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क्या तुम्हारे बाल उग रहे हैं या कट चुके हैं?

बाइबल में लिखा गया हर एक वचन, विशेषकर पुराने नियम में, नये नियम में आत्मिक रूप से घटने वाली बातों की एक छाया (छवि) है। जैसे हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर ने इस्राएलियों को मिस्र की गुलामी से बुलाकर कनान की ओर ले गया — वैसे ही आज वह अपने बच्चों को पाप की दासता (मिस्र) से बाहर बुला रहा है। फिर वह उन्हें लाल समुद्र (जो 1 कुरिंथियों 10 में बपतिस्मा की छवि है) से पार कराता है और फिर जंगल की यात्रा शुरू होती है — एक ऐसा समय और स्थान जहाँ हर मसीही को परमेश्वर के भय और उस पर निर्भर रहना सीखना होता है।

आख़िरी मंज़िल क्या है?
कनान देश!
जो एक आत्मिक प्रतीक है — इस नए जीवन का, जो यहीं धरती पर शुरू होता है और अंत में नए स्वर्ग और नई पृथ्वी में पूरा होता है।


✦ साम्सोन की कहानी – एक भविष्यद्वाणी की छाया

साम्सोन की कहानी भी इसी आत्मिक यात्रा का एक चित्र है। बाइबल बताती है कि साम्सोन को माँ के गर्भ में ही परमेश्वर ने चुन लिया और अभिषेक किया — जैसे पेंटेकोस्ट के दिन आरंभिक कलीसिया शुद्ध, पवित्र और निर्दोष थी।

परमेश्वर ने साम्सोन से कहा कि वह अपने सिर के बालों को न काटे, बल्कि उन्हें सात गूंथों में बांधे रखे। यह सीधा संबंध है उस सात कलीसियाओं से जिनका उल्लेख प्रकाशितवाक्य 2 और 3 में है। यही वे सात युग हैं जिन्हें “कलीसिया के सात युग” कहा जाता है — 2000 वर्षों में फैले हुए। हम आज Laodicea नामक सातवें और अंतिम युग में हैं।

जैसे साम्सोन की शक्ति उसके बालों में थी, वैसे ही कलीसिया की शक्ति परमेश्वर के वचन में रही। लेकिन साम्सोन ने जब परमेश्वर की आज्ञा को ठुकराकर अपने मन की लालसाओं का पीछा किया — पराई स्त्रियों के पास गया — वहीं से उसका पतन शुरू हुआ।

नीतिवचन 31:3
“अपनी शक्ति स्त्रियों को न दे…”


✦ जब साम्सोन ने बाल कटवाए…

न्यायियों 16:17-20 हमें बताता है कि जब साम्सोन ने अपनी ताकत की बात दलिला से साझा की, तो उसने उसके सिर के सात गुंथों को कटवा दिया। और उसी क्षण उसकी शक्ति चली गई। शत्रुओं ने उसे बंदी बना लिया, उसकी आँखें फोड़ दीं और वह जेल में गेहूं पीसने वाला गुलाम बन गया।

इसी तरह, जब प्रेरितों का समय समाप्त हुआ, तो कलीसिया में झूठे शिक्षक घुस आए, जैसा कि पौलुस ने चेतावनी दी थी:

प्रेरितों के काम 20:29-30
“मेरे चले जाने के बाद भयानक भेड़िए तुम्हारे बीच आएंगे… और तुम्हीं में से कुछ ऐसे उठेंगे जो भ्रांतियाँ फैलाएँगे।”


✦ दलिला = वेश्या कलीसिया

नए नियम में दलिला एक प्रतीक बन जाती है — उस कलीसिया वेश्या की, जो यथार्थ में कैथोलिक कलीसिया थी। यह वही समय था जब सन 325 ईस्वी में नाइसिया की परिषद के माध्यम से रोमी मूर्तिपूजा को मसीही विश्वास में मिला दिया गया।

उस समय:

  • मूर्तियों की पूजा शुरू हुई
  • मृत संतों से प्रार्थना की जाने लगी
  • “तौहीद” के बजाय “त्रिदेव” की शिक्षा आई
  • बाइबल पढ़ने पर प्रतिबंध लगा
  • परमेश्वर की आत्मा से नहीं, बल्कि इंसानी पदवी से कलीसिया चलाई जाने लगी

और तब कलीसिया की आत्मिक शक्ति समाप्त हो गई। यह था “अंधकार का युग”, जो 1000 वर्षों से अधिक चला।


✦ लेकिन फिर से बाल उगने लगे…

परमेश्वर का वचन कहता है:

न्यायियों 16:22
“परन्तु उसके सिर के बाल फिर से उगने लगे…”

साम्सोन की तरह कलीसिया के भी बाल फिर से उगने लगे — अर्थात, वह फिर से परमेश्वर के वचन की ओर लौटी

  • 16वीं सदी में मार्टिन लूथर खड़े हुए: “मनुष्य विश्वास से धर्मी ठहरता है — न कि किसी संस्था या पद से।”
  • फिर जॉन वेस्ले आए और उन्होंने पवित्रता और यीशु के लहू से शुद्ध होने की शिक्षा दी।
  • 20वीं सदी में विलियम सेयमोर और अन्य लोग पवित्र आत्मा के बपतिस्मे और आत्मिक वरदानों के साथ आए।

यह वही समय था जब आत्मिक पुनर्स्थापन का युग शुरू हुआ — ठीक जैसे साम्सोन ने अंत में अपनी सारी शक्ति से मन्दिर को ढहा दिया और जितने लोगों को उसने मारा, वे पहले से कहीं अधिक थे।

न्यायियों 16:30
“मरते समय उसने जितनों को मारा, वे उसके जीवन में मारे गए लोगों से अधिक थे।”


✦ अंतिम जागृति और दुल्हन की तैयारी

अब हम उस समय में हैं जब मसीह की दुल्हन तैयार हो रही है।
बाल (अर्थात वचन में गहराई) पूरी तरह बढ़ चुके हैं
बस एक आखिरी कार्य बचा है — प्रकाशितवाक्य 10:7 के अनुसार सात गरजनाओं का रहस्य जो दुल्हन को पूर्ण विश्वास देगा (लूका 18:8) ताकि वह उत्साह और सामर्थ्य से उठाकर स्वर्ग में पहुँचाई जाए।

यह अंतिम जागृति, पेंटेकोस्ट से भी अधिक शक्तिशाली होगी।


✦ क्या तुम्हारे बाल बढ़ रहे हैं?

अब तुम ही सोचो —
क्या तुम उन लोगों में हो जिनके बाल उग रहे हैं — जो वचन में लौट रहे हैं?
या फिर अभी भी किसी परंपरा, मत या संप्रदाय की जंजीरों में बंधे हो?

याद रखो: मसीही की शक्ति वचन से आती है, न कि चर्च की रीतियों से।
अगर तुम्हारा चर्च मूर्तिपूजा को सही मानता है — तो तुम किसके साथ खड़े हो? चर्च के या परमेश्वर के?

प्रेरितों के काम 2:38
“पतरस ने उनसे कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले… और तुम पवित्र आत्मा का वरदान पाओगे।”

बपतिस्मा का अर्थ है — पूरे पानी में डुबकी
अगर तुम्हें अब तक केवल छिड़काव मिला है — तो क्या यह वही है जो बाइबल कहती है?


✦ निष्कर्ष:

यह अंतिम समय है।
यह वह समय है जब परमेश्वर चाहता है कि उसके लोग वापस वचन की ओर लौटें
धर्म या संप्रदाय नहीं बचा सकते।
केवल वही लोग — जो नए जन्म से जन्मे हैं, बपतिस्मा पाए हैं, और पवित्र आत्मा से मुहरबंद हैं — वे ही उथाह पाएँगे।

इब्रानियों 12:14
“पवित्रता के बिना कोई भी प्रभु को नहीं देख पाएगा।”


क्या आप तैयार हैं?
क्या आपने नया जन्म पाया है?
क्या आपके ‘बाल’ उग रहे हैं?


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परमेश्वर आपको आशीष दे।


🔔 “जिसके पास सुनने के लिए कान हैं, वह सुने कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है…”
— प्रकाशितवाक्य 2:7


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क्या आप मसीह के प्रेम से बाँध लिए गए हैं?

 


 

अक्सर लोग सोच लेते हैं कि जब कोई नया जन्म (पुनर्जन्म) लेता है, तो वह परमेश्वर से ऐसा प्रेम करने लगता है कि जीवन में जब भी कोई परेशानी, संकट, रोग, या विपत्ति आए, वह परमेश्वर को कभी नहीं छोड़ेगा, न ही मसीह का इन्कार करेगा। वह मसीह से इतना प्रेम करता है कि कोई भी बात उसे प्रभु से अलग नहीं कर सकती—जैसा कि हम पवित्र शास्त्र में पढ़ते हैं:

रोमियों 8:31–35
“यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो कौन हमारे विरोध में हो सकता है?
जिसने अपने निज पुत्र को भी नहीं छोड़ा, वरन् उसे हम सब के लिये दे दिया; वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्यों न देगा?
परमेश्वर के चुने हुओं पर कौन दोष लगाएगा? परमेश्वर ही तो है जो उन्हें धर्मी ठहराता है।
कौन दण्ड देगा? मसीह यीशु ही तो मर गया, वरन् जी भी उठा, और परमेश्वर की दाहिनी ओर है, और हमारे लिये बिनती भी करता है।
कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या भूख, या नग्नता, या संकट, या तलवार?”

लेकिन क्या इस वचन का अर्थ यही है कि हम अपने मसीह के प्रति प्रेम के कारण इन सब बातों पर जय पाते हैं?

