Title जुलाई 2024

मुझे परमेश्वर की सेवा के लिए बुलाया गया है” — इसका क्या अर्थ है?

 

मसीही विश्वास में जब कोई कहता है, “मुझे परमेश्वर की सेवा के लिए बुलाया गया है,” तो इसका अर्थ है कि उसने यह समझा है कि परमेश्वर ने उसे अपनी इच्छा पूरी करने के लिए चुनकर बुलाया है। यह बुलाहट कोई मजबूरी नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर की ओर से एक दिव्य निमंत्रण है—उसके उद्धार योजना में भाग लेने के लिए।

बाइबल में यह सत्य इन वचनों के माध्यम से प्रकट होता है:

रोमियों 8:28–30
“हम जानते हैं, कि सब बातें मिलकर परमेश्वर से प्रेम रखने वालों के लिये, अर्थात् उसके उद्देश्य के अनुसार बुलाए गए लोगों के लिये भलाई ही को उत्पन्न करती हैं। क्योंकि जिन्हें उसने पहले से जान लिया, उन्हें उसने पहले से ठहराया भी कि वे उसके पुत्र के स्वरूप में हों… और जिन्हें उसने ठहराया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें उसने बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी।”

इफिसियों 2:10
“क्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं; और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिये सृजे गए हैं जिन्हें परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया, कि हम उन में चलें।”

यह बुलाहट सामान्य भी हो सकती है—जैसे रोज़मर्रा के जीवन में परमेश्वर की सेवा करना—या विशेष भी, जैसे कि मिशनरी सेवा, पास्टरी, या किसी अन्य मसीही सेवा में।


नए नियम में वर्णित बाइबल की नगरियाँ

तब और अब – एक सूची
(अनुवाद: नई अंतरराष्ट्रीय संस्करण – NIV)

नए नियम में कई नगरों का उल्लेख है जो प्रारंभिक मसीही प्रचार और सेवकाई के केंद्र बने। इनके आधुनिक नाम और स्थान हमें बाइबिल कथा को ऐतिहासिक और भौगोलिक दृष्टि से समझने में सहायता करते हैं:

बाइबिल नाम बाइबिल संदर्भ आधुनिक नाम वर्तमान देश
अन्ताकिया प्रेरितों के काम 11:26 अन्ताक्या तुर्की
कैसरिया प्रेरितों के काम 23:23 कैसरिया इज़राइल
एफिसुस प्रेरितों के काम 19:35 सेल्चुक तुर्की
फिलिप्पी प्रेरितों के काम 16:12 फिलिप्पी यूनान
थिस्सलुनीका प्रेरितों के काम 17:1 थेस्सलोनिकी यूनान

ये नगर उस समय मसीह की खुशखबरी फैलाने के प्रमुख केंद्र थे।


पुराने नियम में वर्णित बाइबल की नगरियाँ

तब और अब – एक सूची
(अनुवाद: नई अंतरराष्ट्रीय संस्करण – NIV)

पुराने नियम की कई घटनाएँ ऐतिहासिक और आत्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नगरों में हुईं:

बाइबिल नाम बाइबिल संदर्भ आधुनिक नाम वर्तमान देश
बेतएल उत्पत्ति 28:19 बेतिन फिलिस्तीन
आइ यहोशू 7:2 देइर दीबवान फिलिस्तीन
शित्तीम यहोशू 2:1 तल एल-हम्माम जॉर्डन

ये वे स्थान हैं जहाँ परमेश्वर ने स्वयं को प्रकट किया, आदेश दिए या अपनी महिमा दिखाई।


यीशु के प्रेरित

नाम, विवरण और आत्मिक महत्व
(संदर्भ: NIV)

यीशु ने अपने प्रेरितों को व्यक्तिगत रूप से बुलाया ताकि वे उनके निकटतम अनुयायी बनें और उनकी मृत्यु और पुनरुत्थान के बाद सुसमाचार को फैलाएँ। प्रेरितों की बुलाहट दर्शाती है कि परमेश्वर साधारण लोगों को विशेष कार्यों के लिए चुनता है।

मरकुस 3:13-19, प्रेरितों के काम 1:15-26

क्रम नाम अन्य नाम बाइबिल संदर्भ भूमिका और आत्मिक अर्थ
1 शमौन पतरस केफा (यूहन्ना 1:42) मत्ती 16:18–19 “चट्टान” जिस पर मसीह ने अपनी कलीसिया बनाई
2 अन्द्रियास यूहन्ना 1:40–42 दूसरों को यीशु के पास लाने वाला
3 याकूब जब्दी का पुत्र प्रेरितों के काम 12:1–2 पहले शहीद होने वाले प्रेरित
4 यूहन्ना “प्रेमी शिष्य” यूहन्ना 21:20–24 प्रेम पर केंद्रित लेखन, रहस्योद्घाटन का लेखक
5 मत्ती लेवी मत्ती 9:9 पूर्व में कर वसूलने वाला, प्रथम सुसमाचार का लेखक

इन प्रेरितों का जीवन परमेश्वर की बुलाहट, विश्वास, और मिशन को दर्शाता है।


बाइबिल के भविष्यवक्ता (पुरुष)

महान भविष्यवक्ता और उनका ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
(अनुवाद: NIV)

भविष्यवक्ता परमेश्वर के दूत थे। वे इस्राएल और अन्य जातियों को चेतावनी देने, पश्चाताप का आह्वान करने, और आने वाले मसीहा की भविष्यवाणी करने के लिए बुलाए गए थे। उनका संदेश इतिहास और उद्धार की योजना को आकार देता है।

क्रम नाम समय और राजा श्रोता आत्मिक भूमिका
1 एलिय्याह अहाब, अहज्याह इस्राएल का राज्य परमेश्वर की वाचा की ओर लौटने का आह्वान (1 राजा 18)
2 एलीशा यहोराम, येहू इस्राएल का राज्य चमत्कारों द्वारा परमेश्वर की सामर्थ दिखाना
3 योना यारोबाम द्वितीय नीनवे (अश्शूर) पश्चाताप का संदेश, अन्यजातियों पर परमेश्वर की दया
4 यशायाह उज्जियाह, हिजकिय्याह यहूदा मसीहा और उद्धार की भविष्यवाणी (यशायाह 53)
5 यिर्मयाह योशिय्याह, यहोयाकीम यहूदा बंधुआई से पहले पश्चाताप का आह्वान; नए वाचा की घोषणा

शालोम।


 

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यीशु के शिष्यों में 6 विशिष्ट गुण

 


 

ईसाई होना सिर्फ चर्च जाना या “ईसाई” कहे जाने तक सीमित नहीं है। सच्ची ईसाईयत का आधार है  मसीह की छवि में बदलना, और वह परिवर्तन शुरू होता है, जब हम उनके शिष्य बनने का निर्णय लेते हैं। यीशु के पहले शिष्यों ने हमें दिखाया कि सच्ची शिष्यता कैसी होती है। नीचे दिए गए छह गुण एक सच्चे शिष्य के हृदय और जीवन का परिचय हैं।

1. उन्होंने अपने «स्व‑स्वार्थ» को त्याग दिया

शिष्य बनने का अर्थ है  स्वयं स्थिर रहना नहीं, बल्कि स्वयं को त्याग देना। उन्होंने अपने आराम, अपनी इच्छाओं, अपनी महत्वाकांक्षाओं को छोड़ कर परमेश्वर की इच्छा को प्राथमिकता दी। (लूका 14:27; 9:23)
इस तरह का आत्म‑त्याग, रोज़ रोज़ “स्व‑प्राण त्याग” है  यानि हमारी प्राकृतिक इच्छाओं का त्याग और मसीह के लिए जीवित रहना। (रोमी 12:1; गलाती 2:20)

