना, कुछ साठ, कुछ तीस। जो कान सुन सकता है, वह सुने।’”

यह दृष्टांत केवल खेती के बारे में नहीं है, बल्कि हमारे दिलों और परमेश्वर के वचन को ग्रहण करने और उस पर प्रतिक्रिया देने के तरीके के बारे में है। यह दिखाता है कि किसी भी ईसाई के जीवन में आध्यात्मिक विकास के चरण कैसे होते हैं।

चरण 1: रास्ता – वह दिल जो अभी वचन को नहीं समझ पाया
जब आप परमेश्वर के साथ अपने जीवन की शुरुआत करते हैं, तो आप वचन को सुनते हैं और आपके दिल में एक stirring होती है। आप उत्सुक होते हैं, और सत्य को समझने की इच्छा रखते हैं। लेकिन प्रारंभिक चरण में वचन गहराई से जड़ नहीं पकड़ता क्योंकि आप अभी इसका पूर्ण अर्थ नहीं समझ पाते।

मत्ती 13:19 (ERV-HI)

“जब कोई राज्य का वचन सुनता है और उसे नहीं समझता, तो वह दुष्ट आकर उसके हृदय में बोए गए वचन को छीन लेता है। यही वह है जो रास्ते के किनारे बोया गया।”

यदि वचन को समझ और आध्यात्मिक भूख के साथ पोषण नहीं किया गया, तो शत्रु (शैतान) उसे छीन ले लेता है। इसलिए कई लोग बाहरी रूप से ईसाई होते हैं लेकिन उनके अंदर कोई परिवर्तन नहीं होता।

मुख्य सचाई: वचन को आध्यात्मिक भूख के साथ खोजा जाना चाहिए, अन्यथा वह टिकता नहीं। परमेश्वर को समझने की आपकी इच्छा बढ़ाएं और पवित्र आत्मा को आपको गहराई में खींचने दें।

चरण 2: चट्टानी जमीन – उथले मूल और परीक्षाएँ
जब कोई विश्वास करने वाला पहले चरण से आगे बढ़ता है और खुशी के साथ वचन ग्रहण करता है, तो यात्रा आसान नहीं होती बल्कि परीक्षाओं से गुजरती है।

मत्ती 13:20–21 (ERV-HI)

“जो चट्टानी जमीन पर बोया गया, वह वह है जो वचन सुनता है और तुरंत खुशी के साथ उसे ग्रहण करता है, परंतु उसका कोई मूल नहीं होता; थोड़ी देर तक वह टिकता है, और जब वचन के कारण संकट या उत्पीड़न आता है, तो तुरंत गिर जाता है।”

इस चरण में आपका विश्वास परीक्षाओं, कठिनाइयों और आध्यात्मिक विरोधों के माध्यम से परखा जाता है। परमेश्वर ये परीक्षाएँ आपके सुधार और स्थिरता के लिए अनुमति देते हैं।

लूका 9:23 (ERV-HI)

“यदि कोई मेरे पीछे आना चाहता है, तो वह अपने आप को नकारे और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे आए।”

धैर्य के बिना कई लोग कठिनाइयों में विश्वास छोड़ देते हैं। इसलिए दृढ़ रहें और समझें कि ये परीक्षाएँ आपकी वृद्धि का प्रमाण हैं, असफलता का नहीं।

चरण 3: कांटों के बीच – सांसारिक चिंता से दबा हुआ
यदि आप परीक्षाओं में टिक जाते हैं, तो अगली चुनौती आती है: सांसारिक व्यस्तताएँ। इस चरण में शैतान अपनी रणनीति बदल देता है। सीधे विरोध के बजाय, वह लालच, धन, व्यस्तता और सुख के माध्यम से आपकी आध्यात्मिक जीवन को दबाने की कोशिश करता है।

मत्ती 13:22 (ERV-HI)

“जो कांटों के बीच बोया गया, वह वह है जो वचन सुनता है, लेकिन संसार की चिन्ता और धन की धोखेबाज़ी वचन को दबा देती है और फलहीन हो जाता है।”

मत्ती 6:33 (ERV-HI)

“परंतु सबसे पहले परमेश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज करो, और ये सब चीजें तुम्हें दी जाएंगी।”

संसार की व्यस्तताओं को अपने समय और ध्यान को परमेश्वर से दूर न करने दें।

चरण 4: अच्छी जमीन – धैर्य के साथ फल देने वाला जीवन
यह लक्ष्य है – अच्छी जमीन बनना, जहाँ परमेश्वर का वचन गहराई से जड़ पकड़ता है और स्थायी फल देता है।

लूका 8:15 (ERV-HI)

“अच्छी जमीन पर जो बोया गया, वे वही हैं जो वचन सुनते हैं और उसे ईमानदार और अच्छे हृदय में थामे रखते हैं, और धैर्यपूर्वक फल देते हैं।”

इस चरण तक पहुँचना तुरंत नहीं होता। इसके लिए पहले तीन चरणों – भ्रम, परीक्षाएँ और व्यस्तताओं – में धैर्य रखना पड़ता है।

याकूब 1:12 (ERV-HI)

“धन्य है वह मनुष्य जो परीक्षा में स्थिर रहता है; क्योंकि जब वह परीक्षा में ठहर जाता है, उसे जीवन का मुकुट मिलेगा।”

इस चरण में ईसाई तीस, साठ या सौगुना फल देता है, जो परमेश्वर की कृपा और बुलाहट के अनुसार होता है।

आप अभी कहाँ हैं?
यह दृष्टांत हमें सोचने पर मजबूर करता है:

क्या आप रास्ते पर हैं, और वचन को समझने में संघर्ष कर रहे हैं?

क्या आप चट्टानी जमीन पर हैं, परीक्षाओं से गुजर रहे हैं?

क्या आप कांटों के बीच हैं, संसार और धन की व्यस्तताओं से विचलित?

या आप अच्छी जमीन में हैं, धैर्यपूर्वक फल दे रहे हैं?