उत्तर है—नहीं!
मनुष्य में अपने बल से ऐसा प्रेम करने की सामर्थ्य नहीं है। हमें यह समझना चाहिए कि वचन कहता है:
“कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग करेगा?”
यह नहीं कहा गया कि “हमारे मसीह से प्रेम से कौन हमें अलग करेगा”।

यानी यह प्रेम हमारा नहीं है, बल्कि मसीह का प्रेम हमारे लिए है।
हमारे मसीह से प्रेम और मसीह का हमसे प्रेम—इन दोनों में बड़ा फर्क है।

जब कोई व्यक्ति सचमुच नया जन्म पाता है (जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे), उसी क्षण मसीह का प्रेम उसके भीतर आ बसता है। यह हमारा प्रेम मसीह के लिए नहीं होता, बल्कि मसीह का प्रेम हमारे लिए होता है। और तब से लेकर जीवन के अंत तक, यीशु स्वयं इस प्रेम को हमारे अंदर बनाए रखने की जिम्मेदारी लेता है।

इसलिए जब विपत्ति आती है…

जब संकट, दुख, भूख, तलवार या कोई भी अन्य मुसीबत आती है—तो यह हम नहीं होते जो खुद को मसीह से अलग होने से रोकते हैं।
बल्कि यह मसीह होता है जो हमें अपने प्रेम से थामे रखता है

जो लोग अपने बल, अपनी समझ और इच्छाशक्ति से मसीह से जुड़े रहने का प्रयास करते हैं, वे अधिक समय तक टिक नहीं पाते। ऐसे लोग वास्तव में अभी नए जन्म से नहीं गुज़रे होते

पौलुस आगे कहता है:

रोमियों 8:38–39
“क्योंकि मैं निश्चय जानता हूँ कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ,
न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृजित वस्तु हमें उस प्रेम से अलग कर सकेगी, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है।”

यह नए जन्म पाए हुए व्यक्ति के लिए एक बहुत बड़ा वरदान है—वह यीशु मसीह के प्रेम द्वारा बाँध लिया जाता है
तभी जब संकट आता है, जब शैतान दुखों से परीक्षा लेता है, तो वह मसीही व्यक्ति खुद सांत्वना पाने के बजाय दूसरों को सांत्वना देता है!

वह गंभीर बीमारी में होते हुए भी परमेश्वर से नाराज़ नहीं होता, बल्कि दूसरों को आशा और शांति देता है। जैसे अय्यूब, जो दुःख और अभाव में भी परमेश्वर की स्तुति करता रहा।

एक और उदाहरण…

कभी आप देखेंगे कोई व्यक्ति जो सचमुच नया जन्म पाया हुआ है, वह बहुत अमीर है—लेकिन वह अपने धन पर घमंड नहीं करता।
लोग चकित होते हैं: “हमारे पास इतना पैसा होता तो हम सारी दुनिया में नाम कमाते!”
परंतु अय्यूब ने कहा:

अय्यूब 31:25,28
“यदि मैं अपने बहुत धन के कारण मगन हुआ होता… तो यह भी न्यायाधीशों के योग्य दण्डनीय अपराध होता; क्योंकि तब मैं ऊपरवाले परमेश्वर का इन्कार करता।”

यानी, ऐसे लोग जिनका हृदय मसीह के प्रेम से भर चुका है, वे किसी भी स्थिति में प्रभु को नहीं छोड़ते—न भूख में, न संपन्नता में, न बीमारी में, न संकट में। क्योंकि मसीह उनके अंदर कार्य कर रहा होता है
कोई भी परीक्षा पहले मसीह तक पहुँचती है, और फिर वह हमें उसके प्रेम के साथ रास्ता दिखाता है।

लोग आश्चर्य करते हैं…

लोग पूछते हैं:

  • “तुम व्यभिचारी संसार में रहते हुए भी कैसे पवित्र हो?”

  • “पैसा नहीं है, फिर भी परमेश्वर की सेवा कर रहे हो?”

  • “बीमार होकर भी दूसरों के लिए प्रार्थना करते हो और मृत्यु से नहीं डरते?”

  • “अमीर हो, फिर भी भोग-विलास से दूर क्यों रहते हो?”

उन्हें नहीं मालूम कि यह हमारा मसीह से प्रेम नहीं, बल्कि मसीह का हमारे लिए प्रेम है।
जैसा कि लिखा है:

भजन संहिता 125:1–2
“जो यहोवा पर भरोसा रखते हैं, वे सिय्योन पर्वत के समान अडिग हैं, जो सदा बना रहेगा।
जैसे यरूशलेम को पर्वत घेरे हुए हैं, वैसे ही यहोवा अपने लोगों को अब और सदा तक घेरे रहेगा।”

लेकिन यह प्रेम सभी को नहीं मिलता…

यह प्रेम सभी दुनिया के लोगों के लिए नहीं आता।
केवल उन्हीं को प्राप्त होता है जो नया जन्म पाते हैं, यानी:

  1. अपने पापों से सच्चे मन से मन फिराते हैं (तौबा का अर्थ है पूरी तरह बदल जाना, न कि सिर्फ “पाप क्षमा की प्रार्थना”)

  2. फिर जल में पूर्ण रूप से बपतिस्मा लेते हैंयीशु मसीह के नाम से, जैसे लिखा है:

    प्रेरितों के काम 2:38
    “तब पतरस ने उनसे कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक, यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा लो, जिससे तुम्हारे पाप क्षमा किए जाएँ; और तब तुम पवित्र आत्मा का वरदान पाओगे।”

  3. इसके बाद तीसरी अवस्था—पवित्र आत्मा का बपतिस्मा, जो मसीह का प्रेम हमारे भीतर उड़ेल देता है।

अगर कोई व्यक्ति इन तीनों में से किसी एक को छोड़ देता है, तो वह अब तक नया जन्म नहीं पाया है।

यूहन्ना 3:5
“यीशु ने उत्तर दिया, मैं तुमसे सच कहता हूँ, जब तक कोई जल और आत्मा से न जन्मे, वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।”

इसलिए कोई कहे “मैंने तो केवल विश्वास कर लिया, अब बपतिस्मा जरूरी नहीं”—तो वह स्वयं को धोखा दे रहा है।
यीशु ने साफ कहा:
“जो विश्वास करेगा और बपतिस्मा लेगा, वही उद्धार पाएगा” (मरकुस 16:16)

निष्कर्ष:

जब कोई व्यक्ति सच में नया जन्म लेता है—तब वह एक ऐसे स्तर पर पहुँचता है जहाँ:

  • कोई भी संकट, बीमारी, भूख, तलवार, मृत्यु, दौलत, दरिद्रता, स्वर्गदूत या दुष्ट आत्मा,
    उसे मसीह के प्रेम से अलग नहीं कर सकते।
    क्योंकि वह अब अपने बल पर नहीं, बल्कि मसीह के प्रेम से चलता है।

इसलिए वह न केवल जीतता है,
बल्कि जैसा लिखा है:
“वह उससे भी बढ़कर जयवंत होता है, जिसने उससे प्रेम किया” (रोमियों 8:37)

आप धन्य हों।


 

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🌅 संध्या समय में उजाला होगा


जकर्याह 14:6–7:

“उस दिन ऐसा होगा कि न तो उजाला होगा और न ही अंधकार होगा;
यह एक ऐसा दिन होगा जो केवल यहोवा को ही ज्ञात है — न तो दिन होगा और न ही रात; परंतु संध्या समय में उजाला होगा।”


कल्पना कीजिए एक दिन… जब सब कुछ सामान्य है। समय शाम का सात बज रहा है — वही समय जब हर दिन सूर्य अस्त होता है। लेकिन आज कुछ अलग है।
सूर्य अस्त नहीं होता, बल्कि उजाला वैसा ही बना रहता है। आठ बजते हैं — फिर भी वैसी ही रोशनी, जैसे सुबह के ग्यारह बजे हो।
स्वाभाविक है कि आप चकित होंगे — “आज क्या हो रहा है?”
रात का समय हो चुका है, फिर भी अंधकार नहीं आया। कोई भी व्यक्ति जो ऐसा दृश्य देखेगा, वह चौंक जाएगा।

ठीक वैसे ही, आत्मिक रूप में, प्रभु ने भी भविष्यवाणी की थी कि एक दिन ऐसा आएगा
“संध्या समय में उजाला होगा।”

लेकिन यह जानना जरूरी है कि यह “संध्या” कौन-सा समय है?
क्या वह समय अभी आ चुका है या भविष्य में आएगा?
और यह उजाला क्या है?
अंधकार का क्या अर्थ है?