2. वे शिक्षार्थी बने रहे और वचन के अधीन रहे

एक सच्चा शिष्य हमेशा सीखने की तैयारी में रहता है। उन्होंने खुद को पूरी तरह यीशु के शिक्षण के अधीन रखा। आज भी, शिष्यता में आगे बढ़ने के लिए हमें पवित्र आत्मा द्वारा वचन (बाइबिल) के माध्यम से सिखने और सीखती समुदायों का हिस्सा बनने की ज़रूरत है। (यूहन्ना 14:26; 2 तीमुथियुस 3:16–17; प्रेरितों के काम 2:42)

3. उन्होंने सक्रिय रूप से यीशु का अनुसरण किया

शिष्यता केवल सुनने या समझने तक सीमित नहीं थी  वे हर जगह यीशु के पीछे चल पड़े। मिशन, सेवा, सुसमाचार प्रचार  वे सब उनका हिस्सा थे। (मत्ती 9:35; लूका 10:1–3; मत्ती 28:19–20)
शिष्यता का मतलब है  “सिखने” के साथ-साथ “करने” भी।

4. उन्होंने पूरी निष्ठा से प्रभु की आज्ञाओं का पालन किया

जहाँ कहीं भी आदेश मिले  चाहे वह प्रार्थना, उपासना, सेवा या कठिन आज्ञा हो  उन्होंने बिना रोके, बिना बैर के आज्ञा मानी। (यूहन्ना 14:15; लूका 9:45)
शिष्यता में आज्ञाकारिता विश्वास का प्रमाण है। (याकूब 2:17)

5. उन्होंने पूरे मन से यीशु पर भरोसा रखा

उनका विश्वास सतही या मौज‑मस्ती वाला नहीं था  वे यीशु के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। उन्होंने न सिर्फ देखा, बल्कि अनुभव किया कि यीशु कौन हैं और उनसे क्या उम्मीद करना चाहिए। (यूहन्ना 2:11; इब्रानियों 11:6; यूहन्ना 20:31)
निजी, गहरा विश्वास  यही शिष्यता की जड़ है।

6. उन्होंने दुख, प्रश्न, और परीक्षणों में भी धैर्य बनाए रखा

जब लोगों को यीशु की बातें समझ नहीं आईं, या वे असहज हुए  तब भी शिष्यों ने पीछे नहीं हटा। उन्होंने कहा  “प्रभु, हम किसके पास जाएँ? तेरे पास अनन्त जीवन के वचन हैं।” (यूहन्ना 6:67–68)
शिष्यता में स्थिरता, धैर्य और भरोसा  तब भी जब सब कुछ उलझा लगे। (इब्रानियों 10:36; याकूब 1:12; नीतिवचन 3:5–6)


निष्कर्ष  ईसाई होना == शिष्य होना

प्रारंभिक चर्च में, विश्वासी इसलिए “ईसाई” कहे गए, क्योंकि वे स्पष्ट रूप से मसीह के शिष्य थे  वे दिखते, सोचते, जीते और प्रेम करते थे जैसे यीशु करते थे। (प्रेरितों के काम 11:26)
ईसाईयत सिर्फ एक विचारधारा नहीं है  यह मसीह के साथ एक जीवित संबंध है, और वह संबंध हमें मसीह के समान बनाता है। (रोमी 8:29)
और यह रूपांतरण तभी संभव है, जब हम शिष्यता की दिग्गज यात्रा को अपनाते हैं  एक टिकी हुई, समर्पित, वचन‑आधारित और व्यवहारशील शिष्य की तरह।


प्रार्थना

हे प्रभु, हमें सच्चे शिष्य बनाएँ। हमें आत्म-त्याग, वचन के अधीनता, आपके पीछे चलने का साहस, आज्ञाकारिता, पूर्ण विश्वास और कठिनाइयों में भी धैर्य देने वाले बनाइए। हमें अपने पुत्र की छवि में ढालिए। आमीन।


अगर आप चाहें, तो मैं इसे और भी संक्षिप्त, अखबार या ब्लॉग‑शैली में लिख सकता हूँ  ताकि यह पढ़ने में आसान हो जाए और आँझ‑आँझ याद रह जाए।
क्या मैं वह रूप तैयार कर दूँ?

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लूका 17:10 को समझना — “हम निकम्मे दास हैं”

मुख्य पद: लूका 17:10

“उसी प्रकार तुम भी, जब सब कुछ जो तुम्हें आज्ञा दी गई है कर चुके हो, तो यह कहो, ‘हम निकम्मे दास हैं; हमने तो केवल अपना कर्तव्य किया है।’”


🔍 1. पृष्ठभूमि: विश्वास से जुड़ा प्रश्न

लूका 17 के आरम्भ में यीशु अपने चेलों को क्षमा के विषय में शिक्षा दे रहे थे। जब उन्होंने सुना कि दूसरों को बार-बार क्षमा करना चाहिए, तो चेलों ने प्रभु से कहा:

लूका 17:5

“प्रेरितों ने प्रभु से कहा, ‘हमारा विश्वास बढ़ा।’”

उन्हें लगा कि ऐसा जीवन जीने के लिए अधिक विश्वास चाहिए। उनके मन में यह धारणा थी कि बड़े कार्यों के लिए बड़ा विश्वास आवश्यक है।

परन्तु यीशु ने उत्तर में कुछ ऐसा कहा जिसने उनकी सोच बदल दी:

लूका 17:6

“प्रभु ने कहा, ‘यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी होता, तो तुम इस गूलर के पेड़ से कहते कि उखड़कर समुद्र में लग जा, और वह तुम्हारी बात मान लेता।’”

✨ इससे स्पष्ट होता है कि विश्वास का प्रश्न उसकी मात्रा का नहीं, बल्कि उसकी सच्चाई और जीवंतता का है।
थोड़ा-सा भी सच्चा विश्वास, जब पूरी तरह परमेश्वर पर निर्भर होता है, तो सामर्थी होता है।
विश्वास केवल और अधिक माँगने से नहीं बढ़ता—वह आज्ञाकारिता और नम्र सेवा के द्वारा बढ़ता है।


👣 2. दास का दृष्टान्त (लूका 17:7–9)

इसके बाद यीशु ने एक दृष्टान्त सुनाया:

लूका 17:7–9

“तुम में से कौन है, जिसके पास हल जोतने या भेड़ें चराने वाला दास हो, और वह खेत से आने पर उससे कहे, ‘आ, भोजन करने बैठ जा’?
क्या वह उससे यह न कहेगा, ‘मेरा भोजन तैयार कर, और कमर बाँधकर जब तक मैं खाऊँ-पीऊँ, तब तक मेरी सेवा कर; इसके बाद तू खा-पी लेना’?
क्या वह दास का धन्यवाद करता है, क्योंकि उसने वही किया जो उसे आज्ञा दी गई थी?”

इस दृष्टान्त के द्वारा यीशु यह दिखाते हैं कि दास और स्वामी के बीच संबंध कैसे होता है।
दास केवल अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए धन्यवाद या प्रशंसा की अपेक्षा नहीं करता।
वह सेवा कर्तव्य के कारण करता है, न कि प्रशंसा या लाभ के लिए।


🔑 3. मुख्य शिक्षा — “हम निकम्मे दास हैं” (पद 10)

लूका 17:10

“उसी प्रकार तुम भी, जब सब कुछ जो तुम्हें आज्ञा दी गई है कर चुके हो, तो यह कहो, ‘हम निकम्मे दास हैं; हमने तो केवल अपना कर्तव्य किया है।’”

यहाँ यीशु एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आत्मिक सिद्धान्त सिखाते हैं:

👉 सच्चे चेले अधिकार की भावना के बिना परमेश्वर की सेवा करते हैं।


📖 बाइबलीय शिक्षा का अर्थ

A. अनुग्रह और कर्म

हम परमेश्वर की सेवा इसलिए नहीं करते कि उसका अनुग्रह या आशीष कमा सकें।
उद्धार, विश्वास और जो कुछ भी हमें मिलता है—सब अनुग्रह से है, न कि हमारे कर्मों से।