प्रकाशितवाक्य 3:21 (ERV-HI)

“जो विजयी होगा, मैं उसे अपने सिंहासन के पास बैठने दूँगा, जैसा कि मैं विजयी होकर अपने पिता के सिंहासन के पास बैठा।”

आइए हम सब मिलकर परिपक्वता की ओर बढ़ें, और पवित्र आत्मा की शक्ति के लिए दैनिक प्रार्थना करें, जो हमें मार्गदर्शन करे, मजबूत करे और परमेश्वर के गौरव के लिए स्थायी फल देने के लिए तैयार करे।

प्रार्थना
हे प्रभु, मुझे हर बाधा – चाहे वह समझ की कमी हो, परीक्षाएँ हों या सांसारिक व्यस्तताएँ – पार करने में मदद करें ताकि मैं आपके राज्य के लिए फल ला सकूँ। अपनी आत्मा से मुझे मजबूत बनाएं और मुझे अच्छी जमीन बनने में सहायता करें, ताकि मैं आपके उद्देश्य को पूरा कर सकूँ। आमीन।

परमेश्वर आपको आशीर्वाद दें। दृढ़ रहें, बढ़ते रहें, और आपका जीवन प्रभु के लिए बहुत फलदायक बने।

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ईश्वर ने मसीह को अत्यन्त महिमा दी है।


इफिसियों 1:20-23

“…और उसने उसे मरे हुओं में से जिलाकर स्वर्ग में अपने दाहिने हाथ पर बैठाया,
21—सभी राज्य, अधिकार, शक्ति, प्रभुता और हर उस नाम से बहुत ऊँचा जो न केवल इस युग में, बल्कि आने वाले युग में भी कहलाएगा।
22 और उसने सब कुछ उसके पाँवों के नीचे कर दिया, और उसे कलीसिया का सिर ठहराया—
23 जो उसकी देह है, उसकी पूर्णता है, जो सब कुछ में आप पूर्ण है।”

1 तीमुथियुस 6:15-16

“…वही धन्य और एकमात्र सर्वशक्तिमान, राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु है।
16 वही है जो अकेला अमर है और ऐसी ज्योति में निवास करता है जहाँ कोई पहुँच नहीं सकता; न कोई मनुष्य उसे देख सकता है, न देखा है। उसका आदर और सामर्थ्य सदा बना रहे। आमीन।”


भाइयों और बहनों, जब प्रभु यीशु मसीह पहली बार पृथ्वी पर आए, तो वह एक दास का रूप लेकर, हमारी तरह एक साधारण मनुष्य के समान आए। पर उन्होंने अपने आपको नम्र किया, और मृत्यु तक—यहाँ तक कि क्रूस की मृत्यु तक—आज्ञाकारी बने। और इस कारण, परमेश्वर ने उन्हें अत्यन्त महिमा दी।

इसलिए याद रखो—वह साधारण मनुष्य नहीं हैं!
वे अग्नि की ज्वाला हैं!!

अपने मन से यह विचार निकाल दो कि वह कोई आम व्यक्ति हैं जिसे हल्के में लिया जा सकता है। वह कोई अभिनेता नहीं जिसे फिल्मों या नाटकों में दर्शाया जाता है—वह स्वर्ग का स्वामी है।

स्वर्ग के शक्तिशाली स्वर्गदूत तक उनके सामने काँपते हैं!
वे उस महिमा में बैठे हैं जहाँ न कोई मनुष्य पहुँच सकता है, न कोई स्वर्गदूत। क्या तुम कल्पना कर सकते हो वह कौन हैं?


फिलिप्पियों 2:7-11

“उन्होंने अपनी महिमा को त्यागकर दास का रूप धारण किया और मनुष्यों के समान बन गए।
और मनुष्य के रूप में पाए जाने पर, उन्होंने अपने आपको दीन किया और मृत्यु तक आज्ञाकारी बने—यहाँ तक कि क्रूस की मृत्यु तक।
इसलिए, परमेश्वर ने उन्हें भी बहुत ऊँचा किया और वह नाम दिया जो सब नामों से श्रेष्ठ है,
ताकि यीशु के नाम पर हर एक घुटना झुके—स्वर्ग में, पृथ्वी पर, और पाताल में,
और हर एक जीभ यह स्वीकार करे कि यीशु मसीह ही प्रभु हैं—परमेश्वर पिता की महिमा के लिए।”


इन सभी शास्त्रों से स्पष्ट है कि आज प्रभु यीशु मसीह कितने महान और शक्तिशाली हैं। कोई भी चीज—स्वर्ग में, पृथ्वी पर या अधोलोक में—उनकी आज्ञा के बिना नहीं चलती।

सभी आत्माएँ—चाहे स्वर्गदूत हों या दुष्टात्माएँ—उनके अधीन हैं

यहाँ तक कि शैतान भी कुछ करने से पहले उनसे अनुमति माँगता है
शैतान खुद से कोई निर्णय नहीं ले सकता।


रोमियों 14:9

“मसीह मरे और जी उठे इसी लिए कि वह मरे हुओं और जीवितों दोनों का प्रभु हो।”

कोई भी ओझा या ज्योतिषी तुम्हें यह न कहे कि वह मरे हुए से तुम्हें मिला सकता है—यह झूठ है!
मरे हुओं पर अधिकार सिर्फ यीशु मसीह को है


प्रबुद्धता और सत्ता का स्त्रोत – सिर्फ यीशु मसीह

नीतिवचन 16:3-4

“अपने कामों को यहोवा को सौंप दो,
तो तुम्हारे विचार स्थिर रहेंगे।
यहोवा ने सब कुछ अपने उद्देश्य के लिए बनाया है,
यहाँ तक कि दुष्टों को भी बुरे दिन के लिए।”

विलापगीत 3:37-38

“जिसे यहोवा ने आज्ञा नहीं दी,
वह कौन है जो कहे और वह हो जाए?
क्या अच्छे और बुरे दोनों बातें
परमप्रधान के मुँह से नहीं निकलतीं?”


क्या तुम इन बातों को सुनकर भी नहीं काँपते?
उस नाम का भय कहाँ है?
उस प्रभु का डर कहाँ है जिसके सामने आकाश, धरती और पाताल सब झुकते हैं?


अलौकिक शक्ति का राज्य आने वाला है

जब प्रभु यीशु मसीह 1000 वर्षों के शासन के लिए फिर से आएंगे, तब पृथ्वी एदेन की वाटिका जैसी बन जाएगी। समुद्र समाप्त हो जाएगा, और धरती का विस्तार होगा। तब दुनिया भर में अनेक राजा और शासक होंगे, और यीशु मसीह यरूशलेम में सिंहासन पर विराजमान होंगे।

उस दिन भूख, रोग, युद्ध, और दुख नाम की कोई चीज नहीं होगी।
सभी राष्ट्र उसके पास उसकी आराधना के लिए आएंगे।


वास्तविक रास्ता – क्रूस का रास्ता

प्रकाशित वाक्य 3:20-21

“देखो, मैं द्वार पर खड़ा होकर खटखटा रहा हूँ;
जो कोई मेरी आवाज़ सुनकर द्वार खोलेगा,
मैं उसके पास भीतर जाऊँगा,
और उसके साथ भोजन करूँगा।
जो विजयी होगा, मैं उसे अपने साथ अपने सिंहासन पर बैठने दूँगा,
जैसे मैं भी विजयी होकर अपने पिता के साथ उसके सिंहासन पर बैठा।”

लेकिन हम यह महिमा तभी पा सकते हैं जब हम भी उसी मार्ग से जाएँ जिससे यीशु मसीह स्वयं गए—क्रूस का मार्ग

यूहन्ना 14:6

“यीशु ने कहा, ‘मार्ग, सत्य और जीवन मैं ही हूँ। कोई भी पिता के पास नहीं आता, परंतु मेरे द्वारा।’”


लूका 9:23-26

“जो कोई मेरा अनुयायी बनना चाहता है, वह स्वयं का इनकार करे,
प्रतिदिन अपना क्रूस उठाए और मेरे पीछे चले।
क्योंकि जो अपने प्राण को बचाना चाहता है वह उसे खो देगा;
और जो मेरे लिए अपने प्राण को खोएगा, वही उसे पाएगा।”


क्या तुम्हारा क्रूस क्या है?