जैसे पृथ्वी का उजाला सूर्य से आता है,
वैसे ही आत्मिक संसार में प्रभु यीशु ही हमारा सूर्य है।

यूहन्ना 8:12:

“मैं जगत की ज्योति हूं; जो मेरे पीछे चलता है, वह अंधकार में न चलेगा, परंतु जीवन की ज्योति पाएगा।”

यीशु का प्रकाश भी तीन आत्मिक कालों में प्रकाशित हुआ:

  1. सुबह — जब प्रेरितों द्वारा पहली कलीसिया की शुरुआत हुई,
  2. दोपहर — जब अगली पाँच कलीसियाओं के युगों में सुसमाचार फैला,
  3. शाम — यानी अंतिम युग की कलीसिया — लाओदिकिया, जो अब वर्तमान में है।
    (देखें — प्रकाशितवाक्य 2 और 3)

लाओदिकिया की यह कलीसिया 20वीं सदी की शुरुआत (1906) में स्थापित हुई।
आज हम उसी “संध्या के उजाले” में जी रहे हैं।
उस समय के विश्वासी स्वयं को “संध्या के पुत्र” कहते थे, क्योंकि वे जानते थे कि वे मसीह के अंतिम प्रकाशकाल में हैं।


बीसवीं सदी के मध्य (1940–1980) के बीच बहुत से मसीही विश्वासियों ने विश्वास किया कि मसीह का दूसरा आगमन उनके जीवनकाल में ही होगा।

क्यों? क्योंकि:

  • दुनिया भर में भूकंप बढ़ गए।
  • युद्ध और युद्ध की अफवाहें — जैसे दोनों विश्व युद्ध।
  • नई और घातक बीमारियाँ — कैंसर, एड्स, मधुमेह, मलेरिया आदि।
  • और सबसे बढ़कर — इस्राएल का पुनः एक राष्ट्र बन जाना (1948)

लूका 21:28:

“जब ये सब बातें होने लगें, तब सीधा खड़े हो जाओ, और अपने सिर उठाओ, क्योंकि तुम्हारा छुटकारा निकट है।”


प्रभु ने कहा था:

यहेजकेल 36:24:

“मैं तुम्हें जातियों में से निकाल लाऊंगा और तुम्हें तुम्हारे देश में वापस ले आऊंगा।”

यह उस अंजीर के पेड़ का अंकुर निकलना है, जिसकी तुलना प्रभु यीशु ने इस्राएल से की थी।

लूका 21:29–32:

“अंजीर के पेड़ और सब वृक्षों को देखो; जब वे अंकुरित होते हैं, तो तुम जान जाते हो कि गर्मी निकट है…
इसी प्रकार, जब तुम ये सब बातें होते हुए देखो, तो जान लो कि परमेश्वर का राज्य निकट है।
मैं तुमसे सच कहता हूं, यह पीढ़ी समाप्त न होगी, जब तक कि ये सब बातें पूरी न हो जाएं।”


इसीलिए उस समय के मसीही विश्वासियों को पूरा विश्वास था कि वर्ष 2000 आने से पहले प्रभु यीशु लौट आएंगे। और उन्होंने कुछ हद तक सही ही समझा था — क्योंकि कई भविष्यवाणियां सच हो चुकी थीं।

लेकिन, 21वीं सदी आ गई — और यीशु अब तक नहीं लौटे।


अब हम वापस लौटते हैं उस भविष्यवाणी पर:

जकर्याह 14:7:

“…परंतु यह एक दिन होगा जो यहोवा को ही ज्ञात है; न दिन, न रात; परंतु संध्या समय उजाला होगा।”

इसका अर्थ है —
हम आज उस “विशेष दिन” में जी रहे हैं, जो केवल प्रभु को ज्ञात है
यह “अतिरिक्त समय” है — एक समय जो प्रभु की करुणा के कारण बढ़ा दिया गया है।

“वह नहीं चाहता कि कोई नाश हो, परंतु सबको मन फिराने का अवसर मिले।”
(2 पतरस 3:9)


प्रिय भाई / बहन,

यह समय प्रभु यीशु की अनुग्रह की ज्योति का अंतिम प्रकाश है।
यह ज्योति अब धीरे-धीरे समाप्त नहीं होगी — बल्कि अचानक हट जाएगी

और फिर संसार पर गहरा अंधकार आ जाएगा — अर्थात विनाश और न्याय।

1 थिस्सलुनीकियों 5:2–3:

“प्रभु का दिन चोर की नाईं रात को आएगा। जब लोग कहेंगे, ‘शांति और सुरक्षा है’, तभी अचानक विनाश उन पर टूट पड़ेगा।”

आज के कई लोग मज़ाक उड़ाते हैं

“यीशु अब तक नहीं आया, अब क्यों आएगा? सब कुछ तो वैसा ही है जैसा पहले था!”

वे नहीं समझते कि वे एक विशेष अतिरिक्त समय में जी रहे हैं —
एक अंतिम अवसर जो उन्हें पश्चाताप के लिए दिया गया है।


2 पतरस 3:3–4:

“अंतिम दिनों में ठट्ठा करनेवाले आएंगे… और कहेंगे: ‘उसके आने की प्रतिज्ञा कहाँ है?’…”

परंतु वही पद हमें चेतावनी देता है:

“प्रभु देर नहीं करता अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने में… वह धीरज धरता है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि कोई भी नाश हो…” (पद 9)


अब तुम्हारे लिए प्रश्न है:

📍 क्या तुम अब भी पाप में जीवन जी रहे हो?
📍 क्या तुमने नया जन्म पाया है?
📍 इस अतिरिक्त अवसर के होते हुए भी, उस दिन प्रभु को क्या उत्तर दोगे?

“आज उद्धार का दिन है!”
(2 कुरिन्थियों 6:2)


उद्धार का मार्ग:

पश्चाताप करो — अपने पापों को सच्चे मन से त्याग दो।
यीशु मसीह के नाम से पानी में पूर्ण रूप से डुबकी द्वारा बपतिस्मा लो — पापों की क्षमा के लिए। (प्रेरितों 2:38)
पवित्र आत्मा का वरदान मांगो और आत्मिक जीवन में बढ़ते जाओ।


प्रभु तुम्हें आशीष दे।

क्योंकि लिखा है:

“संध्या समय में उजाला होगा।”
चलो, जब तक यह ज्योति है, उसमें चलें — क्योंकि यह समय बहुत ही सीमित है।


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🏆 आपको वही पुरस्कार मिलेगा जो आपकी बुलाहट के अनुसार है

 

प्राकृतिक बातें आत्मिक सच्चाइयों को प्रकट करती हैं। प्रभु यीशु ने कहा:

“इस संसार के पुत्र, अपने समय में, ज्योति के पुत्रों से अधिक चतुर हैं।”
(लूका 16:8)

यह वचन हम मसीही विश्वासियों के लिए है। आइए, हम संसार के लोगों से कुछ समझदारी सीखें — जैसा प्रेरित पौलुस ने किया। वह कहता है:

“क्या तुम नहीं जानते कि दौड़ के मैदान में सब दौड़ते हैं, परंतु पुरस्कार कोई एक ही पाता है? ऐसे दौड़ो कि तुम उसे प्राप्त करो।”
(1 कुरिन्थियों 9:24)

पौलुस ने सांसारिक दौड़ की ओर देखकर आत्मिक शिक्षा ली। वैसे ही हमें भी ध्यान से देखना चाहिए कि कैसे शारीरिक दौड़ में नियम और न्याय होता है।

जब हम लंबी या छोटी दूरी की दौड़ को देखते हैं, तो हम पाते हैं कि सबको एक ही श्रेणी में नहीं दौड़ाया जाता। पुरुषों और स्त्रियों, बच्चों और बड़ों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है, ताकि हर किसी को न्यायपूर्वक अवसर मिले। अगर ऐसा न किया जाए, और सबको एक ही दौड़ में शामिल किया जाए, तो एक विशेष समूह — जैसे ताकतवर पुरुष — सभी पुरस्कार जीत लेंगे, और बाकियों को कुछ नहीं मिलेगा, चाहे उन्होंने कितनी भी मेहनत की हो।

उदाहरण के तौर पर: यदि 10 पुरुष और 10 स्त्रियाँ एक साथ 100 मीटर दौड़ में भाग लें, तो हो सकता है कि पहले 10 स्थान पुरुषों द्वारा ले लिए जाएँ, और पहली स्त्री 11वें स्थान पर पहुँचे। इसका अर्थ है कि कोई भी स्त्री पुरस्कार नहीं पाएगी, चाहे उसने मेहनत कितनी भी की हो।

इसीलिए, पुरुषों और स्त्रियों की दौड़ अलग होती है, बच्चों और विकलांगों की भी अलग। लेकिन जो पहला आता है — चाहे वह पुरुष हो, स्त्री हो या बच्चा — उसे एक जैसी स्वर्ण पदक मिलती है। समय भले ही अलग हो, लेकिन पुरस्कार समान होता है


🏃‍♂️🏃‍♀️ मसीही जीवन की दौड़

मसीही जीवन भी एक दौड़ है — आत्मिक दौड़। लेकिन इस दौड़ में भी ईश्वर ने विभिन्न श्रेणियाँ बनाई हैं: पुरुषों की दौड़, स्त्रियों की दौड़ और बच्चों की दौड़।

लेकिन इस बात को बहुत से “ज्योति के पुत्र” यानी मसीही विश्वासी नहीं समझते। हम सबको मिलाकर दौड़ाना चाहते हैं। स्त्रियाँ वे काम करना चाहती हैं जो पुरुषों के लिए नियुक्त हैं, और कभी-कभी पुरुष भी अपनी भूमिका को अनदेखा करते हैं।


⚖️ कलीसिया में अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ

ईश्वर ने कलीसिया में जिम्मेदारियाँ दी हैं — कुछ केवल पुरुषों को, कुछ स्त्रियों को और कुछ सबको समान रूप से।

जैसा लिखा है:

“इसलिये मैं चाहता हूं कि पुरुष हर जगह प्रार्थना करें, और पवित्र हाथ उठाकर बिना क्रोध और विवाद के प्रार्थना करें।”
(1 तीमुथियुस 2:8)

यह विशेष रूप से पुरुषों के लिए है — प्रार्थना का नेतृत्व, सभा का संचालन, आत्मिक अगुवाई।

आगे लिखा है:

“और स्त्री चुपचाप सीखे, और पूरी आज्ञाकारिता के साथ रहे। मैं स्त्री को उपदेश देने या पुरुष पर अधिकार जताने की अनुमति नहीं देता, बल्कि वह चुपचाप रहे।”
(1 तीमुथियुस 2:11–12)

“क्योंकि पहले आदम बनाया गया, फिर हवा।”
(वचन 13)

यह प्रभु का सीधा आदेश है। इसलिए अगर कोई स्त्री यह कहकर कि “मैं भी प्रचारक या पास्टर बनूँगी”, अपने मार्ग से भटकती है, तो वह उस दौड़ में भाग ले रही है जो उसकी नहीं है

और अंत में, चाहे उसने कितना भी प्रचार किया हो, लोगों को सेवकाई दी हो — यदि वह ईश्वर की निर्दिष्ट भूमिका में नहीं रही, तो उसे पुरस्कार नहीं मिलेगा। प्रभु कहेंगे:
“तू उस राह पर नहीं दौड़ी जो तेरे लिए थी।”


👑 स्त्रियों की आत्मिक दौड़ क्या है?