इफिसियों 2:8–9

“क्योंकि अनुग्रह ही से तुम विश्वास के द्वारा उद्धार पाए हो; और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है।
और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।”

लूका 17:10 हमें यह सिखाता है कि यदि हम पूरी तरह आज्ञाकारी भी हों, तब भी हमने कुछ नहीं कमाया।
हमने केवल वही किया जो हमें करना चाहिए था।
यह शिक्षा आत्मिक घमण्ड की जड़ को काट देती है।


B. परमेश्वर के राज्य में सेवकाई

यीशु अपने अनुयायियों को ऊँचा पद या पहचान खोजने के लिए नहीं, बल्कि नम्र होकर सेवा करने के लिए बुलाते हैं।

मरकुस 10:45

“क्योंकि मनुष्य का पुत्र सेवा करवाने नहीं, परन्तु सेवा करने और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपना प्राण देने आया है।”

परमेश्वर के राज्य में महानता का माप पद नहीं, बल्कि त्याग और सेवा है।


🧠 आज के समय में इसका महत्व

आज बहुत-से विश्वासी परमेश्वर की सेवा करते-करते थक जाते हैं—विशेषकर तब, जब उन्हें कोई पहचान, प्रशंसा या तुरन्त आशीष नहीं दिखती।
कुछ लोग तब सेवा छोड़ देते हैं, जब जीवन कठिन बना रहता है या उत्तर देर से मिलते हैं।

परन्तु यीशु हमें परिपक्व विश्वास की ओर बुलाते हैं—
ऐसा विश्वास जो परिणाम दिखें या न दिखें, फिर भी परमेश्वर की सेवा करता रहता है।

यदि आपने वर्षों तक प्रचार किया और कोई स्पष्ट फल न दिखे,
या आपने त्यागपूर्वक दिया और फिर भी संघर्ष बना रहे—तो हार न मानिए।
परमेश्वर सब कुछ देखता है, सब कुछ स्मरण रखता है, और उसका समय सर्वोत्तम है।

इब्रानियों 6:10

“क्योंकि परमेश्वर अन्यायी नहीं कि तुम्हारे काम और उस प्रेम को भूल जाए जो तुम ने उसके नाम के लिये दिखाया है, क्योंकि तुम ने पवित्र लोगों की सेवा की और कर रहे हो।”


🙏 आह्वान: एक नम्र दास बनें

आइए हम यीशु के वचनों को अपने हृदय में उतारें और कहें:
“प्रभु, मैं प्रतिफल के लिए नहीं, बल्कि इसलिए सेवा करता हूँ क्योंकि तू योग्य है।”

वह हमें आज आशीष दे या कल—
हमारी पहचान इस बात में नहीं कि हमें क्या मिला, बल्कि इस बात में है कि हम किसके हैं।

रोमियों 14:8

“क्योंकि यदि हम जीवित हैं, तो प्रभु के लिये जीवित हैं; और यदि मरते हैं, तो प्रभु के लिये मरते हैं; इसलिये चाहे हम जीवित रहें या मरें, हम प्रभु ही के हैं।”


✅ निष्कर्ष

  • विश्वास बढ़ाने के लिए और माँगते न रहें—जो थोड़ा विश्वास है, उसे आज्ञाकारिता में उपयोग करें
  • सेवा प्रतिफल की आशा से नहीं, बल्कि इस समझ के साथ करें कि राजा की सेवा करना सौभाग्य है
  • सच्चा विश्वास नम्र आज्ञाकारिता में प्रकट होता है।
  • आत्मिक सामर्थ्य का मार्ग नम्र और निःस्वार्थ सेवकाई से होकर जाता है।

लूका 17:10

“हम निकम्मे दास हैं; हमने तो केवल अपना कर्तव्य किया है।”

और फिर भी—परमेश्वर अपने महान अनुग्रह में—
उस सेवा का भी प्रतिफल देता है, जिसके हम योग्य नहीं थे।

शलोम।

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भजन संहिता 48:14 को समझना – “वह हमारा मार्गदर्शक होगा”

भजन संहिता 48:14

“क्योंकि यही परमेश्वर हमारा परमेश्वर है सदा सर्वदा के लिये;
वह मृत्यु तक हमारा अगुवा रहेगा।”

भजन संहिता 48:14 परमेश्वर की वाचा-निष्ठा और उसके अपरिवर्तनीय स्वभाव की एक सशक्त घोषणा है। भजनकार यह स्पष्ट करता है कि इस्राएल का परमेश्वर केवल अतीत में कार्य करने वाला कोई ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं है, बल्कि वह अनन्त परमेश्वर है जो आज भी और सदा-सर्वदा अपने लोगों का मार्गदर्शन करता रहता है।

जब भजन में कहा गया है, “वह मृत्यु तक हमारा अगुवा रहेगा,” तो यह एक गहरी आत्मिक सच्चाई को प्रकट करता है: परमेश्वर अपने लोगों की जीवन-यात्रा में व्यक्तिगत रूप से सम्मिलित रहता है। उसका मार्गदर्शन आत्मिक दिशा, सुरक्षा, बुद्धि, सुधार और आवश्यकताओं की पूर्ति—सब कुछ सम्मिलित करता है।


1. अपने लोगों के प्रति परमेश्वर की अनन्त प्रतिबद्धता

भजनकार “यही परमेश्वर” कहता है—वही परमेश्वर जिसने अपने आप को अब्राहम, इसहाक और याकूब पर प्रकट किया; वही जिसने इस्राएल को मिस्र से छुड़ाया। यह कोई नया या दूर का देवता नहीं है, बल्कि वही वाचा निभाने वाला परमेश्वर है जो सदा से अपने लोगों के साथ चलता आया है। वाचा के धर्मशास्त्र में परमेश्वर की उपस्थिति की यह निरन्तरता अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

इब्रानियों 13:8
“यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक सा है।”

यह पद दिखाता है कि परमेश्वर का स्वभाव और उसकी प्रतिबद्धता कभी नहीं बदलती। वह सदा विश्वासयोग्य है।


2. जीवन के हर क्षेत्र में परमेश्वर का मार्गदर्शन

परमेश्वर का मार्गदर्शन केवल धार्मिक या आत्मिक बातों तक सीमित नहीं है। वह जीवन के हर मौसम में हमारे साथ चलने का वादा करता है—चाहे वह रेगिस्तान का समय हो या विजय का, उलझन हो या स्पष्टता का। वह हमारा मार्गदर्शन करता है:

  • जीवन के निर्णयों में (नीतिवचन 3:5–6)
  • युद्धों और परीक्षाओं के बीच (निर्गमन 14:14)
  • आत्मिक वृद्धि और धार्मिकता की ओर (भजन संहिता 23:3)

भजन संहिता 32:8
“मैं तुझे बुद्धि दूँगा, और जिस मार्ग में तुझे चलना होगा उसमें तेरी अगुवाई करूँगा;
मैं तुझ पर दृष्टि रखकर सम्मति देता रहूँगा।”


3. ऐतिहासिक उदाहरण: इस्राएल के लिए परमेश्वर का मार्गदर्शन

निर्गमन के समय परमेश्वर का मार्गदर्शन अत्यन्त स्पष्ट रूप से दिखाई देता है:

  • दिन में बादल का खम्भा और रात में आग का खम्भा (निर्गमन 13:21)
  • स्वर्गदूतों के द्वारा सुरक्षा (निर्गमन 23:20)
  • मूसा, न्यायी, राजा और भविष्यद्वक्ता, जिन्हें लोगों की अगुवाई के लिये खड़ा किया गया

ये सभी बातें दिखाती हैं कि परमेश्वर दूर से नहीं, बल्कि निकट सम्बन्ध में रहकर अपने लोगों का नेतृत्व करता है।