क्या यह सिर्फ नौकरी में तरक्की पाना है?
क्या यह सिर्फ शारीरिक चंगाई है?
क्या यह फैशन और दुनिया की सराहना में जीना है?

या फिर पूरी तरह अपने जीवन को प्रभु को समर्पित करना, और दुनिया की आलोचना को झेलना है?


2 तीमुथियुस 3:12

“हाँ, जो भी मसीह यीशु में भक्ति का जीवन जीना चाहते हैं, वे सताए जाएंगे।”


बहनों और भाइयों, अब भी समय है।
अपने जीवन की जाँच करो—क्या तुमने अपना क्रूस उठाया है?
क्या तुमने दुनिया को छोड़ प्रभु के मार्ग को अपनाया है?


मत्ती 10:32-38

“जो कोई लोगों के सामने मुझे स्वीकार करेगा,
मैं भी उसे अपने पिता के सामने स्वीकार करूँगा।
पर जो कोई मुझे नकारेगा,
मैं भी उसे नकार दूँगा।”

“जो अपने माता-पिता, पुत्र या पुत्री को मुझसे अधिक प्रेम करता है,
वह मेरे योग्य नहीं है।
और जो अपना क्रूस नहीं उठाता और मेरे पीछे नहीं चलता,
वह मेरे योग्य नहीं है।”


क्या तुम मसीह के पीछे चलने के लिए तैयार हो?

कृपया ध्यान दो—विजयी वही होगा जो यीशु की तरह अपने क्रूस को उठाएगा, दुख झेलेगा, सताया जाएगा, लेकिन फिर भी प्रभु से विमुख नहीं होगा।


फिलिप्पियों 1:29

“क्योंकि तुम्हें मसीह के लिए केवल उस पर विश्वास करने का वरदान ही नहीं दिया गया,
बल्कि उसके लिए दुख उठाने का भी वरदान मिला है।”


**निष्कर्ष

(Conclusion)**

यदि प्रभु यीशु मसीह आज महिमा में हैं, यह सिर्फ इसलिए है क्योंकि उन्होंने दुख, अपमान और मृत्यु तक भी आज्ञा का मार्ग अपनाया।

अगर हम उनके साथ राज्य करना चाहते हैं,
हमें भी उस क्रूस के मार्ग पर चलना होगा

धोखे से सावधान रहो, दुनिया की सुख-सुविधा और झूठी प्रेरणाओं से भागो।


उस महिमावान राजा यीशु मसीह को युगानुयुग महिमा, आदर और स्तुति मिलती रहे!
हालेलूयाह!


ईश्वर तुम्हें आशीष दे।


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मृत्यु की पाप 

शास्त्रों के अनुसार मृत्यु की पाप क्या है?

1 यूहन्ना 5:16-17
“यदि कोई अपने भाई को ऐसा पाप करते देखे, जो मृत्यु का नहीं है, तो वह प्रार्थना करे, और परमेश्वर उसको जीवन देगा — उन लोगों के लिये जो ऐसा पाप करते हैं, जो मृत्यु का नहीं है।
परन्तु एक पाप है जो मृत्यु का है: उसके लिये मैं नहीं कहता कि वह प्रार्थना करे।
हर अधर्म पाप है, और कुछ पाप ऐसे हैं जो मृत्यु के नहीं होते।”

बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि दो प्रकार के पाप होते हैं:

  1. मृत्यु के पाप
  2. मृत्यु के नहीं पाप

मृत्यु का नहीं पाप (Sin Not Unto Death)

यह ऐसा पाप है, जो यदि कोई व्यक्ति करता है, तो वह पश्चाताप कर सकता है और क्षमा प्राप्त कर सकता है। यह पाप अक्सर अज्ञानता, आत्मिक अपरिपक्वता, या अज्ञानता के कारण होता है, और यह परमेश्वर की अनुग्रह की सीमा के भीतर होता है।

ऐसे पापों के लिए बाइबल कहती है कि व्यक्ति पश्चाताप करे और क्षमा पाए, और उसे मृत्यु नहीं होगी। लेकिन एक और प्रकार का पाप है — मृत्यु का पाप — जिसे करने के बाद व्यक्ति को भले ही क्षमा मिले, फिर भी मृत्यु की सज़ा टलती नहीं


मृत्यु का पाप (Sin Unto Death)

यह पाप दो प्रकार के लोगों में पाया जाता है:

  1. परमेश्वर के बच्चे और उसके सेवक
  2. वे लोग जिन पर परमेश्वर की अनुग्रह बार-बार आई, लेकिन उन्होंने उसे तुच्छ जाना

मूसा और इस्राएली लोगों का उदाहरण इसमें स्पष्टरूप से दिखता है।
मूसा परमेश्वर का एक विशेष दास था, जिसे परमेश्वर ने भविष्यवक्ताओं से भी अधिक करीब से प्रयोग किया। लेकिन जब मूसा ने जानबूझकर परमेश्वर की आज्ञा की अवहेलना की और उसका महिमा अपने ऊपर ली, तो उसने मृत्यु का पाप किया।

परमेश्वर ने मूसा को क्षमा किया, लेकिन सज़ा बनी रही — वह प्रतिज्ञा की भूमि को देख नहीं पाया।

आज भी कुछ सेवकगण परमेश्वर की महिमा स्वयं ले लेते हैं, आज्ञाओं की अवहेलना करते हैं। यही पाप अननियास और सफ़ीरा ने किया जब उन्होंने पवित्र आत्मा से झूठ बोला और तुरन्त मृत्यु आई — ये सब मृत्यु के पाप हैं।


इसी प्रकार इस्राएली लोग आज के “गुनगुनाते और आधे-अधूरे” मसीही विश्वासियों का प्रतीक हैं। उन्होंने परमेश्वर की महिमा, आश्चर्यकर्म और चमत्कार देखे, फिर भी उनके दिल कठोर रहे।
वे मूर्तिपूजा में, व्यभिचार में और कुड़कुड़ाहट में लगे रहे।
अंततः, जब परमेश्वर की अनुग्रह का समय समाप्त हुआ, तो उसने शपथ खाई कि वे सब जंगल में मरेंगे, चाहे वे पश्चाताप करें या आँसू बहाएँ। केवल उनके बच्चे ही प्रतिज्ञा की भूमि में प्रवेश कर पाए।

यही है मृत्यु का पाप।


अब सोचिए — अगर आप किसी विशेष आशीर्वाद के योग्य हैं, लेकिन वह सदा के लिए खो जाता है, तो आपको कैसा लगेगा?