बाइबल कहती है:

“वैसे ही स्त्रियाँ भी शर्म और संयम के साथ, सज्जन वस्त्रों में अपने को सजाएँ; न कि केश-विन्यास, या सोने, या मोती, या कीमती कपड़ों से;
बल्कि अच्छे कामों से, जैसा कि परमेश्वर से डरनेवाली स्त्रियों को शोभा देता है।”
(1 तीमुथियुस 2:9–10)

एक परमेश्वर से डरनेवाली स्त्री की दौड़ है: शांति में चलना, पवित्रता में रहना, नम्रता, संयम, और सच्चे व्यवहार में बने रहना।

अगर वह वेशभूषा में शालीन, व्यवहार में नम्र, वाणी में संयमी है; पुरुषों जैसे कपड़े नहीं पहनती, सजावट में भोग-विलास नहीं करती — तो वह अपनी दौड़ स्त्रियों की श्रेणी में पूरी कर रही है।

और उस दिन, उसकी पुरस्कार की महिमा एक ऐसे पुरुष से भी अधिक हो सकती है जो प्रचारक था, लेकिन अपने बुलाहट में विश्वासयोग्य नहीं रहा।


🌈 एक स्वर्गीय दर्शन का गवाह

एक प्रसिद्ध अमेरिकी प्रचारक रिक जॉयनर (Rick Joyner) ने एक दर्शन साझा किया जिसमें वह प्रभु यीशु के साथ स्वर्ग में गए। वहाँ उन्होंने कई सिंहासनों को देखा जिन पर लोग बैठे थे। वे हैरान हुए कि ज्यादातर सिंहासन स्त्रियों और बच्चों द्वारा भरे गए थे

उन्होंने प्रभु से पूछा, “प्रभु, क्या यहाँ स्त्रियाँ और बच्चे ही प्रमुख हैं?” और उन्हें समझ में आया कि स्वर्ग में महिमा उन पर अधिक है जो अपनी भूमिका में विश्वासयोग्य रहे, न कि उन पर जिन्होंने केवल बड़ी-बड़ी बातें कीं।


💖 बहन, हिम्मत रखो!

यदि तुम अपनी स्त्री-सुलभ भूमिका में चल रही हो — पवित्रता, संयम, नम्रता, और सेवा में — तो जान लो कि एक स्वर्ण मुकुट तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।

पुरस्कार मेहनत से नहीं, निष्ठा से मिलता है। जैसे एक शिक्षक दो छात्रों को परीक्षा देता है — एक को 10 कठिन प्रश्न, दूसरे को 100 सरल प्रश्न।
पहले ने 9/10 सही किए (90%), दूसरे ने 50/100 (50%)।
पुरस्कार पहले को मिलेगा, क्योंकि उसने अपने हिस्से को निष्ठा से पूरा किया।


🌻 पहले ये स्त्रियाँ सीखें…

  • मूसा से पहले मिरयम से सीखो।

  • एलिय्याह से पहले इज़ेबेल को देखो — जिसने उसका विरोध किया।

  • पतरस से पहले मरियम, मार्था और मरियम मगदलीनी से सीखो।

  • पौलुस से पहले लिदिया और तबिता से सीखो — जिन्होंने परमेश्वर के दासों की सेवा की।


🙌 हम सभी की समान जिम्मेदारी: गवाही देना

हाँ, कुछ जिम्मेदारियाँ सभी मसीहियों पर समान रूप से हैं — स्त्री और पुरुष। हम सब को मसीह के गवाह बनना है, अपने जीवन और व्यवहार से दूसरों को परमेश्वर की ओर आकर्षित करना है।

“परन्तु मसीह को प्रभु जानकर अपने हृदयों में पवित्र समझो; और जो कोई तुमसे तुम्हारे भीतर की आशा का कारण पूछे, उसे नम्रता और भय के साथ उत्तर देने को सदा तैयार रहो।”
(1 पतरस 3:15)


📯 निष्कर्ष

बहन, यदि तू प्रभु की आज्ञाओं में, उसकी नियुक्ति में बनी रहती है — तू हार नहीं रही, बल्कि विजयी बन रही है! अपने स्वभाव, आचरण और जीवन से तू भी स्वर्गीय पुरस्कार की अधिकारी बनेगी। सिंहासन पर तेरा स्थान है।

ध्यान रहे: पुरस्कार उम्र, लिंग या भूमिका पर नहीं, बल्कि विश्वासयोग्यता पर आधारित होगा।


 

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पवित्रता का मार्ग: एक धार्मिक चिंतन

यशायाह 35:8 (Pavitra Bible – Hindi O.V.):

“वहाँ एक राजमार्ग होगा, जिसे ‘पवित्रता का मार्ग’ कहा जाएगा;
अशुद्ध लोग उस पर नहीं चल सकेंगे। यह केवल उनके लिए होगा जो इस मार्ग पर चलने के योग्य हैं;
मूर्ख भी उस पर भटकेंगे नहीं।”

यह भविष्यवाणी उद्धार, पवित्रीकरण, और परमेश्वर की उपस्थिति तक पहुँचने के एकमात्र मार्ग के बारे में गहरी आत्मिक अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।


1. यह मार्ग परमेश्वर की ओर से है

“पवित्रता का मार्ग” कोई मानवीय योजना नहीं है, बल्कि परमेश्वर का दिया हुआ मार्ग है। यह उसके लोगों के लिए ठहराया गया है कि वे उसकी धार्मिकता और पवित्रता में चलें। यह बाइबल की उस शिक्षा के साथ मेल खाता है कि उद्धार और पवित्रीकरण केवल परमेश्वर की अनुग्रह से होते हैं, न कि हमारे कार्यों से।

इफिसियों 2:8–9:

“क्योंकि अनुग्रह से तुम विश्वास के द्वारा उद्धार पाए हो;
और यह तुम्हारी ओर से नहीं, यह परमेश्वर का वरदान है;
यह कामों के कारण नहीं, ऐसा न हो कि कोई घमंड करे।”


2. यह मार्ग केवल पवित्रों के लिए है

यशायाह स्पष्ट करता है कि अशुद्ध इस मार्ग पर नहीं चल सकते। इसका अर्थ है कि परमेश्वर की उपस्थिति में पहुँचने के लिए पवित्रता अनिवार्य है। नए नियम में यह बात और स्पष्ट होती है, जब यीशु मसीह के प्रायश्चित द्वारा विश्वासियों को पाप से शुद्ध किया जाता है।

1 यूहन्ना 1:7:

“पर यदि हम ज्योति में चलें, जैसा वह ज्योति में है,
तो हम एक दूसरे के साथ सहभागिता रखते हैं,
और उसका पुत्र यीशु का लहू हमें सब पाप से शुद्ध करता है।”


3. यीशु मसीह इस मार्ग की परिपूर्णता हैं

यीशु मसीह स्वयं पवित्रता के मार्ग की पूर्णता हैं। उन्होंने कहा:

यूहन्ना 14:6:

“यीशु ने उससे कहा, ‘मार्ग, सत्य और जीवन मैं ही हूँ;
बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं आता।'”

केवल यीशु के द्वारा ही हम परमेश्वर के पास पहुँच सकते हैं। वही हमें पवित्र करता है और धार्मिकता में चलने की सामर्थ देता है।


4. पवित्र आत्मा की भूमिका

पवित्रता के मार्ग पर चलने के लिए पवित्र आत्मा की भूमिका अत्यंत आवश्यक है। वही हमें पाप के लिए दोषी ठहराता है, धर्म का जीवन जीने की शक्ति देता है, और हमें सत्य में मार्गदर्शन करता है।

यूहन्ना 16:13:

“जब वह, अर्थात सत्य का आत्मा आएगा,
तो तुम्हें सारे सत्य का मार्ग बताएगा।”

पवित्र आत्मा के कार्य के बिना इस मार्ग पर चलना असंभव है।


5. अंतिम आशा की ओर संकेत

“पवित्रता का मार्ग” भविष्य की उस आशा की ओर संकेत करता है जब हम नए यरूशलेम में परमेश्वर के साथ सदैव निवास करेंगे

प्रकाशितवाक्य 21:27:

“और उसमें कोई अशुद्ध वस्तु,
या घृणित और झूठ बोलने वाला कोई नहीं जाएगा,
केवल वे ही जिनके नाम जीवन के मेम्ने की पुस्तक में लिखे हैं।”


6. इस मार्ग का आध्यात्मिक अर्थ

इस पवित्र मार्ग की बाइबिल में गहरी धार्मिक अर्थवत्ता है:

  • पवित्रीकरण: यह एक प्रक्रिया है जिसमें पवित्र आत्मा के द्वारा विश्वासियों को पवित्र बनाया जाता है।

  • विशिष्टता: परमेश्वर तक पहुँचने का मार्ग केवल मसीह के द्वारा है और यह पवित्रता मांगता है।

  • निजात का अंतिम लक्ष्य: इस मार्ग का अंत शाश्वत जीवन है, परमेश्वर की उपस्थिति में, जहाँ कोई पाप नहीं होगा।


7. विश्वासियों के लिए व्यवहारिक अनुप्रयोग

हर मसीही विश्वासी को इस पवित्र मार्ग पर चलने के लिए बुलाया गया है:

  • पवित्र जीवन की खोज करें: परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार जीना और पवित्र आत्मा से शक्ति पाना।

  • मसीह में बने रहें: यह पहचानना कि उसके बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते।

यूहन्ना 15:5:

“मैं दाखलता हूँ, तुम डालियाँ हो;
जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें,
वही बहुत फल लाता है;
क्योंकि मुझसे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।”

  • आगामी महिमा की प्रतीक्षा करें: नए यरूशलेम में परमेश्वर के साथ अनंतकालीन संगति की आशा।


आप परमेश्वर की शांति और अनुग्रह से भरपूर रहें!