4. मसीह और पवित्र आत्मा में इसकी पूर्णता

अन्ततः परमेश्वर की मार्गदर्शक उपस्थिति यीशु मसीह में पूर्ण रूप से प्रकट हुई। यीशु केवल उद्धार करने ही नहीं, बल्कि अगुवाई करने भी आए। और जब वह स्वर्गारोहण कर गया, तब उसने हमें अनाथ नहीं छोड़ा:

यूहन्ना 16:13
“परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सारी सच्चाई में ले चलेगा; क्योंकि वह अपनी ओर से न बोलेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा वही बोलेगा, और आने वाली बातें तुम्हें बताएगा।”

आज भी पवित्र आत्मा के द्वारा विश्वासी अपने जीवन में परमेश्वर के व्यक्तिगत मार्गदर्शन का अनुभव करते हैं। आत्मा हमें सत्य में ले चलता है, पाप के विषय में समझ देता है, और परमेश्वर की इच्छा को पहचानने में हमारी सहायता करता है।


परमेश्वर के मार्गदर्शन में दृढ़ विश्वास

भजन संहिता 48:14 केवल एक काव्यात्मक पंक्ति नहीं है—यह एक गहरी आत्मिक और धर्मशास्त्रीय नींव है। हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं, “वह हमारा मार्गदर्शक होगा,” क्योंकि:

  • वह इतिहास में विश्वासयोग्य रहा है
  • वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा आज भी सक्रिय रूप से उपस्थित है
  • वह हमें थोड़े समय के लिये नहीं, बल्कि “मृत्यु तक”—जीवन, मृत्यु और अनन्तकाल तक मार्गदर्शन करेगा

रोमियों 8:14
“क्योंकि जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे परमेश्वर के पुत्र हैं।”

यही वह विश्वास है जो हर विश्वासी के हृदय में शान्ति और आश्वासन भर देता है। परमेश्वर केवल हमारे साथ आरम्भ ही नहीं करता—वह हमें अन्त तक विश्वासयोग्य रीति से साथ लेकर चलता है।

प्रभु आपको हर दिन उसके मार्गदर्शन पर भरोसा रखने में आशीष दे।

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“गरीब की बुद्धि तुच्छ समझी जाती है” (सभोपदेशक 9:16) — इसका क्या अर्थ है?

प्रश्न:

सभोपदेशक 9:16 में लिखा है:

“तब मैंने कहा: बुद्धि बल से श्रेष्ठ है, तौभी उस गरीब की बुद्धि तुच्छ मानी जाती है, और उसके वचन नहीं माने जाते।”
सभोपदेशक 9:16 (ERV-Hindi)

क्या इसका यह मतलब है कि हमें गरीब या प्रभावहीन लोगों की सलाह को नहीं सुनना चाहिए? हमें इस पद को किस प्रकार समझना चाहिए?


उत्तर:

आइए पहले इस पद के पूरे संदर्भ को देखें, जो सभोपदेशक 9:13–16 में वर्णित है:

“मैंने सूर्य के नीचे एक और बुद्धि की बात देखी, जो मेरे विचार में बड़ी है:
एक छोटा सा नगर था जिसमें थोड़े ही पुरुष रहते थे। एक बड़ा राजा उसके विरुद्ध आया, और उसको घेर लिया, और उसके विरुद्ध बड़े-बड़े मोर्चे बाँध दिए।
तब उस नगर में एक गरीब, परंतु बुद्धिमान मनुष्य पाया गया, जिसने अपनी बुद्धि से उस नगर को बचा लिया; तौभी उस गरीब पुरुष को कोई स्मरण न करता था।
तब मैंने कहा: बुद्धि बल से उत्तम है, तौभी उस गरीब की बुद्धि तुच्छ मानी जाती है, और उसके वचन नहीं माने जाते।”
सभोपदेशक 9:13–16

यह कहानी एक कड़वी सच्चाई को दर्शाती है: एक गरीब व्यक्ति के पास इतनी बुद्धि थी कि वह पूरे नगर को बचा सकता था, फिर भी लोग उसे शीघ्र भूल गए और उसकी बातों को अनसुना कर दिया।

सुलैमान इस अन्याय पर विचार करता है — यह कहने के लिए नहीं कि गरीब लोग सम्मान के योग्य नहीं हैं, बल्कि यह दिखाने के लिए कि संसार अक्सर ऐसे लोगों की उपेक्षा करता है जिनके पास धन, पद या प्रभाव नहीं है, चाहे उनके पास कितनी ही बुद्धि क्यों न हो।


आध्यात्मिक विचार:

बाइबल बार-बार सिखाती है कि परमेश्वर धन या सामाजिक स्थिति नहीं, बल्कि बुद्धि और भक्ति को महत्व देता है।

“यहोवा का भय मानना बुद्धि का प्रारंभ है।”
नीतिवचन 9:10

सच्ची बुद्धि परमेश्वर के साथ सही संबंध से उत्पन्न होती है — न कि डिग्रियों या आर्थिक सफलता से।

याकूब 2:5 में प्रेरित याकूब मण्डली को चेतावनी देते हुए कहता है:

“हे मेरे प्रिय भाइयो, सुनो: क्या परमेश्वर ने इस संसार के गरीबों को नहीं चुना कि वे विश्वास में धनवान बनें और उस राज्य के वारिस हों, जो उसने अपने प्रेम रखने वालों से वादा किया है?”
याकूब 2:5

स्पष्ट है कि बाइबल यह स्वीकार करती है कि गरीब लोग आत्मिक रूप से समृद्ध और अत्यधिक बुद्धिमान हो सकते हैं।

सभोपदेशक में समस्या गरीबों की बुद्धि की कमी नहीं है, बल्कि यह कि मनुष्य अक्सर ऐसी बुद्धि को पहचानने और उसका सम्मान करने में असफल रहता है।

सुलैमान का मुख्य संदेश यह है: बुद्धि बल से श्रेष्ठ है, लेकिन संसार अकसर बाहरी दिखावे, शक्ति और धन को ईश्वरीय बुद्धि से अधिक महत्व देता है। यह सोच मसीहियों में नहीं होनी चाहिए।


व्यवहारिक शिक्षा:

  • किसी की बुद्धि का मूल्यांकन उसके रूप, धन या शिक्षा के आधार पर न करें।
  • विनम्र बनें और दूसरों की सलाह सुनने के लिए तैयार रहें, भले ही वह सलाह किसी ऐसे व्यक्ति से आए जिसे संसार महत्व नहीं देता।
  • कई बार सबसे मूल्यवान बातें उन लोगों के मुख से निकलती हैं जो सबसे अधिक शांत और गुमनाम होते हैं।

सभोपदेशक 4:13 में भी लिखा है:

“एक गरीब और बुद्धिमान लड़का उस बूढ़े और मूर्ख राजा से अच्छा है जो अब चेतावनी को नहीं मानता।”
सभोपदेशक 4:13

परमेश्वर की दृष्टि में महत्त्व इस बात का नहीं कि आपकी आवाज़ कितनी ऊँची है या आपकी पदवी क्या है — बल्कि इस बात का है कि आपका चरित्र और आपकी बुद्धि धर्मपरायणता में आधारित है या नहीं।


अंतिम विचार:

सभोपदेशक 9:16 की सच्चाई यह नहीं है कि हमें गरीबों को अनदेखा करना चाहिए, बल्कि यह कि हमें अपने गर्व और पक्षपात से लड़ना चाहिए — क्योंकि वही हमें ऐसा करने के लिए प्रेरित करते हैं।

आइए हम ऐसे लोग बनें जो बुद्धि को वहां भी पहचानें जहां दुनिया नहीं देखती, और जो उन विनम्र आवाज़ों का भी सम्मान करें जिनके द्वारा परमेश्वर अकसर सत्य प्रकट करता है।

प्रभु हमें ऐसी विनम्रता दें कि हम हर उस आवाज़ को सुनने के लिए तैयार रहें जिसके द्वारा वह हमें सिखाना चाहता है — चाहे वह किसी भी अप्रत्याशित स्थान से क्यों न आए।


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उद्योग 10:15 का क्या अर्थ है?