बाइबल इस संदर्भ में चेतावनी देती है:


1 कुरिन्थियों 10:1–12 (संक्षिप्त)

  • हमारे पूर्वज सभी बादल के नीचे थे, समुद्र के पार हुए, और मूसा के साथ आत्मिक रीति से बपतिस्मा लिया
  • उन्होंने आत्मिक आहार और आत्मिक जल पिया — वह जल चट्टान से था, और वह चट्टान मसीह था
  • लेकिन फिर भी परमेश्वर ने उनमें से अधिकतर से प्रसन्नता नहीं की — वे जंगल में नाश हो गए
  • ये सब हमारे लिए चेतावनी और दृष्टांत हैं
  • इसलिए जो समझता है कि वह खड़ा है, वह सावधान रहे कि वह गिर न जाए

आज का मसीही जगत भी इससे अलग नहीं है।
लोग जानते हैं कि यीशु उद्धारकर्ता हैं, चर्च जाते हैं, बपतिस्मा लेते हैं, सच्चाई जानते हैं — फिर भी व्यभिचार में, नशे में, गाली-गलौज, अश्लीलता, चुगली, अशुद्ध वस्त्र पहनना, पोर्न देखना जैसे पापों में जीते हैं। वे जानते हैं कि परमेश्वर को ये बातें अप्रिय हैं, फिर भी वे उसकी अनुग्रह को तुच्छ समझते हैं।

यह मृत्यु के पाप की ओर बढ़ना है।

अगर परमेश्वर ने मूसा जैसे सेवक को नहीं छोड़ा, तो तुम सोचते हो तुम बच जाओगे?


हो सकता है आज आपको सुसमाचार सुनाया गया हो, लेकिन आप सोचें:
“थोड़ा और जी लूं, बाद में सुधर जाऊँगा…”

लेकिन क्या पता कि इससे पहले ही कोई लाइलाज बीमारी आपको पकड़ ले — तब आप पश्चाताप करेंगे, लेकिन परिणाम नहीं बदलेगा।
इसलिए कई लोग, चाहे कितनी भी प्रार्थना की जाए, चंगे नहीं होते — क्योंकि उन्होंने मृत्यु का पाप किया होता है।

मैं यह डराने के लिए नहीं कह रहा, पर यह सत्य है।


पाप के परिणाम और चेतावनी

जब कोई मृत्यु का पाप करता है, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि वह स्वर्गीय पुरस्कार खो बैठता है।
यदि परमेश्वर ने उसे किसी सेवा के लिए बुलाया था, वह अब नहीं हो सकती — उसकी जगह किसी और को दी जाती है, जैसे यहूदा की जगह किसी और को दी गई।

जब दूसरे स्वर्ग में मुकुट पाएंगे, तो वह व्यक्ति खाली हाथ रहेगा।

इसलिए बाइबल कहती है:

2 पतरस 1:10
“इस कारण, हे भाइयो, और भी अधिक यत्न करो कि तुम्हारा बुलाया जाना और चुना जाना स्थिर हो जाए; क्योंकि यदि तुम ये बातें करते रहोगे, तो कभी न गिरोगे।”


आज, जब परमेश्वर की आत्मा आपको बुला रही है, तब उसकी सुनो।
वरना वह दिन आएगा जब आप कहेंगे: “हे प्रभु, मुझे क्षमा कर, मैं जीना चाहता हूँ!” — लेकिन फिर बहुत देर हो चुकी होगी।

फिलिप्पियों 2:12–13
“…अपने उद्धार को भय और कांप के साथ पूरा करो।
क्योंकि परमेश्वर ही है जो तुम में अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करता है, कि तुम चाहो और उसके भले उद्देश्य को पूरा करो।”

आमेन!


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स्वर्ग के राज्य में कौन महान है?

स्वर्ग के राज्य की समझ के लिए यह जानना बहुत आवश्यक है कि अधिकार और धन में स्पष्ट अंतर होता है — यह अंतर इस संसार में भी है और परमेश्वर के राज्य में भी। जो इस फर्क को समझता है, वह जान सकता है कि परमेश्वर की दृष्टि में सच्ची महानता क्या है।


धरती पर अधिकार बनाम धन

धरती पर बहुत से लोग अमीर हो सकते हैं या अधिकारशाली, या फिर दोनों। लेकिन अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आपके पास कितना धन है। एक अमीर व्यक्ति, किसी मंत्री, मेयर या राज्यपाल के आदेश को सिर्फ अपनी दौलत से बदल नहीं सकता। धरती पर अधिकार पद से आता है, न कि संपत्ति से।

इसी तरह, स्वर्ग के राज्य में भी महानता और आत्मिक धन दो अलग-अलग बातें हैं। एक व्यक्ति आत्मिक रूप से बहुत धनी हो सकता है, लेकिन परमेश्वर की दृष्टि में महान नहीं — और इसके विपरीत भी।


स्वर्ग के राज्य में आत्मिक धन

जैसे धरती का धन परिश्रम और बुद्धिमत्ता से प्राप्त होता है (नीतिवचन 10:4), वैसे ही स्वर्ग का धन विश्वास, सेवा और भक्ति से प्राप्त होता है।

यीशु ने कहा:

“अपनी संपत्ति बेचकर दान दो। अपने लिए ऐसे बटुए बनाओ जो पुराने न हों, ऐसा धन जमा करो जो स्वर्ग में कभी नष्ट न हो — जहाँ कोई चोर नहीं पहुँच सकता और कोई कीड़ा उसे नष्ट नहीं कर सकता।”
— लूका 12:33 (ERV-HI)

यह “स्वर्ग का धन” उस आत्मिक धन का प्रतीक है जो एक विश्वासयोग्य जीवन से संचित होता है — जैसे कि सुसमाचार सुनाना, ज़रूरतमंदों की सेवा करना, उदारता, और प्रेम से भरे कार्य।

पौलुस लिखता है:

“फिर वे कैसे पुकारें उस पर जिसे उन्होंने विश्वास नहीं किया? और कैसे विश्वास करें उस पर जिसे उन्होंने सुना नहीं? और कैसे सुनें जब कोई प्रचारक न हो?”
— रोमियों 10:14 (ERV-HI)