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गहराई में चलो 


लूका 5:1-7

“जब लोग उस पर गिरे पड़ते थे कि परमेश्वर का वचन सुनें, तो वह गलील की झील के किनारे खड़ा था।
उसने झील के किनारे दो नावें लगी देखीं; और मछुए उन से उतर कर जाल धो रहे थे।
सो वह उन नावों में से एक पर, जो शमौन की थी, चढ़कर, उस से बिनती की, कि थोड़ा किनारे से हटा ले चले।
और वह बैठकर नाव पर से भीड़ को उपदेश देने लगा।
जब वह बोल चुका, तो शमौन से कहा, गहराई में ले चलो, और मछली पकड़ने के लिये अपने जाल डालो।
शमौन ने उत्तर दिया, हे गुरु, हम ने रात भर परिश्रम किया, और कुछ न पकड़ा; तौभी तेरे वचन के अनुसार जाल डालूंगा।
और ऐसा करने पर उन्होंने बहुत सी मछलियां घेर लीं, यहां तक कि उनके जाल फटने लगे।
और उन्होंने अपनी और नाव में जो उनके संगी थे, संकेत किया, कि आकर हमारी सहायता करें।
वे आए, और उन दोनों नावों को इतना भर लिया, कि वे डूबने लगीं।”


इस घटना को अक्सर हम एक साधारण मछलियों के चमत्कार के रूप में पढ़ते हैं, पर वास्तव में यह जीवन के उन लोगों के लिए एक गहरा संदेश रखती है, जो निरंतर मेहनत कर रहे हैं, पर फिर भी उनकी कमाई, उनकी मेहनत उन्हें ठोस फल नहीं दे रही।
यदि तुम भी उनमें से हो, तो यह संदेश खासतौर पर तुम्हारे लिए है।
अगर तुम्हारा जीवन और कामकाज पहले से ही सुचारु रूप से चल रहा है, तो यह संदेश तुम्हारे लिए नहीं है — तुम बस प्रभु की पवित्रता और स्वर्ग के राज्य पर और गहराई से ध्यान देना जारी रखो।

इस पूरे दृश्य में ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रभु यीशु भीड़ को शिक्षा देना चाहते थे, लेकिन भीड़ के कारण अशांति थी। ऐसे में उन्होंने किनारे पर पड़ी एक खाली नाव को चुना — वह नाव थी शमौन पतरस की।
वह नाव उस समय प्रयोग में नहीं थी, क्योंकि मछुए थककर जाल धो रहे थे — पूरी रात मेहनत के बाद भी एक मछली नहीं मिली थी।
प्रभु ने उसी निष्फल, थकी हुई नाव को अपनी अस्थायी वेदी (altar) बना लिया, और उससे लोगों को शिक्षा दी।

यह नाव आज हमारे लिए क्या प्रतीक है?

यह उस किसी भी संसाधन का प्रतीक है जिससे तुम अपना जीवनयापन करते हो — जैसे तुम्हारा हुनर, तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारा व्यवसाय, दुकान, खेत, प्लॉट, यहां तक कि तुम्हारी कला या पेशा।
यह कोई भी “चौका” है जहाँ से तुम अपनी ‘रोटी’ कमाते हो।

पर गौर करने वाली बात यह है कि प्रभु यीशु ने उन नावों को नहीं चुना जो अच्छी स्थिति में थीं या उपयोग में थीं। उन्होंने वही नाव चुनी जो खाली थी, थकी हुई थी, बेकार पड़ी थी।
क्यों? क्योंकि वही नाव अब उसके प्रयोग के लिए तैयार थी।

क्या तुम्हारी ज़िंदगी की “नाव” भी अब तक बेकार पड़ी है? क्या तुमने मेहनत की, और कुछ नहीं पाया?

तो अब समय है कि उस “नाव” को प्रभु को सौंप दो।
उसे अपनी वेदी बना दो।

जब पतरस और उसके साथी प्रभु को अपनी नाव देने के लिए तैयार हुए, तब ही वह चमत्कार हुआ — प्रभु ने कहा:
“गहराई में जाओ (Tweka mpaka vilindini), और जाल डालो!”
और परिणाम?
इतनी मछलियाँ कि जाल फटने लगे, और दूसरी नाव बुलानी पड़ी — आशीर्वाद इतना अधिक कि अपने अकेले से सम्भव नहीं।


तुम्हारा चिह्नित “चौका” क्या है?

  • क्या तुम बढ़ई या राजमिस्त्री हो?
    क्या तुम देखते हो कि तुम्हारे चर्च की दीवार में दरार है, या कुछ निर्माण अधूरा है?
    मत सोचो कि पैसे मिलेंगे या नहीं — बस अपना हुनर प्रभु को दे दो।
    दीवार मरम्मत कर दो, पानी का सिस्टम ठीक कर दो, और देखो कैसे प्रभु तुम्हारे लिए नए दरवाज़े खोलता है।
  • क्या तुम बावर्ची हो?
    क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारी खाना बनाने की सेवा का प्रयोग प्रभु के लिए नहीं हो सकता?
    लेकिन अगर चर्च में ज़रूरत है — बुज़ुर्गों के लिए, मेहमानों के लिए, अनाथों के लिए — तुम आगे बढ़ो।
    मत पूछो कि कौन कहेगा — खुद से कदम उठाओ।
  • क्या तुम माली हो?
    चर्च का परिसर सुंदर नहीं लग रहा?
    अपने हुनर से उसे सजाओ जैसे दूसरों के बाग़-बग़ीचे सजाते हो।
    प्रभु यह नहीं देखता कि तुमने क्या किया है, वह देखता है कि क्यों किया है।
  • क्या तुम IT के क्षेत्र में हो?
    वेबसाइट, ऐप या सोशल मीडिया पर परमेश्वर के राज्य के प्रचार के लिए कुछ कर सकते हो?
    क्यों न एक प्लेटफ़ॉर्म तैयार करो जिससे परमेश्वर का वचन दूर-दूर तक पहुँचे?
    मत सोचो कि यह “मसीही सेवा” नहीं है — याद रखो प्रभु ने नाव का उपयोग किया, न कि मंदिर का।
  • क्या तुम्हारे पास खाली दुकानें (फ्रेमें) हैं?
    और कोई मसीही भाई-बहन बाइबल अध्ययन के लिए एक कमरा मांगता है, लेकिन तुम देने से मना कर देते हो?
    फिर भी चाहते हो कि प्रभु तुम्हारे व्यापार में वृद्धि करे?
    ऐसा नहीं होगा — जब तक तुम चरण नहीं उठाते, कुछ नहीं बदलेगा।

हाग्गै 1:6 कहता है:

“तुम ने बहुत बोया, परन्तु थोड़ा पाया; तुम खाते हो, परन्तु तृप्त नहीं होते; तुम पीते हो, परन्तु प्यास नहीं बुझती…”

क्यों? क्योंकि तुम प्रभु के काम को पीछे रखकर सिर्फ अपने काम को बढ़ाने में लगे हो।


अब समय है — उस नाव को प्रभु को सौंप दो।
वह फिर कहेगा:
“गहराई में चलो…”
और जब तुम आज्ञा मानोगे, तो तुम्हारा परिणाम भी पतरस जैसा होगा —
इतना आशीर्वाद कि अकेले सम्भाल न सको — दूसरों को बुलाना पड़े।


सच्चाई को जानो, और सच्चाई तुम्हें मुक्त करेगी।
(यूहन्ना 8:32)

प्रभु तुम्हें आशीष दे।


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संप्रदायों को छोड़ना क्या है?