 10:15
“मूर्खों की मेहनत उन्हें थका देती है, क्योंकि वे शहर का रास्ता नहीं जानते।”

यह छोटा सा श्लोक पहली नजर में मज़ाकिया लग सकता है — लेकिन वास्तव में यह जीवन, मेहनत और उद्देश्य पर गहरी सोच है। बाइबल कह रही है कि मूर्ख मेहनत तो करते हैं, लेकिन बिना दिशा के। उनकी मेहनत से वे थक जाते हैं क्योंकि वे अपने लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता ही नहीं जानते। यह ऐसा है जैसे आप कई सालों तक एक शहर की ओर चलते रहें, और बाद में पता चले कि आप पूरी तरह गलत दिशा में जा रहे थे।

व्यावहारिक रूप से, कई लोग जीवन में सफलता, धन या आराम के पीछे भागते हैं। मेहनत या महत्वाकांक्षा में कोई बुराई नहीं है — नीतिवचन में मेहनत की प्रशंसा की गई है:

नीतिवचन 13:4
“परिश्रमी की आत्मा तृप्त हो जाती है, परन्तु अधीर व्यक्ति को अभाव होगा।”

लेकिन उद्योग हमें चेतावनी देता है कि यदि आपके जीवन में बुद्धि और उद्देश्य का अभाव है, तो आपकी मेहनत थका देने वाली और निरर्थक हो जाती है। यह सिर्फ मेहनत करने की बात नहीं है; बल्कि यह जानने की बात है कि आप कहां जा रहे हैं।


श्लोक के पीछे आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है। मसीही विश्वासियों के लिए “शहर” हमारे शाश्वत गंतव्य – नए यरूशलेम का प्रतीक है। यह वह जगह है जिसे परमेश्वर ने हमारे लिए तैयार किया है, जो प्रेरितोद्घोषणा (प्रकाशित वाक्य) में सुंदरता से वर्णित है।

प्रकाशित वाक्य 21:2-3
“और मैंने पवित्र नगर, नया यरूशलेम, परमेश्वर के पास से स्वर्ग से नीचे आता हुआ देखा… और मैंने सिंहासन से एक बड़ी आवाज़ सुनी जो कह रही थी: ‘देखो! परमेश्वर का निवास अब मनुष्यों के बीच है।’”

जैसे जीवन में बिना लक्ष्य के काम करना थकाने वाला होता है, वैसे ही आध्यात्मिक रूप से भी बिना अपने गंतव्य को जाने चलना कठिन है। कई लोग धार्मिक गतिविधियों, उदारता, और नैतिकता से भरे जीवन जीते हैं, लेकिन मसीह के साथ व्यक्तिगत संबंध से वंचित हैं। वे चल तो रहे हैं, लेकिन उस शहर की ओर नहीं।

केवल यीशु ही मार्ग हैं।

यूहन्ना 14:6
“मैं मार्ग और सत्य और जीवन हूँ; कोई पिता के पास मुझसे बिना नहीं आता।”

यीशु के बिना हमारी कोशिशें, अच्छे कर्म, या आध्यात्मिक अभ्यास उस शहर की ओर जाने जैसी होती हैं, जिसे हम खुद नहीं पा सकते। इसलिए मसीह में विश्वास द्वारा मुक्ति आवश्यक है। वह केवल हमें मार्ग नहीं दिखाते — वह स्वयं मार्ग हैं।


यह शहर कौन प्रवेश करेगा?

प्रकाशित वाक्य 22:14-15
“धन्य हैं वे जो अपने वस्त्र धोते हैं, ताकि वे जीवन के वृक्ष के अधिकारी बनें और शहर के द्वारों से होकर अंदर जाएँ। परन्तु बाहर कुत्ते, जादूगर, व्यभिचारी… हैं।”

यह स्पष्ट रूप से बताता है कि शहर में प्रवेश केवल उन्हीं को है जो मसीह की धार्मिकता द्वारा शुद्ध हुए हैं। यह इस बात पर निर्भर नहीं कि आपने कितना मेहनत किया, बल्कि कि आपका नाम मेमने की जीवन पुस्तक में लिखा है या नहीं।

प्रकाशित वाक्य 21:27
“और जो कोई अपवित्र है और जो झूठ बोलता है, वह उस नगर में नहीं जाएगा।”


इब्राहीम का विश्वास: एक दिव्य दृष्टि

विश्वास के पिता इब्राहीम ने इसे समझा। वे केवल इस संसार के लिए नहीं जीते थे।

इब्रानियों 11:10
“क्योंकि वह उस नगर की प्रतीक्षा कर रहा था जिसकी नींव परमेश्वर है, जो उसका निर्माता और शिल्पकार है।”

जबकि वह धनवान और धन्य था, वह एक यात्री की तरह जीवित था, क्योंकि वह जानता था कि उसका असली घर परमेश्वर के पास है।


निष्कर्ष: मार्ग जानो और उसका अनुसरण करो

यदि तुम मसीह को नहीं जानते, तो तुम उद्योग 10:15 के मूर्ख जैसे हो — थके हुए, व्यस्त, और बिना दिशा के। तुम्हारी मेहनत बाहर से प्रभावशाली लग सकती है, लेकिन आध्यात्मिक रूप से वह कहीं नहीं ले जाती। लेकिन यदि तुम मसीह का अनुसरण करते हो, तो तुम्हारा काम अनन्त अर्थ प्राप्त करता है।

यीशु के साथ तुम्हारा जीवन उद्देश्यपूर्ण है। तुम एक वास्तविक गंतव्य की ओर बढ़ रहे हो। हर त्याग, हर प्रेम का काम, हर संघर्ष अनन्त जीवन में निवेश है।

2 कुरिन्थियों 4:17
“क्योंकि हमारी हल्की और क्षणिक आघातें हमारे लिए अपार और अनन्त महिमा तैयार कर रही हैं।”

तो सवाल यह है:

क्या तुम उस शहर का रास्ता जानते हो?

यीशु तुम्हें बुला रहे हैं। उनका अनुसरण करो — और तुम्हारा श्रम व्यर्थ नहीं होगा।

ईश्वर तुम्हें आशीर्वाद दे।


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“मैंने यह निश्चय किया था कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह और वह भी क्रूस पर चढ़ाया हुआ छोड़ और कुछ न जानूं।” (1 कुरिन्थियों 2:2)

आइए हम इस महत्वपूर्ण वचन पर ध्यान लगाएं।

1 कुरिन्थियों 2:2 में पौलुस लिखता है:

“मैंने यह निश्चय किया था कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह और वह भी क्रूस पर चढ़ाया हुआ छोड़ और कुछ न जानूं।”
(1 कुरिन्थियों 2:2, ERV-Hindi)

पौलुस ने कुरिन्थुस की कलीसिया को यह बताते हुए लिखा कि जब वह उनके बीच आया, तो उसका मुख्य उद्देश्य सिर्फ एक ही बात थी — यीशु मसीह और विशेष रूप से उसका क्रूस पर चढ़ाया जाना। सरल शब्दों में कहें तो पौलुस का कहना था:

“जब मैं तुम्हारे पास आया, तो मैंने यह ठान लिया था कि तुम्हारे साथ किसी भी बात में गहराई से नहीं जाऊँगा—सिवाय इसके कि तुम यीशु मसीह को जानो, और वह भी क्रूस पर चढ़ाया गया।”

यह ध्यान “यीशु मसीह और वह क्रूसित” पर, मसीही विश्वास के केंद्र को दर्शाता है। मसीह का क्रूस पर चढ़ाया जाना केवल ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि यह सुसमाचार का केंद्र है—जिसे पौलुस अन्यत्र इस प्रकार लिखता है:

“जो लोग नाश हो रहे हैं उनके लिये तो मसीह का क्रूस मूर्खता है, परन्तु जो उद्धार पा रहे हैं उनके लिये वह परमेश्वर की शक्ति है।”
(1 कुरिन्थियों 1:18, ERV-Hindi)

पौलुस चाहता था कि कुरिन्थियों को सुसमाचार की सच्चाई स्पष्ट रूप से समझ में आए — बिना किसी दार्शनिक विवाद या मानवीय ज्ञान की बाधा के।


क्यों “क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह” पर ध्यान देना ज़रूरी है?