प्रत्येक आत्मिक कार्य हमारे लिए स्वर्ग में खज़ाना बनता है (मत्ती 6:19–21)। एक उदाहरण है उस विधवा का जिसने सब कुछ दे दिया:

“यीशु मंदिर के दानपात्र के सामने बैठ गए और लोगों को देख रहे थे कि वे उसमें पैसे कैसे डालते हैं। बहुत से अमीर लोगों ने बहुत कुछ डाला। फिर एक गरीब विधवा आई और उसमें दो छोटी तांबे की सिक्के डाले — जो बहुत कम थे। यीशु ने अपने चेलों को बुलाकर कहा, ‘मैं तुमसे सच कहता हूँ, इस गरीब विधवा ने उन सब लोगों से ज़्यादा डाला है जिन्होंने दानपात्र में कुछ डाला, क्योंकि उन्होंने अपनी बहुतायत में से दिया है, परंतु इसने अपनी गरीबी में से सब कुछ दे दिया — जो उसके पास था, अपनी पूरी जीविका।’”
— मरकुस 12:41–44 (ERV-HI)

इससे यह सिद्ध होता है कि आत्मिक धन किसी की मात्रा से नहीं, बल्कि दिल की स्थिति और परमेश्वर पर भरोसे से मापा जाता है:

“हर व्यक्ति जैसा मन में निश्चय करे वैसा ही दे, न तो खेदपूर्वक और न ज़बरदस्ती से, क्योंकि परमेश्वर आनंद से देने वाले से प्रेम करता है।”
— 2 कुरिन्थियों 9:7 (ERV-HI)


स्वर्ग के राज्य में सच्ची महानता

जब चेलों ने यीशु से पूछा, “स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?” — उन्होंने उत्तर में एक बालक को सामने लाकर कहा:

“मैं तुमसे सच कहता हूँ, यदि तुम मन न फेरो और बच्चों के समान न बनो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकोगे। इसलिए जो कोई अपने आप को इस बालक के समान नम्र बनाएगा वही स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा होगा।”
— मत्ती 18:3–4 (ERV-HI)

यह दिखाता है कि परमेश्वर की दृष्टि में महानता नम्रता और पूर्ण भरोसे में है — जैसे एक बच्चा अपने माता-पिता पर निर्भर करता है।

यीशु स्वयं नम्रता का सर्वोच्च उदाहरण हैं:

“उन्होंने अपने आप को दीन किया और मृत्यु — यहाँ तक कि क्रूस की मृत्यु तक — आज्ञाकारी बने। इस कारण परमेश्वर ने भी उन्हें अत्यन्त महान किया और उन्हें वह नाम दिया जो हर नाम से श्रेष्ठ है।”
— फिलिप्पियों 2:8–9 (ERV-HI)

परमेश्वर दीनों को ऊँचा उठाता है (याकूब 4:6; 1 पतरस 5:6)।


सेवा से महानता

यीशु ने सिखाया कि जो महान बनना चाहता है, वह दूसरों का सेवक बने:

“तुम में जो कोई बड़ा बनना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने; और जो कोई तुम में प्रधान बनना चाहता है, वह सब का दास बने। क्योंकि मनुष्य का पुत्र भी सेवा कराने नहीं, पर सेवा करने और बहुतों के लिए अपने प्राण देने आया।”
— मरकुस 10:43–45 (ERV-HI)

मसीही नेतृत्व वास्तव में सेवकाई नेतृत्व है।

और यीशु ने एक और चौंकाने वाला बयान किया:

“मैं तुमसे सच कहता हूँ, कि जो स्त्री से जन्मे हैं, उनमें यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले से बड़ा कोई नहीं हुआ, फिर भी जो स्वर्ग के राज्य में सबसे छोटा है वह उससे बड़ा है।”
— मत्ती 11:11 (ERV-HI)

इसका तात्पर्य यह है कि स्वर्ग के राज्य की महानता, विश्वास और विनम्रता से चिह्नित होती है — और यह संसार की मान्यताओं से बिल्कुल भिन्न है।


आगामी राज्य और पुरस्कार

जब प्रभु यीशु महिमा में लौटेंगे, वे राजा के रूप में राज्य करेंगे। जो लोग विजय पाएँगे और अंत तक उनके कार्यों में बने रहेंगे, उन्हें अधिकार मिलेगा:

“जो कोई विजय पाए और मेरे कामों को अंत तक बनाए रखे, मैं उसे राष्ट्रों पर अधिकार दूँगा। वह उन्हें लोहे की छड़ी से हाँकेगा।”
— प्रकाशितवाक्य 2:26–27 (ERV-HI)

यह वही अधिकार है जो यीशु को पिता ने दिया (भजन संहिता 2:8–9)। और जब यीशु लौटेंगे:

“उसकी आँखें अग्निशिखा के समान थीं, और उसके सिर पर बहुत से मुकुट थे…”
— प्रकाशितवाक्य 19:12 (ERV-HI)

जो प्रभु के प्रति विश्वासयोग्य रहते हैं, उन्हें इनाम दिया जाएगा:

“उसके स्वामी ने उससे कहा, ‘शाबाश, अच्छे और विश्वासयोग्य सेवक! तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा; मैं तुझे बहुत बातों का अधिकारी बनाऊँगा; अपने स्वामी के आनन्द में प्रवेश कर।’”
— मत्ती 25:21 (ERV-HI)

पौलुस लिखता है:

“अब मेरे लिए धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे उस दिन प्रभु, जो धर्मी न्यायी है, मुझे देगा; और न केवल मुझे, परंतु उन सब को भी जो उसके प्रकट होने को प्रेम करते हैं।”
— 2 तीमुथियुस 4:8 (ERV-HI)

और यह भी स्पष्ट है कि स्वर्ग में प्रतिफल विश्वास और कार्यों के अनुसार भिन्न होंगे:

“यदि कोई इस नींव पर सोना, चाँदी, कीमती पत्थर, लकड़ी, घास या फूस बनाए, तो हर एक का काम प्रकट होगा… यदि किसी का काम जो उसने बनाया है, टिक जाए, तो उसे इनाम मिलेगा।”
— 1 कुरिन्थियों 3:12–14 (ERV-HI)


निष्कर्ष: स्वर्ग में महान बनने की बुलाहट

परमेश्वर हमें केवल उद्धार के लिए नहीं, बल्कि महान बनने के लिए बुलाता है — नम्रता, सेवा, और आत्मिक भंडारण के माध्यम से।

“जिनसे मैं प्रेम करता हूँ, उन्हें मैं ताड़ना देता हूँ और सुधारता हूँ। इसलिए उत्साही बनो और मन फिराओ। देखो, मैं द्वार पर खड़ा होकर खटखटा रहा हूँ; यदि कोई मेरी आवाज़ सुनकर द्वार खोले, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ। जो विजय पाएगा, मैं उसे अपने साथ अपने सिंहासन पर बैठने दूँगा, जैसे मैं भी विजय पाकर अपने पिता के साथ उसके सिंहासन पर बैठ गया।”
— प्रकाशितवाक्य 3:19–21 (ERV-HI)


समाप्ति

हमें इस संसार की महिमा नहीं, बल्कि स्वर्ग की सच्ची महिमा की खोज करनी चाहिए:

  • स्वर्गीय धन — परमेश्वर की सेवा और भक्ति से।

  • महानता — नम्रता और समर्पण से।

  • प्रतिफल — विश्वासयोग्यता और आत्मिक स्थायित्व के अनुसार।

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परमेश्वर की शक्ति कहाँ प्रकट होती है?