यूहन्ना 16:13

“जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सारे सत्य में ले चलेगा। वह अपनी ओर से नहीं कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा।”

यह वचन सिखाता है कि पवित्र आत्मा का कार्य केवल उद्धार के समय तक सीमित नहीं है, बल्कि वह निरंतर हमें परमेश्वर की सच्चाई में मार्गदर्शन करता है। बिना आत्मा के कोई भी व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर को जान नहीं सकता।

रोमियों 8:9

“परन्तु यदि परमेश्वर का आत्मा वास्तव में तुम में वास करता है, तो तुम शरीर में नहीं, आत्मा में हो। यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं, तो वह उसका नहीं।”

पवित्र आत्मा के बिना कोई भी सच्चे रूप में परमेश्वर को जान या उसका अनुसरण नहीं कर सकता। बहुत से मसीही उद्धार पाते समय आत्मा को प्राप्त करते हैं, परंतु बाद में अनजाने में उसे दबा देते हैं। जब लोग कहते हैं, “मैं पहले आत्मा से भरा था, अब नहीं हूं,” तो यह दिखाता है कि आत्मा का कार्य उनमें मंद पड़ गया है।

1 थिस्सलुनीकियों 5:19

“आत्मा को न बुझाओ।”

आत्मा को बुझाना यानी उसके मार्गदर्शन का विरोध करना या उसे दबाना। जब हम आत्मा के नेतृत्व से इंकार करते हैं — विशेष रूप से सच्चाई में बढ़ने के समय — तो हम उसे दबाते हैं।


धर्म और संप्रदाय: आत्मा के कार्य में सबसे बड़ा बाधा

आत्मा को बुझाने का सबसे बड़ा कारण क्या है? उत्तर है — धार्मिकता और संप्रदायवाद

जब यीशु पृथ्वी पर सेवा कर रहे थे, तो उन्होंने देखा कि बहुत से लोग अपने धार्मिक ढांचों में जकड़े हुए हैं, विशेषकर फरीसी और सदूकी (मत्ती 23)। वे व्यवस्था का पालन करने में कठोर थे, लेकिन मसीह के द्वारा लाई गई पूर्णता को पहचान नहीं पाए। उनकी व्यवस्था (तोरा) अधूरी थी, और उन्होंने यीशु को इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि वह उनके परंपराओं को चुनौती देते थे।

उन्होंने आत्मा को उन्हें आगे सिखाने और सत्य में ले चलने की अनुमति नहीं दी, बल्कि वे अपने धार्मिक पहचान और ढांचे से चिपके रहे।


मसीह की देह में एकता के लिए परमेश्वर की योजना

नए नियम में परमेश्वर ने कभी भी संप्रदायों की स्थापना नहीं की। कलीसिया एक देह है, जिसे इन बातों से एकता में जोड़ा गया है:

  • एक विश्वास
  • एक बपतिस्मा
  • एक आत्मा
  • एक प्रभु
  • एक परमेश्वर

इफिसियों 4:4-6

“एक ही देह है और एक ही आत्मा, जैसे कि तुम्हारे बुलाए जाने में एक ही आशा है।
एक ही प्रभु है, एक ही विश्वास, एक ही बपतिस्मा;
और सब का एक ही परमेश्वर और पिता है, जो सब के ऊपर, सब के बीच और सब में है।”

आज के समय में कई संप्रदाय मौजूद हैं, जो विश्वासियों को शिक्षाओं और परंपराओं के अनुसार विभाजित करते हैं। पॉल ने इस विषय में चेतावनी दी थी:

1 कुरिन्थियों 1:12–13

“मेरा मतलब यह है कि तुम में से हर एक कहता है, ‘मैं पौलुस का हूं,’ ‘मैं अपुल्लोस का,’ ‘मैं कैफा का,’ या ‘मैं मसीह का।’ क्या मसीह बंट गया है? क्या पौलुस तुम्हारे लिए क्रूस पर चढ़ाया गया? या तुम पौलुस के नाम पर बपतिस्मा लिए गए?”

सच्ची मसीही एकता मसीह में होती है, न कि किसी संप्रदाय के नाम में।


आत्मा का कार्य और संप्रदायों का खतरा

जब पवित्र आत्मा किसी विश्वास को गहराई से सत्य समझाने के लिए अगुवाई करता है — जैसे यीशु के नाम में जल में डुबाकर बपतिस्मा लेना (प्रेरितों 2:38) — तब उस व्यक्ति को आत्मा की अगुवाई में प्रार्थना करते हुए बाइबल का अध्ययन करना चाहिए।

यूहन्ना 3:5

“मैं तुमसे सच कहता हूं, यदि कोई जल और आत्मा से जन्म नहीं लेता तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।”

परंतु अधिकांश लोग बाइबल के स्थान पर अपने संप्रदाय की परंपराओं की ओर भागते हैं। यदि उनका संप्रदाय आत्मा द्वारा दी गई सच्चाई को नकारता है, तो वे भी उसे नकार देते हैं — और इस प्रकार आत्मा को बुझा देते हैं।


धर्म और संप्रदायों से बाहर आने का बुलावा

प्रकाशितवाक्य 18:4

“हे मेरे लोगो, उसमें से बाहर निकल आओ, कि तुम उसकी पापों में सहभागी न बनो, और जो उसे दंड मिलेगा उसमें भागी न हो।”

यह केवल शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि आत्मिक रूप से भी धार्मिक बंधनों और झूठे शिक्षाओं से बाहर आने का बुलावा है।

2 कुरिन्थियों 6:15–18

“मसीह का बेलियाल से क्या मेल? या एक विश्वास का अविश्वासी से क्या संबंध? और परमेश्वर के मन्दिर का मूरतों से क्या मेल? क्योंकि हम जीवते परमेश्वर का मन्दिर हैं।
जैसा कि परमेश्वर ने कहा है: ‘मैं उनके बीच वास करूंगा और उनमें चलूंगा, और मैं उनका परमेश्वर होऊंगा, और वे मेरी प्रजा होंगे।’
इस कारण प्रभु कहता है, ‘उनके बीच से बाहर निकल आओ और अलग रहो, और अशुद्ध वस्तु को मत छुओ; तब मैं तुम्हें स्वीकार करूंगा, और मैं तुम्हारा पिता बनूंगा, और तुम मेरे पुत्र और पुत्रियाँ बनोगे।’”

विश्वासियों को झूठी शिक्षाओं और संप्रदायों से बाहर निकलने के लिए बुलाया गया है — ताकि वे आत्मिक रूप से बढ़ सकें।


अंत समय और पशु की छाप

अंत समय में संप्रदाय “पशु की छाप” की प्रणाली के निर्माण में एक बड़ा साधन बनेंगे। मत्ती 25 में यीशु ने दो प्रकार के विश्वासियों का उल्लेख किया: बुद्धिमान और मूर्ख कुँवारियाँ।

बुद्धिमान कुँवारियाँ, आत्मा से भरी हुई थीं और उनके पास अतिरिक्त तेल था — यह आत्मा के प्रकाशन और निरंतर मार्गदर्शन का प्रतीक था। इसलिए उनकी दीपकें जलती रहीं।
मूर्ख कुँवारियाँ, जो केवल धार्मिक रीति-रिवाजों में उलझी रहीं, आत्मा की गहराई में नहीं गईं — उनका तेल समाप्त हो गया और वे विवाह भोज से बाहर रह गईं।


ईश्वर आपको आशीष दे।


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दौड़ो! दौड़ो! दौड़ो!

वे चर्च जो केवल “सफलता का सन्देश” प्रचारित करते हैं और यह कहते हैं कि ईश्वर का प्रमाण कि वह तुम्हारे साथ है, तुम्हारी धन-संपत्ति है… ऐसी चर्च से सावधान रहो!

“क्योंकि धन का प्रेम हर प्रकार की बुराई का मूल है।” – 1 तिमोथियुस 6:10

वे चर्च जो पश्चाताप और क्षमा का प्रचार नहीं करते और लोगों को यह विश्वास दिलाते हैं कि अपने पापों में रहना सामान्य है… ऐसी चर्च से सावधान रहो!

“यदि हम अपने पापों को स्वीकार करें, तो वह विश्वसनीय और धर्मी है, जो हमारे पापों को माफ करेगा और हमें हर अन्याय से शुद्ध करेगा।” – 1 यूहन्ना 1:9
पश्चाताप और क्षमा ही विश्वास का हृदय हैं।

वे चर्च जो ईश्वर के वचन को राजनीति और सामाजिक समूहों के साथ मिलाते हैं, जिससे तुम राजनीतिक मंच और चर्च में अंतर न समझ पाओ, या चर्च जो ईश्वर के वचन को मानव परंपराओं के साथ मिलाते हैं… बहुत सावधान रहो!

वे चर्च जो पवित्रता का प्रचार नहीं करते और लोगों को बाइबल के अनुसार नहीं पढ़ाते… ऐसी चर्च में सतर्क रहो!

वे चर्च जो केवल दान का संदेश देते हैं और प्रेम, पवित्रता और विश्वास जैसी बुनियादी शिक्षाओं की उपेक्षा करते हैं… अपने अनंत जीवन की रक्षा के लिए ऐसी चर्च से सावधान रहो।

एक ऐसी चर्च जो तुम्हें तैयारी करने की शिक्षा नहीं देती कि कैसे उठा लिया जाएगा… सजग रहो!

“तुम सदा तैयार रहो, क्योंकि जब सोचो नहीं तब ही पुत्र मनुष्य आएगा।” – मत्ती 24:44

एक ऐसी चर्च जो पवित्र आत्मा के उपहारों – जैसे दिव्य स्वास्थ्य, भविष्यवाणी, भाषाओं में बोलना, चमत्कार आदि – को कार्य करने नहीं देती, जान लो, यह चर्च आध्यात्मिक रूप से मृत है या लगभग मृत है। सावधान रहो, भाई/बहन!

