प्रश्न: “व्यर्थ दोहराव” के साथ प्रार्थना करने का क्या अर्थ है? और मैं कैसे प्रार्थना करूँ ताकि मेरी प्रार्थनाएँ परमेश्‍वर को सच-मुच स्वीकार हों?

प्रश्न: “व्यर्थ दोहराव” के साथ प्रार्थना करने का क्या अर्थ है? और मैं कैसे प्रार्थना करूँ ताकि मेरी प्रार्थनाएँ परमेश्‍वर को सच-मुच स्वीकार हों?

उत्तर:

परमेश्‍वर आपको आशीष दे। यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है, क्योंकि यह हमें समझने में मदद करता है कि परमेश्‍वर किस तरह की प्रार्थना को वास्तव में महत्व देता है।

यीशु मत्ती 6:7 में कहते हैं:

“प्रार्थना करते समय अन्यजातियों के लोगों की तरह खाली दोहराव मत करो। वे सोचते हैं कि यदि वे एक ही बात को बार-बार दोहराते रहेंगे तो उनकी प्रार्थना स्वीकार होगी।”
(ERV-Hindi)

यहाँ “खाली दोहराव” का अर्थ यह नहीं है कि जोर से या लंबे समय तक प्रार्थना करना गलत है। इसका अर्थ है—बिना मन, बिना समझ, और बिना विश्वास के एक ही बात mechanically दोहराते रहना, जबकि हृदय उसमें बिल्कुल शामिल न हो।

यीशु उस धार्मिक आदत को संबोधित कर रहे थे जो उस समय कई लोगों में आम थी—लंबी-लंबी, रटाई हुई प्रार्थनाएँ—यह सोचकर कि शायद परमेश्‍वर इस वजह से सुन लेगा।

लेकिन यीशु सिखाते हैं कि परमेश्‍वर हमारे शब्दों की गिनती से नहीं, बल्कि हमारे हृदय की सच्चाई से प्रभावित होता है।

अगली आयत, मत्ती 6:8, कहती है:

“उनके जैसा मत बनो, क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हारी आवश्यकता को तुम्हारे मुँह खोलने से पहले ही जानता है।”

यह हमें एक गहरी सच्चाई दिखाता है:
परमेश्‍वर सर्वज्ञ है।
वह हमारे मुँह से शब्द निकलने से पहले ही जानता है कि हमें क्या चाहिए (भजन 139:1–4 देखें)।


प्रार्थना का असली हृदय

मत्ती 6:5–6 में यीशु प्रार्थना के दो और महत्वपूर्ण पहलू बताते हैं:

मत्ती 6:5
“जब तुम प्रार्थना करो, तो कपटियों की तरह मत बनो। वे तो दूसरों को दिखाने के लिए सभा-भवनों और सड़कों के मोड़ों पर खड़े होकर ऊँची आवाज़ में प्रार्थना करते हैं… ”

मत्ती 6:6
“परन्तु जब तुम प्रार्थना करो, तो अपनी कोठरी में जाओ, दरवाज़ा बंद करो और अपने उस पिता से प्रार्थना करो जो गुप्त में है। तुम्हारा पिता जो गुप्त में देखता है, वह तुम्हें प्रतिफल देगा।”

यीशु बताते हैं कि प्रार्थना दिखावा नहीं है।
यह परमेश्‍वर के साथ गहरी, निजी, सच्ची बातचीत है।

दूसरों से तालियाँ नहीं मिलतीं—फिर भी परमेश्‍वर स्वर्ग से उत्तर देता है, क्योंकि वह मन की गहराई को देखता है।


क्या जोर से या दोहराकर प्रार्थना करना गलत है?

नहीं। बाइबल इसका समर्थन नहीं करती।

कई जगह लोग दिल की गहराई से जोर से, और कभी-कभी दोहराकर भी प्रार्थना करते दिखाई देते हैं:

  • यीशु ने गतसमनी में तीन बार वही बात दोहराई (मत्ती 26:44)
  • दाऊद ने बार-बार पुकारते हुए प्रार्थना की (भजन 142:1)
  • प्रारंभिक कलीसिया ने एकमत होकर बड़ी दिलेरी से प्रार्थना की (प्रेरितों के काम 4:24–31)

इसलिए समस्या दोहराव नहीं है—समस्या है मन और इरादा

  • यदि हम दिल उंडेलते हुए दोहराते हैं—यह सही है।
  • यदि हम दिखावा करने के लिए दोहराते हैं—तो वह “व्यर्थ” हो जाता है।

क्या रटाई हुई, परंपरागत प्रार्थनाएँ सही हैं?

कुछ परंपराओं में लोग प्रार्थनाएँ सैकड़ों बार दोहराते हैं, यह सोचकर कि इससे शक्ति बढ़ती है।
लेकिन यीशु मत्ती 6:7 में स्पष्ट रूप से ऐसी प्रार्थना के विरुद्ध चेतावनी देते हैं।

दोहराव समस्या नहीं—मनहीन, निर्जीव दोहराव समस्या है।

परमेश्‍वर कहता है:

“यह लोग केवल अपने मुँह से मेरी निकटता दिखाते हैं, पर उनके मन मुझसे दूर हैं।”
(यशायाह 29:13)


तो फिर मुझे कैसे प्रार्थना करनी चाहिए?

जब आप प्रार्थना करें:

  • सच्चाई और ध्यान से बोलें।
  • अपनी आवश्यकताएँ साफ-साफ रखें।
  • दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश न करें।
  • रटी हुई पंक्तियों पर निर्भर न रहें।
  • अपने हृदय से बात करें—जैसे आप अपने पिता से बात करते हैं।
  • धन्यवाद देकर समाप्त करें और विश्वास करें कि उसने सुना है।

फिलिप्पियों 4:6 सिखाता है:

“किसी भी बात की चिन्ता मत करो। पर हर एक बात में प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ अपनी बिनतियाँ परमेश्‍वर के सामने रखो।”

जब आप इस तरह—ईमानदारी, नम्रता और विश्वास के साथ प्रार्थना करते हैं, तो आपकी प्रार्थनाएँ परमेश्‍वर के सामने सच-मुच अर्थपूर्ण बनती हैं।


प्रभु आपको आत्मा और सत्य में प्रार्थना करना सिखाए।

(यूहन्ना 4:24)

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Ester yusufu editor

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