परमेश्वर का वचन एक महान रहस्य को प्रकट करता है: परमेश्वर की शक्ति सबसे अधिक तब प्रकट होती है जब हम कमज़ोर होते हैं। शास्त्र कहता है:

“क्योंकि जब मैं निर्बल होता हूँ, तभी बलवंत होता हूँ।”
(2 कुरिन्थियों 12:10, Hindi O.V.)

इसका अर्थ है कि जब हमारी मानव शक्ति, तर्क और उपाय समाप्त हो जाते हैं, तभी परमेश्वर की अलौकिक शक्ति प्रकट होती है। हम आत्मनिर्भर होना छोड़ देते हैं और पूरी तरह से उस पर निर्भर हो जाते हैं।

यीशु ने स्वयं नम्रता और पूर्ण निर्भरता के इस दिव्य सिद्धांत को सिखाया:

“जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वही बड़ा किया जाएगा।”
(मत्ती 23:12, Hindi O.V.)

यह परमेश्वर के राज्य का एक बुनियादी सिद्धांत है: परमेश्वर घमंडियों का विरोध करता है, परन्तु नम्रों को अनुग्रह देता है (याकूब 4:6)। जब हम अपनी आत्मनिर्भरता छोड़ते हैं, तब हम परमेश्वर की दिव्य पूर्णता को अनुभव करते हैं।

परमेश्वर की शक्ति दुर्बलता में सिद्ध होती है

प्रेरित पौलुस ने इस सत्य का व्यक्तिगत अनुभव किया। जब वह गहन पीड़ा में था, तो उसने प्रभु से छुटकारे के लिए प्रार्थना की। और तब परमेश्वर ने उत्तर दिया:

“मेरा अनुग्रह तेरे लिये काफ़ी है, क्योंकि मेरी शक्ति निर्बलता में सिद्ध होती है।”
(2 कुरिन्थियों 12:9, Hindi O.V.)

इसके बाद पौलुस ने घोषणा की:

“इसलिये मैं बड़े आनन्द से अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूँगा, कि मसीह की शक्ति मुझ पर छाया करे।”

अर्थात, मसीही जीवन में दुर्बलता कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि वह अवस्था है जहाँ मसीह की शक्ति पूर्ण रूप से कार्य करती है। “सिद्ध” के लिए प्रयुक्त यूनानी शब्द teleitai पूर्णता और परिपक्वता का अर्थ देता है — परमेश्वर की शक्ति तब पूर्ण रूप से प्रकट होती है जब हम स्वयं पर भरोसा करना छोड़ देते हैं।

आत्मिक घमंड परमेश्वर की शक्ति को रोकता है

यीशु ने कहा:

“चंगों को वैद्य की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु जो बीमार हैं उन्हें होती है।”
(मत्ती 9:12, Hindi O.V.)

यह बात उसने उन फरीसियों और सदूकियों को कही जो स्वयं को धार्मिक समझते थे और उद्धार की आवश्यकता नहीं समझते थे। उनका आत्मिक घमंड उन्हें मसीह की आवश्यकता का एहसास नहीं होने देता था। इसके विपरीत, जो लोग अपने टूटेपन को स्वीकार करते हैं, वे चंगे और क्षमा प्राप्त करते हैं।

यदि हम स्वयं से भरे हुए हैं, तो परमेश्वर हमें नहीं भर सकता। परमेश्वर की शक्ति केवल उन खाली पात्रों में बहती है जो अपनी आत्मिक दरिद्रता को पहचानते हैं।

“धन्य हैं वे जो मन में दरिद्र हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।”
(मत्ती 5:3, Hindi O.V.)

निर्भरता ही विश्वास की सही स्थिति है

यीशु ने अपने अनुयायियों की तुलना भेड़ों से की, न कि बकरियों से:

“मेरी भेड़ें मेरी आवाज़ सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ और वे मेरे पीछे-पीछे चलती हैं।”
(यूहन्ना 10:27, Hindi O.V.)

भेड़ें अपने चरवाहे पर पूरी तरह निर्भर होती हैं। वे अपनी मर्जी से नहीं भटकतीं। ठीक उसी प्रकार परमेश्वर चाहता है कि हम जीवन की दिशा, सुरक्षा, प्रावधान और मार्गदर्शन के लिए पूरी तरह उसी पर निर्भर रहें।

पौलुस कहता है कि हम “परमेश्वर की सन्तान” हैं (रोमियों 8:16), और यीशु ने सिखाया कि परमेश्वर का राज्य उन्हीं का है जो छोटे बच्चों की तरह भरोसा और नम्रता रखते हैं:

“जब तक तुम न फिरो और छोटे बच्चों की नाईं न बनो, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते।”
(मत्ती 18:3, Hindi O.V.)

जिस प्रकार एक छोटा बच्चा हर बात के लिए अपने माता-पिता पर निर्भर करता है, उसी प्रकार हमें भी परमेश्वर पर हर बात के लिए निर्भर रहना चाहिए।

आप जितना परमेश्वर को देंगे, उतना ही पाएँगे

याकूब 4:8 में लिखा है:

“परमेश्वर के निकट आओ, और वह तुम्हारे निकट आएगा।”
(याकूब 4:8, Hindi O.V.)

इसका तात्पर्य है कि परमेश्वर स्वयं को उसी मात्रा में प्रकट करता है जितनी भूख और समर्पण हम उसमें दिखाते हैं। यदि हम केवल रविवार को उसे खोजते हैं, तो हम केवल रविवार को ही उसे अनुभव करेंगे। लेकिन यदि हम प्रतिदिन उसकी खोज करते हैं, तो प्रतिदिन उसका अनुभव करेंगे।

यीशु ने कहा:

“जिस माप से तुम मापते हो, उसी माप से तुम्हें भी मापा जाएगा।”
(लूका 6:38, Hindi O.V.)