“आत्मा के फल दिखाओ, और आत्मा के दिये गए उपहारों का उपयोग करो।” – 1 कुरिन्थियों 12:7

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सात कलीसिया के युग

जब से हमारे प्रभु यीशु मसीह स्वर्ग में आरोहित हुए, लगभग दो हज़ार वर्ष बीत चुके हैं। इस अवधि में कलीसिया ने सात अलग-अलग युगों को पार किया है, जिन्हें सात कलीसिया के युग कहा जाता है। यह हमें प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में प्रकट किया गया है।

प्रकाशितवाक्य 1:12-20

“तब मैं उस स्वर को देखने के लिये फिरा जो मुझ से बातें करता था; और फिरकर मैंने सात सोने के दीवट देखे। और उन सातों दीवटों के बीच में मनुष्य के पुत्र के समान एक को देखा, जो पांव तक लम्बा वस्त्र पहिने और छाती पर सोने का कटिबंध कसे हुए था। उसके सिर और बाल ऊन के समान उजले, जैसे उजली ऊन, और उसकी आंखें आग की ज्वाला के समान थीं। उसके पांव भट्ठी में तपाए हुए पीतल के समान थे; और उसका शब्द बहुत से जलधाराओं का शब्द था। उसके दाहिने हाथ में सात तारे थे; और उसके मुंह से दोधारी तीखी तलवार निकलती थी; और उसका मुख सूर्य के समान चमकता था जब वह अपनी शक्ति में चमकता है। जब मैंने उसे देखा, तो उसके पांव पर मृतक के समान गिर पड़ा। तब उसने अपना दाहिना हाथ मुझ पर रखकर कहा, ‘मत डर; मैं पहला और अन्तिम हूं। और जीवित हूं; मैं मर गया था, और देखो मैं युगानुयुग जीवित हूं, और मृत्यु और अधोलोक की कुंजी मेरे पास है। जो बातें तू देख चुका है, और जो हैं, और जो इसके बाद होने वाली हैं, उन्हें लिख। जिन सात तारों को तू ने मेरे दाहिने हाथ में देखा, और जिन सात सोने के दीवटों को देखा, उनका भेद यह है: वे सात तारे सात कलीसियाओं के दूत हैं; और वे सात दीवट सात कलीसियाएं हैं।”

यह दर्शन प्रभु यीशु ने यूहन्ना को पतमोस के टापू पर दिया था। इसके द्वारा यह दिखाया गया कि अन्त के दिनों में कलीसिया किन चरणों से होकर गुज़रेगी। दुख की बात है कि आज बहुत-सी कलीसियाओं में प्रकाशितवाक्य की पुस्तक की शिक्षा नहीं दी जाती, क्योंकि शैतान नहीं चाहता कि लोग उन रहस्यों को समझें जो उसके अन्त को प्रकट करते हैं।

इसलिए अपने हृदय को खोलें और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको यह समझने में सहायता करे कि हम किस समय में जी रहे हैं और यीशु का पुनरागमन कितना निकट है।


सात कलीसिया के युग

प्रकाशितवाक्य में जिन सात दीवटों का उल्लेख है, वे सात अलग-अलग कलीसिया की अवधियों का प्रतीक हैं, जो यीशु के पृथ्वी पर आने से लेकर आज तक चलती रही हैं।

1. एफिसुस (53 ई. – 170 ई.)

  • विशेषता: पहली प्रेम को छोड़ दिया। यह काल नीरो द्वारा मसीहीयों के उत्पीड़न का था, यहाँ तक कि प्रेरित यूहन्ना की मृत्यु तक। निकोलाई पंथ की शिक्षाएं (पैग़न विचार) कलीसिया में प्रवेश करने लगीं।
  • चेतावनी: मन फिराओ और पहले प्रेम में लौट आओ।
  • प्रतिज्ञा: जो विजयी होगा, उसे परमेश्वर के स्वर्गलोक में जीवन के वृक्ष का फल खाने का अधिकार मिलेगा।
    (संदर्भ: प्रकाशितवाक्य 2:1-7)

2. स्मुर्ना (170 ई. – 312 ई.)

  • विशेषता: सम्राट डायक्लेशियन के अधीन भारी उत्पीड़न। इस काल में सबसे अधिक संत शहीद हुए।
  • प्रोत्साहन: यद्यपि वे गरीब थे, फिर भी आत्मिक दृष्टि से धनी थे।
  • प्रतिज्ञा: जो विजयी होगा, उसे दूसरी मृत्यु से कोई हानि नहीं होगी।
    (संदर्भ: प्रकाशितवाक्य 2:8-11)

3. पर्गमुन (312 ई. – 606 ई.)

  • विशेषता: झूठी शिक्षाएं कलीसिया में स्थापित हुईं। पैग़नवाद और मसीहियत मिलकर रोमन कैथोलिक कलीसिया का रूप बने। त्रित्व, मूर्तिपूजा और अस्वाभाविक बपतिस्मा जैसी शिक्षाएं (नाइसिया की परिषद, 325 ई.) इसी काल में आईं।
  • चेतावनी: मन फिराओ और प्रेरितों की शिक्षा में लौट आओ।
  • प्रतिज्ञा: छिपा हुआ मन्ना और सफेद पत्थर, जिस पर नया नाम लिखा होगा।
    (संदर्भ: प्रकाशितवाक्य 2:12-17)

4. थुआतीरा (606 ई. – 1520 ई.)

  • विशेषता: कलीसिया ने परमेश्वर के लिये जोश दिखाया, परन्तु यज़ेबेल (कैथोलिक कलीसिया) की शिक्षाओं में गहराई से फंसी रही।
  • चेतावनी: निकोलाई पंथ की शिक्षाओं से मन फिराओ।
  • प्रतिज्ञा: जो विजयी होगा, उसे राष्ट्रों पर अधिकार और भोर का तारा मिलेगा।
    (संदर्भ: प्रकाशितवाक्य 2:18-29)

5. सार्दिस (1520 ई. – 1750 ई.)

  • विशेषता: कलीसिया ने सुधार आरम्भ किया (जैसे लूथरन आंदोलन), पर कुछ शिक्षाएं कैथोलिक से बनी रहीं। केवल नाम का जीवन था, वास्तव में मृत।
  • चेतावनी: मन फिराओ और प्रेरितों की शिक्षा में लौट आओ।
  • प्रतिज्ञा: विजयी को श्वेत वस्त्र पहनाए जाएंगे और उसका नाम जीवन की पुस्तक से नहीं मिटाया जाएगा।
    (संदर्भ: प्रकाशितवाक्य 3:1-6)

6. फिलाडेल्फ़िया (1750 ई. – 1906 ई.)

  • विशेषता: प्रशंसनीय कलीसिया। झूठी शिक्षाओं का विरोध किया और विश्वासयोग्य रही। यीशु ने कहा कि शैतान की सभा वाले उनके पांवों के सामने दण्डवत करेंगे।
  • प्रतिज्ञा: विजयी परमेश्वर के मन्दिर में खम्भा बनेगा और उस पर परमेश्वर का नाम, नये यरूशलेम का नाम और मसीह का नया नाम लिखा जाएगा।
    (संदर्भ: प्रकाशितवाक्य 3:7-13)

7. लौदीकिया (1906 ई. – पुनरुत्थान तक)

  • विशेषता: न तो ठंडी, न गर्म – बस गुनगुनी। आज की कलीसिया इसी युग में है – घमण्ड, भौतिकवाद, सांसारिक सुख, और समझौते से भरी हुई। लोग इमारतों, कोरस, और धन पर घमण्ड करते हैं, पर आत्मिक रूप से वे नंगे और अंधे हैं।
  • चेतावनी: जोश में आओ और मन फिराओ।
  • प्रतिज्ञा: विजयी मसीह के साथ उसके सिंहासन पर बैठेगा।
    (संदर्भ: प्रकाशितवाक्य 3:14-22)

यह अन्तिम कलीसिया युग है। इसके बाद कोई और नहीं होगा।

हम प्रभु की वापसी के द्वार पर खड़े हैं। अपने आप से पूछें:

  • क्या आप प्रभु से मिलने के लिये तैयार हैं?
  • क्या आपका दीपक जल रहा है?
  • क्या आपने पवित्र आत्मा प्राप्त किया है?

“जिसके कान हों, वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।”

परमेश्वर आपको आशीष दे।
मरानाथा!

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इन अंतिम दिनों में प्रतिमसीह की आत्मा का कार्य

25 जून 2014 को, पोप फ्रांसिस, जो विश्व रोमन कैथोलिक चर्च के प्रमुख हैं, ने वैटिकन के सेंट पीटर स्क्वायर में एक बड़ी सभा को संबोधित किया। अपने संदेश में उन्होंने कई बिंदु रखे, जिन्होंने कई बाइबल-विश्वासी ईसाइयों के बीच धार्मिक चिंताएं उत्पन्न कीं। उनके मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:

  • “ईसाई धर्म में केवल यीशु की खोज करने जैसी कोई चीज़ नहीं है।”
  • “हर ईसाई को किसी विशिष्ट चर्च संस्था का सदस्य होना चाहिए।”
  • उन्होंने आगे चेतावनी दी कि “चर्च से अलग व्यक्तिगत रूप से यीशु मसीह के साथ संबंध बनाना खतरनाक और हानिकारक है।”
  • पोप ने यह सुझाव भी दिया कि एक ईसाई की पहचान उसके चर्च संबद्धता को दर्शाए — उदाहरण के लिए, “माइकल द कैथोलिक” या “जोसेफ द लूथरन”

ये कथन बाइबल की मूल शिक्षाओं के सीधे विरोध में हैं, विशेष रूप से मसीह और विश्वासियों के बीच व्यक्तिगत और उद्धारकारी संबंध के बारे में। शास्त्र स्पष्ट करता है कि उद्धार केवल यीशु मसीह में विश्वास के माध्यम से अनुग्रह द्वारा है, किसी संस्था या चर्च से संबद्धता द्वारा नहीं।


 उद्धार व्यक्तिगत है, संस्थागत नहीं

प्रेरित पॉल स्पष्ट रूप से बताते हैं कि उद्धार व्यक्तिगत अनुभव है, जो विश्वास पर आधारित है, न कि किसी मानव संरचना या प्रणाली पर:

“क्योंकि आप विश्वास के माध्यम से अनुग्रह द्वारा उद्धार पाए हैं; और यह आपके आप से नहीं है, यह ईश्वर का उपहार है, यह कार्यों द्वारा नहीं है, ताकि कोई घमंड न करे।”
(इफिसियों 2:8–9)

यीशु स्वयं ने कहा कि वह ही पिता की ओर जाने का मार्ग है, न कि चर्च, संप्रदाय या धार्मिक नेता:

“मैं मार्ग, सच्चाई और जीवन हूँ। मेरे माध्यम के बिना कोई पिता के पास नहीं आता।”
(यूहन्ना 14:6)

नवीन नियम में कहीं भी नहीं कहा गया कि किसी व्यक्ति को उद्धार पाने के लिए किसी विशेष चर्च संप्रदाय का सदस्य होना चाहिए। वास्तव में, कई प्रारंभिक विश्वासियों के पास कोई औपचारिक चर्च संस्था नहीं थी — वे घरों में मिलते थे (प्रेरितों के काम 2:46), अक्सर उत्पीड़ित होते थे, और केवल “मार्ग” के अनुयायी के रूप में पहचाने जाते थे (प्रेरितों के काम 9:2)।


वेश्या चर्च का उदय – प्रकाशितवाक्य 17

पोप फ्रांसिस की टिप्पणियां प्रकाशितवाक्य 17 में पाए जाने वाले भविष्यवाणी चेतावनियों के अनुरूप हैं। प्रेरित यूहन्ना ने एक प्रतीकात्मक महिला का वर्णन किया:

“उसके माथे पर लिखा नाम रहस्य था: ‘महान बाबुल, वेश्या और पृथ्वी की घृणाओं की माता।’”
(प्रकाशितवाक्य 17:5)

बाइबल में, एक महिला अक्सर एक चर्च का प्रतीक होती है (यिर्मयाह 6:2; 2 कुरिन्थियों 11:2)। प्रकाशितवाक्य 17 की महिला को आध्यात्मिक वेश्या के रूप में वर्णित किया गया है — एक ऐसा चर्च जिसने सच्ची शिक्षा को त्याग दिया और पृथ्वी के शासकों के साथ व्यभिचार किया (प्रकाशितवाक्य 17:2)। उसका शीर्षक, “वेश्यों की माता”, यह दर्शाता है कि उसने अन्य भटकित चर्चों को जन्म दिया है — ऐसे संप्रदाय और धार्मिक सिस्टम जिन्होंने भी सत्य के साथ समझौता किया।

इतिहास भर के कई बाइबल विद्वानों और सुधारकों के अनुसार, यह “मदर चर्च” रोमन कैथोलिक चर्च का प्रतिनिधित्व करता है, और उसकी “बेटियां” वे विभिन्न संप्रदाय हैं जिन्होंने उसकी परंपराओं और प्रथाओं को ईश्वर के वचन के ऊपर अपनाया।


सत्य की कीमत पर एकता – चिन्ह की ओर मार्ग

आज हम वैश्विक ईक्यूमेनिज़्म की ओर बढ़ते आंदोलन को देख रहे हैं — यह विचार कि सभी ईसाई संप्रदायों (और यहां तक कि अन्य धर्मों) को एक समावेशी धार्मिक प्रणाली में मिलाया जाए। यह एकता रोम द्वारा नेतृत्व की जा रही है और पोप फ्रांसिस द्वारा उत्साहपूर्वक समर्थित है, जिन्होंने मुसलमानों, बौद्धों, हिंदुओं और यहां तक कि नास्तिकों के साथ अंतरधार्मिक सभाएं आयोजित की हैं।

लेकिन यह एकता बाइबल की सच्चाई की कीमत पर आती है। यह आंदोलन लोगों को पश्चाताप और मसीह में विश्वास की ओर बुलाने के बजाय, सिद्धांतों के मतभेदों को मिटाने का प्रयास करता है, राजनीतिक और सामाजिक सामंजस्य के लिए।

यह वही है जो प्रतिमसीह के उदय और जानवर के चिन्ह के प्रवर्तन के लिए मंच तैयार करता है:

“और उसने सब—बड़े और छोटे, अमीर और गरीब, स्वतंत्र और दास—पर अपने दाहिने हाथ या माथे पर चिन्ह लेने के लिए मजबूर किया, ताकि वे बिना चिन्ह के न खरीद सकें और न बेच सकें; वह चिन्ह जानवर का नाम या उसके नाम की संख्या थी।”
(प्रकाशितवाक्य 13:16–17)

यह “चिन्ह” उस प्रणाली के प्रति भक्ति को दर्शाता है जो ईश्वर की सच्चाई को अस्वीकार करती है और समानता की मांग करती है — संभवतः धार्मिक पंजीकरण या सांप्रदायिक संबद्धता के माध्यम से। कई धर्मशास्त्री मानते हैं कि भविष्य में, जो लोग इस वैश्विक धार्मिक प्रणाली से असहमत रहेंगे, उन्हें आर्थिक भागीदारी से वंचित किया जाएगा — खरीद, बिक्री, काम या स्वतंत्र जीवन जीने से वंचित।


 पवित्र आत्मा की भूमिका – सच्ची मुहर

जहां झूठे धर्म बाहरी अनुपालन की मांग करता है, ईश्वर अपने सच्चे लोगों को भीतर से मुहर लगाता है — उन्हें अपनी पवित्र आत्मा देकर।

“यदि किसी के पास मसीह की आत्मा नहीं है, वह मसीह से नहीं है।”
(रोमियों 8:9)

“जो लोग परमेश्वर की आत्मा से नेतृत्वित होते हैं, वे परमेश्वर के बच्चे हैं।”
(रोमियों 8:14)

ईश्वर द्वारा यिर्मयाह 31 में वादा किया गया नया नियम मसीह में पूरा होता है और आत्मा के द्वारा लागू होता है — किसी संस्था की सदस्यता द्वारा नहीं:

“मैं अपना नियम उनके मन में डालूंगा और उनके हृदय में लिखूंगा। मैं उनका ईश्वर बनूंगा, और वे मेरी जनता होंगे… वे सभी मुझे जानेंगे, छोटे से बड़े तक।”
(यिर्मयाह 31:33–34)

यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि हर विश्वासी का यीशु मसीह के माध्यम से, पवित्र आत्मा के वास द्वारा, ईश्वर के साथ व्यक्तिगत संबंध होना चाहिए — किसी चर्च प्रणाली या पदानुक्रम के माध्यम से नहीं।


विश्वासियों का आने वाला उत्पीड़न

जो लोग आने वाली धार्मिक प्रणाली का पालन नहीं करेंगे, उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ेगा। उन्हें विभाजनकारी, खतरनाक या आतंकवादी के रूप में लेबल किया जाएगा, केवल इसलिए कि वे केवल मसीह का अनुसरण करने पर अड़े रहेंगे। यीशु ने ऐसे समय की चेतावनी दी:

“लोग तुमसे मेरे कारण नफ़रत करेंगे, पर जो अंत तक टिकेगा, वह उद्धार पाएगा।”
(मत्ती 10:22)

कुछ विश्वासियों को राप्चर (1 थिस्सलुनीकियों 4:16–17) से चूकने के बाद चिन्ह लेने से इंकार होगा और उन्हें महान संकट झेलना पड़ेगा — उनमें से कई अपनी आस्था के लिए शहीद बनेंगे (प्रकाशितवाक्य 7:14; 20:4)।


याद रखने योग्य प्रमुख धार्मिक सत्य

  1. उद्धार मसीह में विश्वास के माध्यम से अनुग्रह द्वारा होता है, चर्च के माध्यम से नहीं। (इफिसियों 2:8–9; यूहन्ना 14:6)
  2. सच्चा चर्च मसीह का शरीर है, न कि कोई संप्रदाय या भवन। (1 कुरिन्थियों 12:27; कुलुस्सियों 1:18)
  3. पवित्र आत्मा प्रत्येक विश्वासी की मुहर है, धार्मिक संबद्धता नहीं। (इफिसियों 1:13–14; रोमियों 8:9)
  4. हमें हर शिक्षा का परीक्षण शास्त्र के अनुसार करना चाहिए — यहाँ तक कि धार्मिक प्राधिकरणों के भी। (प्रेरितों 17:11; 1 यूहन्ना 4:1)
  5. आने वाली वैश्विक धार्मिक प्रणाली व्यक्तिगत विश्वास का विरोध करेगी। (2 थिस्सलुनीकियों 2:3–4; प्रकाशितवाक्य 13)

अंतिम चेतावनी

“यीशु के साथ व्यक्तिगत संबंध रखना खतरनाक और हानिकारक है।” — पोप फ्रांसिस (2014)

यह कथन प्रतिमसीह की आत्मा (1 यूहन्ना 4:3) का प्रतीक है — जो ईश्वर द्वारा मसीह के माध्यम से दिए गए अंतरंग, जीवित संबंध को ठंडी संस्थागतता और झूठी एकता से बदलने का प्रयास करता है।

सच्चाई यह है कि यीशु मसीह के साथ व्यक्तिगत संबंध न होना वास्तव में ही खतरनाक और शाश्वत रूप से विनाशकारी है।

“फिर मैं उन्हें स्पष्ट रूप से कहूंगा, ‘मैंने तुम्हें कभी नहीं जाना। मेरे पास दूर हटो, तुम्हारे बुरे कर्म करने वालों!’”
(मत्ती 7:23)


आह्वान:

अपने लिए यीशु की खोज करें। पवित्र आत्मा से पूर्ण हों। सत्य में अडिग रहें। समय कम है।

मरानाथा — प्रभु शीघ्र आ रहे हैं! (1 कुरिन्थियों 16:22)

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