क्योंकि सच्चा मसीही विश्वास इसी पर आधारित है — यह पहचानने पर कि यीशु हमारे पापों के लिए क्रूस पर मरा।

“मसीह हमारे पापों के लिये मरा, जैसा पवित्र शास्त्रों में लिखा है।”
(1 कुरिन्थियों 15:3, ERV-Hindi)

यदि विश्वास किसी और बात पर आधारित हो — जैसे कि चमत्कार, मानव ज्ञान, या वाकपटुता — तो वह कमजोर और अधूरा होता है।

पौलुस ने और भी स्पष्ट किया:

“भाइयों, जब मैं तुम्हारे पास आया तो मैं परमेश्वर के रहस्य को सुनाने में बड़ी वाकपटुता या बुद्धि का प्रयोग करके नहीं आया। मैं यह ठान चुका था कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह और वह भी क्रूस पर चढ़ाया हुआ छोड़ और कुछ न जानूं।”
(1 कुरिन्थियों 2:1-2, ERV-Hindi)

यह पौलुस की उस नीयत को दर्शाता है जिसमें वह संसार की बुद्धि को त्यागकर सुसमाचार की सरल लेकिन गहरी सच्चाई पर केन्द्रित रहा।


चमत्कारों में विश्वास बनाम क्रूसित उद्धारकर्ता में विश्वास

यदि कुरिन्थियों का विश्वास केवल चिन्हों और चमत्कारों पर आधारित होता, तो वह केवल बाहरी प्रमाणों पर निर्भर होता और सतही होता। यीशु ने स्वयं ऐसे विश्वास के प्रति चेतावनी दी थी:

“मैं तुमसे सच कहता हूँ, तुम इसलिए मेरी खोज नहीं कर रहे हो कि तुमने आश्चर्य कर्म देखे, बल्कि इसलिए कि तुमने रोटियाँ खाईं और तृप्त हुए।”
(यूहन्ना 6:26, ERV-Hindi)

सच्चा विश्वास यीशु पर केंद्रित होता है — जो क्रूसित हुआ और मृतकों में से जी उठा। यह विश्वास पश्चाताप और जीवन-परिवर्तन की ओर ले जाता है।


क्रूसित उद्धारकर्ता को समझने का प्रभाव

ऐसा विश्वास स्थिर और जीवन को बदलने वाला होता है। यह पश्चाताप की ओर ले जाता है और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की लालसा जगाता है। यही आज्ञाकारिता सच्चे विश्वास का चिन्ह है और अंततः अनंत जीवन का मार्ग खोलती है।

यीशु कहता है:

“हर कोई जो मुझसे कहता है, ‘हे प्रभु, हे प्रभु!’ स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा; परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुत लोग मुझसे कहेंगे, ‘हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की? और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला? और तेरे नाम से बहुत से चमत्कार नहीं किये?’ तब मैं उनसे स्पष्ट कह दूँगा, ‘मैंने तुम्हें कभी नहीं जाना। मेरे पास से चले जाओ, तुम अधर्म करनेवालों।’”
(मत्ती 7:21–23, ERV-Hindi)


आज के लिए हमारे जीवन में इसका अर्थ

हमारे लिए सबसे ज़रूरी बात है कि हम इस मूल और केंद्रीय विश्वास पर टिके रहें — उस “मूल-विश्वास” पर, जो यीशु मसीह, क्रूस पर चढ़ाए गए उद्धारकर्ता, पर आधारित है। यही विश्वास हमें पवित्र करता है और पाप से बचाए रखता है।

“जो कोई उसमें यह आशा रखता है, वह अपने आप को उसी की तरह पवित्र करता है, क्योंकि वह पवित्र है।”
(1 यूहन्ना 3:3, ERV-Hindi)

यह विश्वास हमें ऐसा जीवन जीने की ओर प्रेरित करता है जो परमेश्वर को भाता है।


प्रार्थना

प्रभु हमारी सहायता करे कि हम इस विश्वास पर अडिग रहें — और हमें भरपूर आशीष दे।


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पवित्र विवाह: एक पुरुष, एक स्त्री

ईश्वर की विवाह के लिए योजना

प्रारंभ से ही, परमेश्वर की योजना विवाह के लिए स्पष्ट रही है: एक पुरुष और एक स्त्री, जो एक वाचा में प्रेम से बंधे हों। यह केवल एक सांस्कृतिक आदर्श नहीं, बल्कि सृष्टि में निहित एक गहन धार्मिक सच्चाई है।

उत्पत्ति 1:27
“तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार उसको उत्पन्न किया; नर और नारी कर के उसने उन्हें उत्पन्न किया।”

मत्ती 19:4–6
“यीशु ने उत्तर दिया, ‘क्या तुम ने नहीं पढ़ा, कि सृष्टि के आदि में उन्हें नर और नारी बना कर कहा, कि इस कारण पुरुष अपने माता-पिता से अलग होकर अपनी पत्नी के साथ रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे? इसलिये अब वे दो नहीं, परन्तु एक तन हैं। इसलिये जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे।'”

यीशु ने यह स्पष्ट किया कि परमेश्वर की आदर्श योजना अब भी वही है: एक पुरुष और एक स्त्री का पवित्र मिलन। विवाह को कभी भी बहुविवाह या बिना बाइबिलिक आधार पर बार-बार विवाह करने के लिए नहीं बनाया गया।


बहुविवाह और क्रमिक विवाह: परमेश्वर की इच्छा से बाहर

यह सत्य है कि दाऊद और सुलैमान जैसे कुछ बाइबिल पात्रों के अनेक पत्नियाँ थीं, लेकिन यह परमेश्वर की स्वीकृति नहीं थी। इसके नकारात्मक परिणाम स्पष्ट रूप से बाइबिल में लिखे गए हैं।

1 राजा 11:1–4
“राजा सुलैमान ने बहुत सी परदेशी स्त्रियों से प्रीति की… उसकी सात सौ रानियाँ और तीन सौ उपपत्‍नियाँ थीं, और उसकी स्त्रियों ने उसका मन बहका दिया।”

परमेश्वर ने इसे अपने अनुमत्यात्मक (permissive) इच्छा में सहन किया, लेकिन यह उसकी पूर्ण (perfect) इच्छा नहीं थी। केवल बाइबिल में किसी चीज़ का वर्णन होना, यह प्रमाण नहीं है कि वह परमेश्वर की मंजूरी थी।

यहाँ तक कि राजाओं के लिए भी परमेश्वर की आज्ञा स्पष्ट थी:

व्यवस्थाविवरण 17:17
“वह बहुत सी पत्नियाँ न रखे, ऐसा न हो कि उसका मन फिर जाए…”

प्राचीन या आधुनिक — बहुविवाह लोगों को परमेश्वर से दूर ले जाता है।


शमरोन की स्त्री: सच्चे विवाह का सबक

यूहन्ना 4 में यीशु एक स्त्री से मिलते हैं जो कई संबंधों में रह चुकी थी। यीशु ने उसे नीचा दिखाया नहीं, बल्कि सत्य की ओर प्रेमपूर्वक बुलाया:

यूहन्ना 4:16–18
“यीशु ने उससे कहा, ‘जा, अपने पति को बुलाकर यहाँ आ।’ स्त्री ने उत्तर दिया, ‘मेरे पास कोई पति नहीं है।’ यीशु ने कहा, ‘तू ने ठीक कहा कि मेरे पास पति नहीं है। क्योंकि तेरे पाँच पति हो चुके हैं, और जो अब तेरे साथ है, वह तेरा पति नहीं है; तू ने यह बात सच्ची कही।'”

यीशु ने उसे “पति” (एकवचन) कहा — यह दिखाता है कि परमेश्वर की दृष्टि में विवाह एक ही सच्चे संबंध में होता है — वह भी एक पुरुष और एक स्त्री के बीच।


विवाह: मसीह और कलीसिया का प्रतिबिंब

विवाह केवल संगी-साथी या संतानोत्पत्ति के लिए नहीं है — यह मसीह और कलीसिया के रिश्ते का जीवंत प्रतीक है।

इफिसियों 5:31–32
“‘इस कारण मनुष्य अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे।’ यह भेद तो बड़ा है, पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूँ।”

मसीह की केवल एक दुल्हन है — कलीसिया। उसी तरह मसीही विवाह को उस आत्मिक सच्चाई को दर्शाना चाहिए: एक पति, एक पत्नी, एकता और पवित्रता में।


क्रमिक विवाह के विषय में क्या?