यह उदारता और आत्मिक भूख दोनों के लिए एक सिद्धांत है। यदि आप परमेश्वर को अपने दिल का केवल 20% देते हैं, तो आप उसे उसी 20% में कार्य करते हुए देखेंगे। लेकिन यदि आप स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दें, जैसे यीशु ने किया (यूहन्ना 5:30), तो वह स्वयं को पूर्ण रूप से प्रकट करेगा।

गवाही: जब हमने पूरी तरह भरोसा किया

एक समय हम एक किराए के कमरे में रहते थे। हर महीने के अंत में बिजली का बिल भरना होता था। लेकिन एक बार हमारे पास कुछ भी नहीं था — एक पैसा भी नहीं। हमने निर्णय लिया: हम उधार नहीं लेंगे, केवल परमेश्वर पर भरोसा करेंगे।

जब बिल की तारीख आई, तो बिजली वाले नहीं आए — जबकि वे हर दूसरे किराएदार के पास गए। कई दिन बीते… वे फिर भी नहीं आए। हमने बिजली का उपयोग जारी रखा, प्रभु पर विश्वास करते हुए।

फिर हमारा गैस भी खत्म हो गया — एक और समस्या। लेकिन 25 तारीख को मैंने अपने मोबाइल वॉलेट को देखा तो उसमें TSh. 48,000 जमा थे — बिना किसी संदेश, भेजने वाले या सूचना के। यह चमत्कार था।

हमने पैसे निकाले, और जैसे ही घर लौटे, बिजली वाले आ गए। हमने तुरंत उन्हें भुगतान किया। बचे हुए पैसे से हमने गैस और ज़रूरत की चीज़ें खरीदीं।

उस दिन भजन संहिता 46:1 सजीव हो गई:

“परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज मिलनेवाला सहायक है।”
(भजन संहिता 46:1, Hindi O.V.)

अगर हम उधार पर भरोसा करते, तो यह चमत्कार न देखते। कई बार परमेश्वर हमें सभी विकल्पों से खाली कर देता है, ताकि वह हमारा एकमात्र विकल्प बन सके

हमेशा प्राकृतिक उपायों पर न झुकें

कई लोग परमेश्वर की शक्ति को कभी नहीं देखते, क्योंकि वे बहुत जल्दी इंसानों की सहायता लेने लगते हैं। डॉक्टर के पास जाना गलत नहीं है — यह पाप नहीं है। लेकिन यदि हम हर बार मानव सहायता पर ही निर्भर रहें, तो हम दिव्य सहायता को कैसे अनुभव करेंगे?

एक समय ऐसा आया जब मैंने बीमारी के पहले संकेत पर दवा लेना बंद कर दिया। मैंने कहा, “मैं परमेश्वर को अपने चंगाईकर्ता के रूप में जानना चाहता हूँ।” मैंने न दवा ली, न अस्पताल गया — केवल उस पर भरोसा किया।

अब वर्षों बीत चुके हैं। हर बार जब भी शरीर में कमजोरी महसूस होती है, मैं घोषणा करता हूँ:

“मैं यहोवा तेरा चंगाई करनेवाला हूँ।”
(निर्गमन 15:26, Hindi O.V.)

और थोड़ी ही देर में मेरी शक्ति लौट आती है। यही है उसकी शक्ति को प्रतिदिन देखना।

परमेश्वर की शक्ति हमारी चरम सीमा में प्रकट होती है

इस्राएली लोगों ने लाल समुद्र को तभी फटते देखा जब वे पूरी तरह फँस चुके थे। उन्होंने मन्ना तभी खाया जब वे जंगल से गुज़रे। चट्टान से पानी तभी निकला जब वे प्यासे थे।

“संकट के दिन मुझसे पुकार; मैं तुझे छुड़ाऊँगा और तू मेरी महिमा करेगा।”
(भजन संहिता 50:15, Hindi O.V.)

जब हम अपने सभी प्रयास छोड़ कर पूरी तरह परमेश्वर पर निर्भर हो जाते हैं, तब उसकी अलौकिक शक्ति प्रकट होती है

पवित्रशास्त्र में शक्ति का क्रम

  • शद्रक, मेशक और अबेदनगो ने मृत्यु के भय में भी परमेश्वर पर भरोसा किया, और वह आग में उनके साथ दिखाई दिया।
    (दानिय्येल 3:24–25)
  • दानिय्येल को सिंहों की मांद में डाला गया, परंतु परमेश्वर ने सिंहों के मुँह बंद कर दिए।
    (दानिय्येल 6:22)
  • पौलुस और सीलास कैद में थे, पर जब उन्होंने स्तुति की, तो पृथ्वी काँपी और कैद के द्वार खुल गए।
    (प्रेरितों के काम 16:25–26)

इन सबने कठिन परिस्थितियों में पूरी तरह परमेश्वर पर भरोसा किया, और इसलिए उन्होंने उसकी महिमा देखी।

अंतिम बात

“तू अपनी समझ का सहारा न लेना, परन्तु सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना। उसी को अपने सब कामों में स्मरण कर, तब वह तेरे मार्ग सीधे करेगा।”
(नीतिवचन 3:5–6, Hindi O.V.)

परमेश्वर की शक्ति को अनुभव करने का एक ही तरीका है: समर्पण, भरोसा, और नम्रता


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व्यवस्था के काम और विश्वास के काम में क्या अंतर है?

आइए हम परमेश्वर के वचन की जानकारी में साथ-साथ बढ़ें।

जब हम बाइबल पढ़ते हैं, विशेषकर रोमियों 4 और याकूब 2 में, तो हमें ऐसा प्रतीत होता है कि विरोधाभास है। पौलुस कहता है कि मनुष्य विश्वास से धर्मी ठहरता है, न कि कामों से। लेकिन याकूब कहता है कि केवल विश्वास से नहीं, बल्कि कामों से भी मनुष्य धर्मी ठहरता है।

तो क्या बाइबल स्वयं का विरोध करती है? या हमारी समझ को सुधार की आवश्यकता है?
आइए हम दोनों अंशों को ध्यान से अध्ययन करें।

1. पौलुस (रोमियों 4): धर्मी ठहरना विश्वास से है, व्यवस्था के कामों से नहीं
रोमियों 4:1–6

“तो हम क्या कहें कि हमारे पूर्वज अब्राहम ने शरीर के अनुसार क्या पाया?
क्योंकि यदि अब्राहम कामों से धर्मी ठहराया गया, तो उसके पास घमंड करने का अवसर है—परन्तु परमेश्वर के सामने नहीं।
पवित्रशास्त्र क्या कहता है? ‘अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया और यह उसके लिये धर्म गिना गया।’
अब जो काम करता है, उसका मजदूरी उपहार नहीं, परन्तु कर्ज समझा जाता है।
परन्तु जो काम नहीं करता, परन्तु अधर्मी को धर्मी ठहराने वाले पर विश्वास करता है, उसका विश्वास धर्म गिना जाता है।
ठीक वैसे ही दाऊद भी उस मनुष्य के धन्य होने के विषय में कहता है, जिसे परमेश्वर बिना कामों के धर्म गिनता है।”