आज बहुत से लोग मानते हैं कि कानूनी रूप से बार-बार विवाह करना गलत नहीं है। लेकिन बाइबिल के अनुसार, यदि बिना बाइबिल आधारित कारण (जैसे व्यभिचार या अविश्वासी जीवनसाथी द्वारा त्याग) पुनर्विवाह किया जाए, तो वह व्यभिचार (adultery) माना जाता है।

लूका 16:18
“जो कोई अपनी पत्नी को त्यागकर दूसरी से विवाह करता है, वह व्यभिचार करता है; और जो त्यागी हुई से विवाह करता है, वह भी व्यभिचार करता है।”

यीशु ने शमरोन की स्त्री को ‘तेरे पाँच पति हुए हैं’ कहा — उसने कई रिश्ते निभाए, पर वे परमेश्वर की दृष्टि में वैध विवाह नहीं थे।


जीवन जल की कीमत

बहुविवाह और बिना पश्चाताप के किए गए विवाह संबंध हमारे प्रभु यीशु — जो जीवित जल देते हैं — के साथ हमारे रिश्ते में बाधा बन सकते हैं।

यूहन्ना 4:13–14
“यीशु ने उत्तर दिया, ‘जो कोई इस जल को पीता है, वह फिर प्यासा होगा; पर जो कोई उस जल को पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर कभी प्यासा न होगा, बल्कि जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा, जो अनन्त जीवन के लिए उमड़ता रहेगा।'”

इस जल को पाने के लिए हमें ईमानदारी और पश्चाताप के साथ यीशु के पास आना होगा — अपने रिश्तों सहित जीवन के हर हिस्से को समर्पित करते हुए।


मसीह में आशा और चंगाई

यदि आप स्वयं को किसी बहुविवाह या गैर-बाइबिलिक वैवाहिक स्थिति में पाते हैं, तो जान लें — यीशु आपको दोष नहीं देते, बल्कि नये जीवन के लिए बुलाते हैं:

यूहन्ना 8:11
“यीशु ने कहा, ‘मैं भी तुझे दोष नहीं देता; जा, और अब से पाप मत कर।'”

पश्चाताप के द्वारा अनुग्रह उपलब्ध है, और जब हम उसकी आज्ञाओं के अनुसार चलते हैं, तो परमेश्वर बहाली प्रदान करता है।


अनन्त विवाह भोज

जो लोग आत्मिक और वैवाहिक रूप से परमेश्वर की इच्छा में बने रहते हैं, वे उस अनन्त विवाह भोज में आमंत्रित हैं:

प्रकाशितवाक्य 22:1–5
“फिर उसने मुझे जीवन के जल की नदी दिखाई, जो स्वच्छ और क्रिस्टल के समान चमकीली थी, और परमेश्वर और मेम्ने के सिंहासन से निकल रही थी… और वे युगानुयुग राज्य करेंगे।”

आइए हम अपने जीवन को इस तरह से जिएँ कि हम उस महिमा के दिन के लिए तैयार रहें।


प्रार्थना

प्रभु यीशु की कृपा हम पर बनी रहे — हमें ढाँक ले, सुधार करे, और अपनी पवित्र सच्चाई में चलना सिखाए। आमीन।


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क्या फ़रिश्ते संतान पैदा करते हैं?

यह एक ऐसा सवाल है जिसने कई लोगों को सोच में डाल दिया है: क्या फ़रिश्ते इंसानों की तरह संतान पैदा कर सकते हैं? कुछ लोग ऐसा मानते हैं, और अक्सर उत्पत्ति 6:1-3 की कहानी का हवाला देते हैं, जहाँ “परमेश्वर के पुत्र” मनुष्यों की “बेटियों” से विवाह करते हैं।

उत्पत्ति 6:1-3
1 जब मनुष्य पृथ्वी पर बढ़ने लगे और उन्हें बेटियाँ जन्मीं,
2 तब परमेश्वर के पुत्रों ने देखा कि मनुष्यों की बेटियाँ सुंदर थीं, और उन्होंने उनमें से जो चाहे, उससे विवाह किया।
3 तब यहोवा ने कहा, “मेरी आत्मा मनुष्य के साथ सदा नहीं रहेगी, क्योंकि वह केवल मांस है; उसके दिन सौ बीस वर्ष होंगे।”

कुछ लोग यहाँ “परमेश्वर के पुत्रों” को फ़रिश्तों के रूप में समझते हैं। लेकिन सही धार्मिक व्याख्या बताती है कि ऐसा नहीं है। पुराने नियम में “परमेश्वर के पुत्र” शब्द का प्रयोग अक्सर धर्मी पुरुषों या सेट की संतान के लिए होता है (उत्पत्ति 4:26), जो मनुष्यों की बेटियों के विपरीत हैं, जो कैन की अवज्ञाकारी संतान हो सकती हैं।

अगर यह फ़रिश्तों की बात होती, तो कई समस्याएँ सामने आतीं। सबसे पहले, यीशु ने स्पष्ट रूप से सिखाया है कि फ़रिश्ते न तो विवाह करते हैं और न ही संतान पैदा करते हैं। स्वर्ग में विवाह के बारे में पूछे गए प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा:

मत्ती 22:30
“क्योंकि पुनरुत्थान में न वे विवाह करेंगे और न विवाह दी जाएँगे, परन्तु वे स्वर्ग के फ़रिश्तों जैसे होंगे।”

यह सीधे तौर पर बताता है कि फ़रिश्ते इंसानों जैसे यौन प्राणी नहीं हैं और न ही वे विवाह या संतानोत्पत्ति करते हैं।

इसके अलावा, उत्पत्ति 6 में भ्रष्टाचार के लिए मनुष्यों को दंडित किया जाता है — फ़रिश्तों को नहीं। भगवान ने मनुष्यों के जीवनकाल को सीमित किया और बाद में नैतिक रूप से पतित मनुष्यता पर जलप्रलय लाया। यदि फ़रिश्ते शारीरिक पापों में शामिल होते, जैसा कुछ लोग कहते हैं, तो शास्त्रों में उनके दंड का उल्लेख होता — लेकिन ऐसा नहीं है।

धार्मिक दृष्टिकोण से, फ़रिश्ते सृष्टिकर्ता द्वारा बनाए गए आध्यात्मिक प्राणी हैं (इब्रानियों 1:14), जो शारीरिक मृत्यु, बूढ़ापे या संतानोत्पत्ति के अधीन नहीं हैं। उनका शरीर नहीं होता जब तक कि परमेश्वर उन्हें किसी विशेष कार्य के लिए अस्थायी रूप से न दे (उत्पत्ति 18; लूका 1:26-38)। उन्हें संतानोत्पत्ति की क्षमता के साथ नहीं बनाया गया क्योंकि उन्हें पृथ्वी पर बढ़ने और फैलने का आदेश नहीं मिला है जैसे मनुष्यों को (उत्पत्ति 1:28)।