यहाँ पौलुस स्पष्ट रूप से “व्यवस्था के कामों” की ओर संकेत करता है—अर्थात् आज्ञाओं, नियमों, रीति-रिवाजों या नैतिक प्रयासों का पालन करके परमेश्वर के सामने धर्मी ठहरना। पौलुस कहता है कि कोई भी अपने भले कामों या व्यवस्था का पालन करके परमेश्वर के सामने धर्मी नहीं ठहर सकता, क्योंकि:

रोमियों 3:23

“सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।”

इसी प्रकार भजन संहिता भी समस्त मानवता के पाप को बताती है:

भजन संहिता 14:2–3

“यहोवा स्वर्ग से मनुष्यों की ओर देखता है,
कि कोई समझदार है क्या? कोई परमेश्वर का खोजी है क्या?
सब के सब भटक गए हैं; सब भ्रष्ट हो गए हैं;
कोई भलाई करनेवाला नहीं, एक भी नहीं।”

पौलुस का निष्कर्ष है कि परमेश्वर के सामने धर्म एक वरदान है, जो यीशु मसीह पर विश्वास करने से मिलता है, न कि अच्छे काम करने या धार्मिक होने से।

इफिसियों 2:8–9

“क्योंकि अनुग्रह ही से तुम विश्वास के द्वारा उद्धार पाए हो; और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है।
न कामों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।”

इसलिए यदि कोई कहे, “मैं न तो चोर हूँ, न व्यभिचारी, न मद्यपान करनेवाला हूँ,” तो भी यह उद्धार पाने के लिए पर्याप्त नहीं। केवल एक ही व्यक्ति ने व्यवस्था को सिद्ध रीति से पूरा किया—यीशु मसीह। आदम से लेकर अन्तिम मनुष्य तक सब असफल हुए हैं।

2. याकूब (याकूब 2): बिना कामों के विश्वास मरा हुआ है
अब विचार करें याकूब 2:21–24:

“क्या हमारे पिता अब्राहम कामों से धर्मी न ठहरा जब उसने अपने पुत्र इसहाक को वेदी पर चढ़ाया?
तू देखता है कि उसका विश्वास उसके कामों के साथ-साथ सक्रिय था और उसके कामों से उसका विश्वास सिद्ध हुआ।
और पवित्रशास्त्र पूरा हुआ, जो कहता है, ‘अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया और यह उसके लिये धर्म गिना गया,’ और वह परमेश्वर का मित्र कहलाया।
तू देखता है कि मनुष्य केवल विश्वास से नहीं, बल्कि कामों से भी धर्मी ठहरता है।”

पहली दृष्टि में, याकूब पौलुस का विरोध करता हुआ प्रतीत होता है। परन्तु संदर्भ महत्वपूर्ण है।

पौलुस व्यवस्था के कामों (धार्मिक रीति से धर्म कमाने) की बात करता है।

याकूब उन कामों की बात करता है जो सच्चे विश्वास से उत्पन्न होते हैं।

ये दोनों एक समान नहीं हैं।

याकूब 2:26

“जैसे आत्मा के बिना शरीर मरा हुआ है, वैसे ही विश्वास भी बिना कामों के मरा हुआ है।”

सच्चा विश्वास हमेशा कामों द्वारा प्रकट होता है।

आज के समय में विश्वास के काम का उदाहरण
मान लीजिए किसी को मधुमेह है और डॉक्टर उसे कहता है कि चीनी या स्टार्च वाला भोजन न खाए। लेकिन वह व्यक्ति परमेश्वर के वचन पर विश्वास करता है:

मत्ती 8:17

“उसने हमारी दुर्बलताएँ ले लीं और हमारी बीमारियाँ उठा लीं।”

वह विश्वास करता है कि यीशु के बलिदान से वह चंगा हो चुका है, और वह एक स्वस्थ व्यक्ति की तरह जीना शुरू करता है। यही विश्वास से उत्पन्न काम है—याकूब की शिक्षा का वास्तविक उदाहरण।

दो प्रकार के काम
काम का प्रकार किसने बताया क्या यह धर्म का आधार है? परिणाम
व्यवस्था के काम पौलुस (रोमियों) नहीं दंड
विश्वास से उत्पन्न काम याकूब (याकूब) हाँ (विश्वास का प्रमाण) धर्मी ठहरना

अंतिम निष्कर्ष
हम परमेश्वर के सामने केवल विश्वास से धर्मी ठहरते हैं (रोमियों 4)।
परन्तु सच्चा विश्वास अपने आप को कामों के द्वारा प्रकट करता है (याकूब 2)।

गलातियों 5:6

“मसीह यीशु में न खतना कोई काम आता है, न खतना न होना, परन्तु प्रेम से प्रभावशाली विश्वास।”

इब्रानियों 10:38

“मेरा धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा; और यदि वह पीछे हटेगा, तो मेरा मन उसमें प्रसन्न न होगा।”

क्यों केवल अच्छे काम पर्याप्त नहीं हैं?
भले ही कोई दयालु, दानी और पाप से दूर हो, यह उद्धार के लिए काफी नहीं। अन्य धर्मों के लोग भी अच्छे काम करते हैं, परन्तु यीशु मसीह पर विश्वास के बिना उनका उद्धार नहीं होता।

यूहन्ना 14:6

“यीशु ने कहा, ‘मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।’”

अंतिम वचन: विश्वास ही कुंजी है
हम विश्वास से क्षमा पाते हैं।

विश्वास से चंगे होते हैं।

विश्वास से हमारी प्रार्थनाएँ पूरी होती हैं।

विश्वास से हमें आत्मिक आशीषें मिलती हैं।

इसीलिए शैतान हमारे विश्वास पर आक्रमण करता है, ताकि हम यह मानें कि नियम निभाकर ही हम परमेश्वर के प्रिय हो सकते हैं। परन्तु उद्धार केवल मसीह के कार्य पर विश्वास करने से मिलता है।

हम अपने अच्छे चाल-चलन से धर्मी नहीं ठहरते, बल्कि यीशु मसीह पर विश्वास से धर्मी ठहरते हैं। और यह सच्चा विश्वास ही ऐसे काम उत्पन्न करता है जिन्हें याकूब “विश्वास के काम” कहता है। ये उद्धार का फल हैं, कारण नहीं।

प्रभु आपको आशीषित करे जब आप विश्वास से चलें और दृष्टि से नहीं।

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