निष्कर्ष:
पवित्र फ़रिश्ते संतानोत्पत्ति नहीं करते। वे आध्यात्मिक प्राणी हैं, जिन्हें भगवान पूजा, सेवा और दिव्य मिशन के लिए बनाया है। वे विवाह नहीं करते, बूढ़े नहीं होते और संतान पैदा नहीं करते। इस मामले में उनकी प्रकृति मनुष्यों से पूरी तरह अलग है।

शलोम।


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समझना कि नया जन्म लेना क्या वास्तव में है

हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम की महिमा हो!
आपका हार्दिक स्वागत है जब हम मिलकर यह जानने चलते हैं कि बाइबल नया जन्म लेने के बारे में क्या सिखाती है —
एक ऐसी सच्चाई जो मसीही उद्धार के केंद्र में है।

भजन संहिता 119:105 कहती है:

“तेरा वचन मेरे पाँव के लिए दीपक और मेरे मार्ग के लिए उजियाला है।”

आईए हम इस महत्वपूर्ण विषय में गहराई से उतरते हैं —
उस वार्तालाप को देखकर जो यीशु ने एक धार्मिक अगुवा, निकुदेमुस, के साथ की थी।


मुलाक़ात: यीशु और निकुदेमुस
यूहन्ना 3:1–5

1 फरीसियों में से एक मनुष्य था, निकुदेमुस नाम का, यहूदियों का एक सरदार।
2 वह रात को यीशु के पास आया और उससे कहा, “रब्बी, हम जानते हैं कि तू परमेश्वर की ओर से आया हुआ गुरु है; क्योंकि कोई भी व्यक्ति वे आश्चर्यकर्म नहीं कर सकता जो तू करता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो।”
3 यीशु ने उत्तर दिया, “मैं तुमसे सच सच कहता हूँ, जब तक कोई नया जन्म न ले, वह परमेश्वर के राज्य को देख नहीं सकता।”
4 निकुदेमुस ने उससे कहा, “एक मनुष्य जब बूढ़ा हो गया हो तो कैसे जन्म ले सकता है? क्या वह दूसरी बार अपनी माता के गर्भ में प्रवेश करके जन्म ले सकता है?”
5 यीशु ने उत्तर दिया, “मैं तुमसे सच सच कहता हूँ, जब तक कोई जल और आत्मा से जन्म न ले, वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।”


नया जन्म लेना वास्तव में क्या है?
निकुदेमुस यह समझता था कि आश्चर्यकर्म परमेश्वर के साथ संबंध का प्रमाण हैं।
लेकिन यीशु ने एक गहरी बात बताई — कि उद्धार के लिए पूर्ण आत्मिक पुनर्जन्म आवश्यक है।

यह जन्म कोई प्रतीकात्मक या धार्मिक कर्मकांड नहीं है —
बल्कि यह एक आंतरिक और वास्तविक परिवर्तन है, जो ऊपर से होता है।

ग्रीक में यह शब्द है γεννηθῇ ἄνωθεν (gennēthē anōthen)
जिसका अर्थ है “ऊपर से जन्म लेना।”

बाइबल में इस सच्चाई की पुष्टि और भी जगहों पर होती है:

2 कुरिन्थियों 5:17

“इसलिए यदि कोई मसीह में है, तो वह नया प्राणी है; पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब कुछ नया हो गया है।”


जल और आत्मा से जन्म — इसका क्या अर्थ है?
यीशु ने कहा कि मनुष्य को “जल और आत्मा” से जन्म लेना चाहिए।
इसका अर्थ है मसीही परिवर्तन के दो पहलू:

जल से जन्म
यह जल बपतिस्मा को दर्शाता है, जो पश्चाताप और पापों की शुद्धि का बाहरी चिन्ह है।

प्रेरितों के काम 2:38

“पतरस ने उनसे कहा, ‘तौबा करो, और तुममें से हर एक यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा लो, ताकि तुम्हारे पाप क्षमा किए जाएँ, और तुम पवित्र आत्मा का वरदान पाओ।’”

आत्मा से जन्म
यह पवित्र आत्मा के द्वारा हृदय में आंतरिक नया जीवन उत्पन्न होना है।
वही आत्मा हमें नया मन, नई इच्छाएँ और पवित्र जीवन जीने की सामर्थ्य देता है।

तीतुस 3:5

“उसने हमारा उद्धार किया — न कि हमारे धर्म के कामों के कारण, बल्कि अपनी दया के अनुसार — नये जन्म और पवित्र आत्मा द्वारा किए गए नवीनीकरण के द्वारा।”


आत्मिक बनना — एक नई पहचान
नया जन्म लेना मतलब है — परमेश्वर से जन्म लेना, और एक नया मनुष्य बन जाना।

यीशु ने कहा:

यूहन्ना 3:6

“जो शरीर से जन्मा है वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है वह आत्मा है।”

यह हमारे पुराने पापी स्वभाव और आत्मा से मिले नए जीवन के बीच का अंतर स्पष्ट करता है।

“आध्यात्मिक” होना केवल भविष्यवाणी या चमत्कार दिखाने से सिद्ध नहीं होता,
बल्कि पाप पर जय पाने वाले बदले हुए जीवन से होता है।

1 यूहन्ना 5:4

“क्योंकि जो कोई परमेश्वर से जन्मा है, वह संसार पर जय पाता है; और वह जय है जो संसार पर जय पाती है — हमारा विश्वास।”

1 यूहन्ना 3:9

“जो कोई परमेश्वर से जन्मा है, वह पाप नहीं करता, क्योंकि परमेश्वर का बीज उसमें बना रहता है; और वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह परमेश्वर से जन्मा है।”


क्या चमत्कार उद्धार का प्रमाण हैं?
चमत्कार दिखा सकते हैं कि परमेश्वर किसी के द्वारा कार्य कर रहा है,
लेकिन वे उद्धार का सबसे बड़ा प्रमाण नहीं हैं।

यीशु ने चेतावनी दी:

मत्ती 7:22–23

“उस दिन बहुत लोग मुझसे कहेंगे: ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हमने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की? और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला? और तेरे नाम से बहुत से आश्चर्यकर्म नहीं किए?’
तब मैं उन्हें स्पष्ट कह दूँगा: ‘मैंने तुम्हें कभी नहीं जाना; हे कुकर्म करनेवालों, मेरे पास से चले जाओ।’”

सच्चा प्रमाण यह है कि कोई नये जन्म से बदला हुआ जीवन जी रहा हो —
पवित्र आत्मा द्वारा एक नया जीवन।


सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है?
धार्मिक पहचान, अच्छे काम, और आत्मिक वरदानों का अपना स्थान है,
लेकिन ये नया जन्म लेने की आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर सकते।

बिना नए जन्म के कोई भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।

गलातियों 6:15

“क्योंकि न खतना कुछ काम का है, न खतनारहित होना, केवल नई सृष्टि ही सब कुछ है।”

1 पतरस 1:23

“क्योंकि तुम नाशवान नहीं, पर अमर बीज से — परमेश्वर के जीवते और स्थिर वचन के द्वारा — नये सिरे से जन्मे हो।”


क्या तुम नया जन्म ले चुके हो?
केवल बाहरी तौर पर नहीं — बल्कि क्या तुम्हारे दिल में परमेश्वर ने सच्चा कार्य किया है?

यदि नहीं, तो आज यीशु की ओर विश्वास से मुड़ो।
अपने पापों का पश्चाताप करो,
उसके नाम में बपतिस्मा लो,
और पवित्र आत्मा से नया जीवन मांगो।

यही तुम्हारे परमेश्वर के साथ चलने की सच्ची शुरुआत है।


प्रभु तुम्हें आशीष दे और मसीह में पूर्ण जीवन की ओर अगुवाई करे।


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